बुधवार, 7 अगस्त 2019

एक वेश्या, कविता


आखिर मनुष्य ही होती है ये वेश्या
क्यों नहीं समझता समाज इनको 
अपना हिस्सा - क्यों किया इनको तुम ने 
दरकिनार

अपनी भूख मिटाने के लिए बना लेते हो 
इनको अपना 
नहीं तो इनके कोठे (घर) को भी तुम गाली देते हो 
आखिर क्यों 

सुनो शायद वह कोठा नहीं 
घर है उनका 
गाली देने से पहले याद कर लेना उस पल 
को जिस समय वह तुमको सहती है 
वह भी अपने में लीन होती है 
तुम भी अपने में लीन रहो 
और मत दो गाली इनको 

यह भी मनुष्य है - समाज का एक हिस्सा 
जीने दो इनको 
मत दो गाली  

लेखक : प्रमोद कुमार मीणा दिल्ली विश्विद्यालय के छात्र हैं 

मंगलवार, 23 जुलाई 2019

आखिर कब तक

आखिर कब तक
मुझे यूं ही नफरत करोगे।
मिट्टी में मिलने के बाद तो
एक दिन तुम याद करोगे।

आखिर कब तक
अपने दिल की धड़कनों से
मुझे दूर करोगे।
सांसे रुक जाने के बाद तो
अपनी धड़कनों में तो
एक दिन मुझे सुनोगे।

आखिर कब तक
मेरे दर्द पर मुस्कुराओ गए।
बेदर्द दुनिया से दर्द मिलने पर
एक दिन तो मुझे
याद कर तुम पछताओगे।

आखिर कब तक
मेरे खिलाफ औरों से
तुम गुफ्तगू करोगे।
एक दिन तो रो-रो कर
आहें भर मुझे याद करोगे।

...राजीव डोगरा (युवा कवि लेखक,भाषा अध्यापक)
हमारे सम्मानित रचनाकार का दावा है कि यह उनकी स्वरचित रचना है।

मंगलवार, 9 जुलाई 2019

कमल फूल

इंसान कमल फूल की तरह जियों
क्योंकि-
कमल फूल कीचड़ में खिलता है,
लेकिन सभी इंसान  उसे चाहने लगती है;
इसलिए कि अपने दु:ख में रहता है
दुसरे के उपयोग में आता है ।
इंसान यदि बनना है कमल फूल की तरह बनों
अपने लाख दु:ख में भी दुसरे की उपहार से
मत भागों,
तब तो इंसान कमल फूल की तरह चाहने लगेगी ।
कमल फूल की गुण जिस इंसान को हो जाता है,
उस इंसान का काव्य भी रचनाकार लिखता है ।
...अनुरंजन कुमार "अँचल "


हमारे सम्मानित रचनाकार का दावा है कि यह उनकी स्वरचित रचना है।

मंगलवार, 2 जुलाई 2019

अल्लाह औ ईश्वर

मेरे यहाँ एक नया नया मन्दिर खुला है,
नाम हालांकि प्राचीन रखा है।
लालची लोग आएं जल्दी - जल्दी
मन्दिर को प्राचीन बनाये जल्दी - जल्दी
इसलिए भंडारा सुबह-शाम चला रखा है।

लालची लोग जाते हैं कुछ मांगने
और देकर आ जाते हैं यह भी नहीं
विचारते जिससे खुद मांगने जा रहे हैं
उसे भला क्या दे सकते हैं, और यदि उसे
दे सकते हैं तो उससे मांगना कैसा ?

जरा सी अफवाह उड़ी नहीं कि ,
निकल पड़ते ईश्वर व अल्लाह को बचाने !
भूल जाते की हैं कि जब स्वयं पड़े होते हैं
किसी मुसीबत में तब आता है याद आते
हैं... अल्लाह औ ईश्वर ।

जब आप ईश्वर औ अल्लाह को खुद से
अधिक समझदार , अधिक बलवान औ
सर्वशक्तिमान मानते हैं।
तो फिर वह स्वयं की रक्षा के लिये
क्यों आप लोगों बुलायेगा ?

आप जरा विचार कीजिए जब ईश्वर
व अल्लाह की नजरों में सब समान हैं।
सभी उसके बन्दे हैं तो आप लोगों के
आपसी बैर से उसे क्या लाभ , लाभ होता है
कुछ बड़े लोगों का, राजनीतिक पार्टियों का...।
...धर्मवीर (दिल्ली विश्वविद्यालय के पूर्व छात्र हैं)
हमारे सम्मानित रचनाकार का दावा है कि यह उनकी स्वरचित रचना है

गुरुवार, 27 जून 2019

मैं लिखूं के ना लिखूं

मैं लिखूं के ना लिखूं ,
मुझपर दबाव है कि
मैं उनके हक में लिखूं
मेरी कलम सदा विरोध।

मैं लिखूं के ना लिखूं ,
क्या चुप हो जाऊं
मान लूं इसे खुदा फरमान
जिये जाऊं चुपचाप।

मैं लिखूं के ना लिखूं ,
मुझे डर है कहीं देख
मेरे शब्द समझ जाएं
मेरे भीतर के डर को।

मैं लिखूं के ना लिखूं ,
पल पल टूटता है धैर्य
क्या गुनाह यूँही बढ़ता
जायेगा, बढ़ेगी अमानवीयता।

मैं लिखूं के ना लिखूं ,
कातिल कौन है पता नहीं
इंसाफ़ किसे चाहिए साहब
बस किसी को झुकाना है।

मैं लिखूं के ना लिखूं ,
सत्ता का रूप घिनौना है
भावनाओं में बहता भारत
राजनेताओं का खिलौना है।
समर्पित-बंगाल हिंसा
..धर्मवीर सिंह( दिल्ली विश्वविद्यालय के पूर्व छात्र )

हमारे सम्मानित रचनाकार का दावा है कि यह उनकी स्वरचित रचना है।

बुधवार, 26 जून 2019

बिखरते रिश्ते...

अपनों का ये कैसा मंज़र देख रहा हूँ,
मैं आज रिश्तों को बिखरता देख रहा हूँ।

जिनके आँगन में गूंजती थी कभी,
मेरे बचपन की किलकारियां,
वहां आज अपनी जवानी को सिसकता देख रहा हूँ,
मैं आज रिश्तों को बिखरता देख रहा हूँ।

कभी था जिस घर में वो मंज़र प्यार का,
आज उन्ही के हाथों में,
नफ़रत का खंजर देख रहा हूँ,
मैं आज रिश्तों को बिखरता देख रहा हूँ।

जिन रिश्तों ने कभी सींचा था अपनेपन को,
उन्ही रिश्तों को आज ज़हर का बीज बोते देख रहा हूँ,
मैं आज रिश्तों को बिखरता देख रहा हूँ।

जो चरित्र मैंने देखे थे,
वो अब नहीं रहे,
आज उनको ही चरित्रहीन होते देख रहा हूँ,
मैं आज रिश्तों को बिखरता देख रहा हूँ।

मैं भरोसा करूं तो किस पर करूं,
भरोसेमंदों को ही दगाबाज़ी करते देख रहा हूँ,
ख़ून के रिश्तों को ही,
ख़ूनी होते देख रहा हूँ
मैं आज रिश्तों को बिखरता देख रहा हूँ।

अहमियत रखती थी मेरी शख़्सियत, कभी जिनके लिए,
उन्हीं के सामने अपना क़िरदार निराधार देख रहा हूँ,
बेबस अपना वजूद देख रहा हूँ,
मैं आज रिश्तों को बिखरता देख रहा हूँ।

जो करते थे कभी दीन-ईमान की बातें,
उनको ही बेईमान होते देख रहा हूँ,
अदब करने वालों को ही,
बेअदब होते देख रहा हूँ
मैं आज रिश्तों को बिखरता देख रहा हूँ।

जो आँखे मेरे लिए रखती थीं कभी समुन्दर प्यार का,
उन्हीं आँखों में आज नफ़रत का सैलाब देख रहा हूँ,
मैं आज रिश्तों को बिखरता देख रहा हूँ।

जो हमसे मिलते थे कभी अंदाज़-ए-मोहब्बत के दरमियाँ,
उन्हीं से खुद को नज़रंदाज़ करते देख रहा हूँ,
मैं आज रिश्तों को बिखरता देख रहा हूँ।
मैं आज रिश्तों को बिखरता देख रहा हूँ।।

एम. आरिफ़ खान, पीएचडी स्कॉलर(दिल्ली विश्वविद्यालय) श्यामा प्रसाद मुखर्जी कॉलेज में राजनीतिक विज्ञान पढ़ाते हैं।

 

हमारे सम्मानित रचनाकार का दावा है कि यह उनकी स्वरचित रचना है।



रविवार, 23 जून 2019

दो जन

अक्सर ऐसा होता है
जब दो "जन" बात करते हैं
एक रिश्ता बन जाता है
फिर प्रेम भरी तकरार का
समाँ बन्ध सा जाता है

उम्मीद जुड़ जाती है
कही निराशा हो जाती है
"उसकी" फ़िक्र भीतर साँस लेती है
अक्सर ऐसा होता है...

ख्याल सो जाते हैं
नींद जागती रहती है...
आँखे नम हो जाती है
कुछ थम सा जाता है
सांसे जोर पकड़ती है
अक्सर ऐसा होता है...

प्रेम कहीं खुद को "तलाशता" है
सुर्ख़ आँखे हाल बयां करती है
आंसू यूँ बहते है...वो भी 
साथ छोड़ रहे हो जैसे

ख़ामोशी गुनगुनाती है
आवाज़ "दब सी" जाती है
"प्रेम "भीगता रहता है
जैसे कभी न सूखने के लिए
अक्सर ऐसा ही होता है
मीनाक्षी गिरी(शोधार्थी अन्तराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय वर्धा)

हमारे सम्मानित रचनाकार का दावा है कि यह उनकी स्वरचित रचना है

शनिवार, 22 जून 2019

चूड़ियाँ भी अपनी हद जानती हैं

चूड़ियाँ भी अपनी हद जानती है
रंगों का भी मतलब जानती है
 कलाई का फर्क जानती है

नीली,पीली,हरी,गुलाबी,
नारंगी रंगों की होती है चूड़ियाँ 
पर इसमें लाल रंग जो है न 
वो चूड़ी होने से पहले 
अपने रंग की कद्र जानता है
अपने रंग की हद जानता है

ये नाजुक कलाईयों में बँधा गोल जाल है
देखने में बहुत सुंदर होती है  चूड़ियाँ 
ये सबको मोहित करने का हुनर जानती है

यूँ तो चूड़ियाँ चुप रहती है पर 
हाथ में रहते हुए बहुत कुछ बोलती है, 
बस देखने वाला सुन पाएं
इसकी खनखन बहुत प्यारी है,
पर ये खनखन कभी- कभी शोर भी बन जाती है

ये चूड़ियाँ कलाईयों का फर्क जानती है
समय का महत्त्व जानती है
क्यूँकि ये चूड़ियाँ अपनी हद जानती है
  ...सोनिया(शोधार्थी, महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय)

हमारे सम्मानित रचनाकार का दावा है कि यह उनकी स्वरचित रचना है।

बुधवार, 19 जून 2019

संतुष्ट है भारत

मैं चाहती थी एक कविता लिखना
पर वो शब्द आते नहीं मेरे ज़हन में
जो बयां कर सके उन संवेदनाओ को,
जो महसूस होती हैं उन हर एक माता-पिताओं को,
जिनके नोनिहालों ने ऑक्सीजन की कमी से
तोड़ दी थीं सांसे, छोड़ दिया था शरीर,
और चले गए इस दुनिया से कहीं बहुत दूर।

जिनकी उम्मीदें पंख लगने से पहले ही
कटने लगी हैं उस जानलेवा बीमारी से
जिसमें खत्म होते जा रहे हैं
वे नन्हें नन्हें बचपन
जिन्हें अभी खेलना था
पकड़म-पकड़ाई और छुपन-छुपाई
दोष किसका है!
उन मासूमों का या फिर उस राजनीति का?
जो संसद में मुद्दों की जगह "नारे" परोसती है,
अगर कुछ घट जाये तो विपक्ष को कोसती है।

राख हो जाते हैं वो देश के युवा
आग में जलकर
जिन्हें भावी आईपीएस,टीचर और डॉक्टर बनना है,
न बचा सके उन्हें अग्निशमन यन्त्र और रक्षामंत्रालय के मंत्री ही
बस देश का मुद्दा रहा सबको राष्ट्रवादी बनना है।

पंखे से झूलते पाए जाते हैं
शिक्षण संस्थानों में वे छात्र
जो छोड़ जाते हैं बेबसी में
कुछ प्रश्नचिह्न इस व्यवस्था पर
जो लाख कोशिशों के बाद भी ढलती नहीं,बदलती नहीं।
आख़िर कौन सन्तुष्ट है भारत की नीतियों से,
जिसकी अर्थव्यवस्था सही ढंग से चलती नहीं।

शहीद होते जाते हैं देश के जवान
कभी आतंकवादी हमलों में 
तो कभी देश की सीमाओं पर,
कोई नहीं पूछने जाता
क्या गुजरती है उनके परिवार पर।
घटनाएं घटती हैं और फिर अखबारों में
दब जातीं हैं कहीं गहरे अतल में
कोई कार्यवाही नहीं,सुनवाई नहीं 
 इस भारतीय ससंद के पटल में।

ऐसा हाल हो चुका है अब
उस सोने की चिड़िया रूपी भारत का
जहाँ बालक,किशोर,प्रौढ़ और जवान
देश का हर नागरिक है परेशान,
शिक्षा नहीं, स्वास्थ्य नहीं, रोजगार नहीं
फिर कैसे है ये भारत मेरा महान..!!

...कमलेश ( दिल्ली विश्वविद्यालय की छात्रा हैं )
हमारे सम्मानित रचनाकार का दावा है कि यह उनकी स्वरचित रचना है

शनिवार, 15 जून 2019

उसे मेरी याद तो आती होगी

उसे मेरी याद तो आती होगी
जब चाँद की आग़ोश में सूरज छुप जाता होगा 
नदी की घाट से हर शख्स़ घर को लौट जाता होगा 
रेत पर लिखा हर नाम, मिट जाता होगा 
उसकी परछाई भी लम्बी हो जाती होगी 
हर रोज छत पर शाम जो आती होगी 
उसे मेरी याद तो आती होगी॥

झट–पट गुस्से में उसकी भौवें, तन जाती थी 
पल एक पल में ही वो रूठ जाती
अगले पल ही जोरो की ठहाके लगाती थी 
सुबह उठ फोन पर हाथ जो लगाती होगी 
कुछ सोच, उसकी आँखे भर तो जाती होंगी 
उसे मेरी याद तो आती होगी ॥

झुक जाती थी नज़रें उसकी, जो मैं प्यार से देखा करता था 
ख़ुश हो लिपट जाती, जब कुछ लिखकर उसको पढ़ता था 
तुम बहुत बेहतरीन लिखते हो, हमेशा लिखते रहा करो ,
वो ऐसा हर बार कह जाती थी 
मुझे पढ़ने की चाहत में, मुझे सुनने की आहट में 
आज भी नींद भरी रातों में जग तो जाती होगी 
उसे मेरी याद तो आती होगी ॥

चौराहों पर अक्सर मैं रास्ता भटक जाया करता था 
या फिर जान-बूझकर पूछा करता –
ये हम कहा आ-गये, किधर जाएगा ये रास्ता ?
क्योंकि उस शहर से मेरा कम ही था वास्ता 
वो प्यार से मुझे हर रास्ता बताती 
कभी हाँथ पकड़, संकरी गलियों में घुमाती थी 
हर छोटी–बड़ी चीज़ को कुछ ऐसे बताती,
मानो पूरा शहर उसमें ही बसा हो 

मैं मन्नत-ए-आरज़ू उसके दर पर जाता था 
वो एक रहनुमा जैसी सब कुछ बता जाती थी 
आज भी जब वो उन चौराहों से गुज़रती होगी 
सर-सरी हवाएं, उसे छूकर तो जाती होंगी 
उसे मेरी याद तो आती होगी ॥
सुचित कुमार यादव, दिल्ली विश्वविद्यालय में पीएचडी स्कॉलर है और हिन्दू कॉलेज में राजनीतिक विज्ञान पढ़ाते हैं ॥

हमारे रचनाकार का दावा है कि यह उनकी स्वरचित रचना है।

बीती यादों को लेकर

बीती यादों को लेकर ही मत जियो मरो..
आगे और भी लोग आएंगे..
जिन पर तुम्हारा दिल आएगा
जो बीत गयी सो बात गयी 
अब बात कुछ करो नई
पुराने में रखा क्या है 
अपना तो हर पल नया है 

जो सामने है उसे स्वीकार करो 
जो चला गया उसे मत याद करो 
यादों में रखा क्या है 
आने वाला हर पल नया है 

जो भाव खाये उसे त्याग दो 
जो प्यार दे उसे प्यार दो 
आखिर इन लोगो मे रखा क्या है 
सभी लोगो मे कुछ नया है 

अच्छी और बुरी दोनो परिस्थितियां आगे आएंगी 
खुशियों के साथ दुखो को भी साथ लाएंगी 
ज़िंदगी का नाम ही 'आगे बढ़ना' है 
रुकना नही कभी , तेरा काम 'चलना' है 
उस पल को स्वीकार कर ,जो तेरे लिए नया है 
 ..ज्योति कुमारी ( दिल्ली विश्वविद्यालय की छात्रा हैं )

हमारे सम्मानित रचनाकार का दावा है कि यह उनकी स्वरचित रचना है।

गुरुवार, 6 जून 2019

आप भी...

आप भी इस देश की संतान हैं ,
किसने आपको पथभ्रष्ट किया है ,
या स्वयं ही भूल गए हो ,
आखिर तो आप भी इंसान हैं।

किस चाह से हो लड़ रहे ,
क्यों नफरतें फैला रहे ,
लोगों में डर बैठा रहे ,
क्या यही ईमान हैं।

दबा देते हो चीखें ,
 नहीं सिसकने भी देते ,
बुझा देते हो नन्हे चराग़ को भी ,
क्या तुम्हारे भीतर हृदय नहीं पाषाण हैं।

ना बच्चों को बख्श रहे हो ,
ना बुजुर्गों को बख्श रहे हो ,
क्यों झकझोर रहे समाज को ,
क्या बनाना चाहते हर एक को शैतान हैं।

मार रहे जिन्हें आप ,
समझ किसी गैर का ,
जब समझोगे खुद को भारतीय तब जानोगे ,
वह भी तो आपकी ही संतान हैं।
...धर्मवीर सिंह ( दिल्ली विश्वविद्यालय के पूर्व छात्र हैं)

हमारे सम्मानित रचनाकार का दावा है कि यह उनकी स्वरचित रचना है

रविवार, 26 मई 2019

डॉ पायल तड़वी का गुनाह क्या था..?

यही की वह महाराष्ट्र के #आदिवासी परिवार से थी। नेशनल मेडिकल कॉलेज में पोस्ट ग्रेजुएट (एम.डी.) की  पढाई कर रही थी..!!

कॉलेज की कुछ सीनियर, तुच्छ मगजी सवर्ण महिलाओ ने...
जाति के नाम पर डॉ पायल तड़वी को प्रताड़ित करना शुरू कर दिया। व्हाटसअप ग्रुप में उसकी जाति को लेकर मजाक उड़ाया जाने लगा। रंग-ढ़ंग को लेकर मजाक बनाया जाने लगा। लैब में उसे काम करने से रोका जाने लगा। भरी क्लास मे जातिवादी गालियां दी जाने लगीं। उसकी योग्यता पर सवाल किया जाने लगे। उसके छूने से मरीजो के अशुद्ध हो जाने की बात की जाने लगी। उसके #आदिवासी होने ने उसे जंगली की श्रेणी में रख दिया। खाने की टेबल पर उसे इन जातिवादी इलीट महिलाओं ने गॉशिप पॉइंट बना दिया। इन तुच्छ मगजी महिलाओं से डॉ पायल का आगे बढ़ना सहन नहीं हुआ।

जब टॉर्चर बढ़ने लगा तब कॉलेज प्रशासन से इसकी दो बार (दिसंबर 2018 और 10 मई 2019)माँ बाबा के साथ मिलकर लिखित शिकायत भी दर्ज करा दी गई। लेकिन इन 6 महिनो मे कोई कार्यवाही नही की गई..??
21मई 2019 को डॉ पायल पड़वी ने अपनी माँ को फोन किया और बताया कि ये टॉर्चर अब और बर्दास्त नही होता है। अगले दिन डॉ पायल तड़वी अपने पेसेंट की #सफल_सर्जरी के बाद लंच के लिए हॉस्टल आयी और अपने रूम में अपने ही दुपट्टे से फांसी लगा ली। 

अब सवाल ये है डॉ पायल तड़वी की संस्थानिक हत्या के लिए जिम्मेदार कौन है ? 

उसका आदिवासी होना ??
या हिन्दु समाज का घोर जातिवादी होना ??
JusticeForDrPayalTadvi
इसे कहते है #घोरजातिवाद
...विनीत कुमार


साथियों, पहली फोटो में आप एक हँसती खिलखिलाती हुई लड़की देख रहे है लेकिन अगली फोटो फ्रेम में जड़ी हुई है और उसके ऊपर माला चढ़ा दी गई है मोमबत्तियां जल रही है। बाकि की दो फोटो में लड़की अपनी माँ और बाबा है।

दरअसल ये फोटो डॉ पायल तड़वी की है जो की महाराष्ट्र के जलगाँव जिले के आदिवासी परिवार से थी वर्तमान में वी वाई एल नायर हॉस्पिटल से संबद्ध टोपीवाला नेशनल मेडिकल कॉलेज के गायनोकॉलॉजी विभाग में पोस्ट ग्रेजुएट (एम.डी.) कोर्स में द्वितीय वर्ष की अपनी पढाई कर रही थी और यही इसका गुनाह था। 

पिछले वर्ष एडमिशन में उसे आरक्षण का लाभ मिला था लेकिन यह संविधान प्रदत्त अधिकार उसी कॉलेज की कुछ सीनियर सवर्ण इलीट महिलाओं जिनमे डॉ हेमा आहूजा, डॉ अंकिता खंडेलवाल और डॉ भक्ति महर को पसंद नही आया और जाति के नाम पर डॉ पायल तड़वी को प्रताड़ित करना शुरू कर दिया और व्हाटसअप ग्रुप में उसकी जाति को लेकर मजाक उड़ाया जाने लगा, उसकी लैब में उसे काम करने से रोका जाने लगा, उसकी योग्यता पर सवाल किया जाने लगा, उसके इलाज से मरीजो के अशुद्ध हो जाने की बात की जाने लगी, उसके आदिवासी होने ने उसे जंगली की श्रेणी में रख दिया, खाने की टेबल पर उसे इस तीनो सवर्ण इलीट महिलाओं ने गॉशिप पॉइंट बना दिया।

टॉर्चर जब ज्यादा बढ़ने लगा तब उसने अपनी माँ जो की एक कैंसर पेसेंट है और उसी हॉस्पिटल में इलाज कराने आती है को ये बात बताई तो दोनों माँ बेटी ने कॉलेज के अधिकारियों को इसकी शिकायत दिसंबर 2018 में ही की थी लेकिन किसी ने उनकी शिकायत पर ध्यान नही दिया। इन सवर्ण इलीट महिलाओं का टॉर्चर दिनों दिन बढ़ता गया तो 10 मई 2019 को माँ बाबा के साथ मिलकर लिखित शिकायत भी दर्ज करा दी गई लेकिन कोई कार्यवाही नही की गई।

21 मई 2019 को डॉ पायल पड़वी ने अपनी माँ को फोन किया और बताया कि ये टॉर्चर अब और बर्दास्त नही होता है तो घरवालों ने अगले दिन हॉस्पिटल आने की बात कही। अगले दिन 22 मई 2019 को डॉ पायल तड़वी अपने पेसेंट की सफल सर्जरी के बाद लंच के ले लिए हॉस्टल आयी और अपने रूम में अपने ही दुपट्टे से फांसी लगा ली। 

अब सवाल ये है डॉ पायल तड़वी की संस्थानिक हत्या के लिए जिम्मेदार कौन है ? 

1 उसका आदिवासी होना ?
2 एक आदिवासी लड़की का सवर्णो के वर्चस्व वाले डॉक्टर जैसे पेशे को अपनाना ?
3 आरक्षण के संबैधानिक अधिकार का उपयोग करना ? 

ये तमाम कारण डॉ पायल तड़वी की संस्थानिक हत्या के कारण है। 

आखिर क्यों इन तीनो सवर्ण महिलाओं हेमा आहूजा, अंकिता खंडेलवाल, भक्ति महर (डॉ जैसा शब्द इनके लिए उपयुक्त नही है) महिलाओं के खिलाफ कोई भी कार्यवाही पिछले 6 महीने में क्यों नही की गई ? क्योकि वे सवर्ण इलीट थी ? 

क्यों नही विभाग या कॉलेज के अधिकारियों ने इस जातिगत टॉर्चर के खिलाफ कार्यवाही की ? क्योकि जाति का नाम आते ही कॉलेज बदनाम हो सकता था। 

क्यों डॉ पायल तड़वी के माँ और पिताजी की शिकायत पर ध्यान दिया गया ? क्योकि आदिवासी थे और उनकी कोई औकात नही थी।

अब इस घटना के चार दिन बाद भी तीनो सवर्ण इलीट महिलाओं को गिरफ्तार नही किया गया है और कार्यवाही के नाम पर डॉ तड़वी की यूनिट हेड डॉ यी चिंग लिंग और  विभाग के हेड डॉ एस डी शिरोडकर को पद से हटा दिया गया है मतलब बलि का बकरा कॉलेज प्रशासन को मिल गया है लेकिन अभी तक इन तीनो महिलाओं के खिलाफ कोई कार्यवाही पुलिस ने नहीं की है यहां तक की ये तीनो महिलाएं फरार है और मामले को कॉलेज प्रशासन रैगिंग का मसला बनाने में जुटा हुआ है।

जानता हूँ की पुलिसिया कार्यवाही का कोई परिणाम नही निकलेगा और न ही उसके न्याय के लिए लोग सड़क पर आएंगे लेकिन क्या हम लोग भी ऐसी ही एक आदिवासी डॉक्टर की संस्थानिक हत्या को ऐसे ही भुला देंगे तो मेरा जबाब है नही। जब तक तीनो सवर्ण महिलाओं को गिरफ्तार करके जेल नही भेज दिया जाता और कॉलेज को दण्डित नही किया जाता हम लोग चुप नही बैठेंगे।

आज शाम तक आगे एक्शन की सूचना आपको दी जायेगी

#JusticeForDrPayalTadvi

Laxman Yadav गंगा सहाय मीणा Neetisha Xalxo Atul Kumar Valentina Aud N Sai Balaji Sucheta De Nandita Narain Rajib Ray Gyan Prakash Suchit Santosh Sukumar Narayana Rajesh Paswan डॉ पी. आर. मीणा Sachin Nirmala Narayanan Naveen Gaur Raj Vasava Praful Vasava छोटुभाई वसावा 
      ...जितेंद्र पृथ्वी


तुम्हारे जाने के बाद ----

हाँ मैंने रोया बहुत, तुम्हारे जाने के बाद 
कई रात नहीं सोया, तुम्हारे जाने के बाद 
हमने बहुत कुछ खोया तुम्हारे जाने के बाद
बड़ी मुश्किलों से खुद को संजोया, तुम्हारे जाने के बाद 
सब कुछ बहुत याद आता है, तुम्हारे जाने के बाद ॥

    मैं जो तुमसे कहा करता था –
एक इबादत है तू, मैं तेरी अदायगी करता हूँ
जुलम तो आदत है दुनिया की, मैं तेरी हिफ़ाज़त करता हूँ 
चलो बहुत दूर और दूर, एक नई दुनिया इजाद करें 
वहा बैठे, दिल का हर दर्द तुमसे फरियाद करे 
सब कुछ बहुत याद आता है, तुम्हारे जाने के बाद ॥

याद है, मैं जो कहा करता था—
तेरे अंदाज़-ए- बया में मेरी आँखे बहक जाती हैं  
और तू है कि मेरी हर सुलझन में उलझ जाती है 
गौर से देख, ये अंजाम-ए- इन्तज़ार क्या होगा 
तुम-तुम होगी ,मैं-मैं होऊँगा और एक फ़लसफ़ा होगा 
मेरे मुस्कान से, तेरी हँसी शान से एक खनक आती है 
तेरे न होने से मेरी आखे, आनायास छलक जाती हैं ।
सब कुछ बहुत याद आता है, तुम्हारे जाने के बाद ॥

...सुचित कुमार यादव (दिल्ली विश्वविद्यालय में पीएचडी स्कॉलर हैं,
और हिन्दू कॉलेज में राजनितिक विज्ञान पढ़ाते है)
 
हमारे सम्मानित रचनाकार का दावा है कि यह उनकी स्वरचित रचना है।

हर पल तुम्हें याद करती हूँ...

हर पल तुम्हें याद करती हूँ, 
क्यौं तुमसे इतना प्यार करती हूँ। 
तुम दर्द इतना देते हो,  
हर साँस में मुझको 
फिर क्यों ये जिंदगी , 
मैं तुम्हारे नाम करती हूँ। 

तुम काला साया हो, 
मैं धूप हूँ सुबह की
फिर क्यों तुम्हारी कालिमा में ,
खुद मैं ढलती हूँ। 

तुम वो परिंदा हो 
जिसका न कोई घर, 
मैं ढूँढती तुझमें पनाह 
फिर भी न जाने क्यों। 

तुम आसूंओं में डूबी 
इक परछाई से, 
मैं फिर भी तेरी बारिशों में भीगती रहूँ। 

तुम मोह का एक सागर , 
मैं मुक्ति का किनारा
फिर क्यों मैं तेरे बंधन से छूट न सकूँ। 

क्या ये तेरा प्यार है, 
जिसे हराना है
या फिर मेरी भूल ,
जिसे फिर सुधारना है।
कीर्ति ( दिल्ली विश्वविद्यालय की पूर्व छात्रा हैं)

हमारे सम्मानित रचनाकार का दावा है कि यह उनकी स्वरचित रचना है

गुरुवार, 23 मई 2019

गुलामी का दौर एकदम नहीं आया था भारत में...

गुलामी का दौर एकदम नहीं आया था भारत में...समय के साथ उसकी सीमा बढ़ती गयी जिससे देश को गुलामी जैसी जकड़न से गुजरना पड़ा।
भारत में ईस्टइंडिया कंपनी का आगमन हुआ जो भारतवासियों का विश्वास जीतने में सफल रही थी। यही कारण था कि भारत जैसे प्रबुद्ध देश पर ईस्टइंडिया कंपनी और अंग्रेजों ने शासन किया। इस कंपनी ने देशवासियों के विश्वास को जीता साथ उनकी खुशहाली नए कारोबार, नई चेतना का प्रस्ताव रखा और अपनी सत्ता स्थापित की और समय के साथ इस कंपनी का विस्तार हुआ। इस कंपनी का कम समय में काफ़ी विस्तार हुआ, यह धीरे-धीरे भारत पर अपना कब्जा करने लगी जिसमें वह सफल भी हुई । इस कंपनी ने सर्वप्रथम अपनी जगह आम जन में बनाई...जिससे उनका भरोसा जीता जा सके। दरअसल ऐसा प्रतीत होता है कि आज भारत की समकालीन राजनीतिक पार्टियां भी इसी का अनुसरण कर रही हैं।
 यक़ीनन किसी व्यक्ति या समाज को अपने भरोसे में लाना उसकी शिक्षा और बुद्धिमत्ता को दर्शाता है...क्योंकि शिक्षित और जागरूक व्यक्ति बिना सोचे समझे किसी व्यक्ति या संस्था पर भरोसा नहीं कर सकता। क्योंकि उसे अपने अधिकारों का निर्वाह करना आता है उन्हें जीना आता है। किसी देश या समाज के लोगों को मानसिक गुलाम बनाना है तो उसकी शिक्षा व्यवस्था को ध्वस्त किया जाना अति आवश्यक है। बहरहाल जिस व्यक्ति या समाज की शिक्षा पर प्रहार हो जाये वह व्यक्ति स्वतः मानसिक गुलाम हो जाता है...उसे गुलाम बनाने की आवश्यकता नहीं पड़ती।

    शिक्षा समाज का एक ऐसा हिस्सा है जिससे व्यक्ति ही क्या समाज को भी गुलाम बनाया जा सकता है। क्योंकि जबतक व्यक्ति शिक्षित नहीं होगा वह अपने अधिकारों के प्रति सजग नहीं हो सकता यही कारण है कि आज की राजनीतिक पार्टियां इसका लाभ उठाती हैं और समकालीन शिक्षा प्रणाली में हस्तक्षेप करती हैं। आज केंद्रीय विश्वविद्यालयों में ही नहीं केंद्रीय स्कूलों और राज्यस्तरीय स्कूलों में भी सरकारें हस्तक्षेप करती हैं। दरअसल सरकारी स्कूलों की ख़स्ता हालत पहले से ही है जिसके ऊपर सरकार उनका निजीकरण करने पर विचार कर रही है (इंटरनेट से जानकारी प्राप्त)। जिससे गरीब तबकों के बच्चे शिक्षा से वंचित हो जाएंगे...दरअसल यह पहलू बेरोजगारी से जुड़ा है, आज देश में बेरोजगारी दर ७.२% हो गयी है जो भयाभय है। जब तक छात्र (बच्चे) के परिवार की आमदनी नहीं होगी वह छात्र नहीं पढ़ सकता।
    कारण कोई हो लेकिन उसका जुड़ाव हरेक बिंदु से होता है। सामाजिक, राजनीतिक, आर्थिक, धार्मिक आदि एक दूसरे से सहसंबंध रखते हैं इनका एक दूसरे के बिना कोई अस्तित्व नहीं है। ये समस्याएं हरेक समय और काल में थीं इनका निवारण भी किया गया और यह निवारण तभी संभव था जब उसकी आलोचना, समालोचना हुई जिसमें अहम भूमिका साहित्य ने निभाई और हर काल के समकालीन साहित्यकारों और कवियों ने इन सभी कारणों की भरपूर निन्दा की।
      आधुनिककाल में भारतेंदु युग के साहित्यकारों ने, सत्ता के पक्ष में भी लिखा और उसका विरोध भी किया। भारतेंदु हरिश्चंद्र ख़ुद लिखते हैं...
         "अंगरेज राज सुख साज सजे सब भारी
            पै धन विदेस चलि जात इहै अति ख़्वारी।।"

भारतेंदु की इन पंक्तियों में सत्ता की आलोचना भी है और सराहना भी। इन्होंने हर्ष भी प्रकट किया है और दुःख भी। द्विवेदी युग में सत्ता की आलोचना ही ज्यादातर मिलती है जिसमें सरकार की नीतियों का बारीकी से विरोध किया है।

         भारत के स्वतंत्र होने के बाद भी कई ऐसे कई लेखक और कवि हुए जिन्होंने सरकार पर सीधा तंज कसा और उसकी आलोचना की। जिनमें नागार्जुन, रघुवीर सहाय, दुष्यंत कुमार, धूमिल इत्यादि प्रमुख हैं। नागार्जुन कहते हैं...
            "रामराज में अबकी रावण नंगा होकर नाचा है,
                   सूरत शकल वही है भैया बदला केवल ढांचा है" 

रघुवीर सहाय-
          "राष्ट्रगीत में भला कौन वह भारत भाग्य विधाता है"
                  फटा सुथन्ना पहने जिसका गन हर चरना गाता है"

दुष्यंत कुमार-
                "मत कहो आकाश में कोहरा घना है
                       यह किसी की व्यक्तिगत आलोचना है"

और...
              "हो गयी है पीर पर्वत सी पिघलनी चाहिए,
                   इस हिमालय से कोई गंगा निकलनी चाहिए
                   सिर्फ हंगामा खड़ा करना मेरा मक़सद नहीं
                   मेरी कोशिश है कि ये सूरत बदलनी चाहिए"

और धूमिल ने लिखा है कि-
     "यह जनतंत्र जिसकी रोज सैकड़ो बार हत्या होती है और हर बार वह भेड़ियों की जुबान पर जिंदा है।"
और...
              "अपने यहां संसद तेली की वह घानी है
                      जिंसमें आधा तेल और आधा पानी है"

दरअसल इन्होंने जनता की आवाज को बुलंद कर सत्ता पर सीधा प्रहार किया है। लेकिन वर्तमान समय में ऐसे कवि या लेखक कम ही मिलेंगे और जो मिलते हैं वो कुछ अपवाद होते हैं। आज ज्यादातर साहित्यकार सत्ता के पक्षधर है यह पहली बार संभव हुआ। आज लेखक सत्ता की नीतियों से खुश तथा समाज की समस्याओं से पूरी तरह रूबरू हो चुका है!  जिसे समाज में कुछ खामियां नजर नहीं आतीं। दरअसल किसी भी काल का शासन तभी सुचारू रूप से चल सकता है जब उसकी आलोचना, समालोचना हो लेकिन आज ऐसा नहीं...आज के ज्यादातर लेखक सत्ता के अनुयायी हैं। यहां मुझे रागदरबारी के वो शब्द याद आ रहे हैं जो एक शिक्षक के संदर्भ में लिखे गए हैं....
      एक राष्ट्र तभी समृद्ध हो सकता है जब उसमें सामाजिक, सांस्कृतिक और आर्थिक समानता हो। राष्ट्र के निर्माण में अहम भूमिका समाज के नागरिक की होती है...वही तय करता है समाज की दिशा और दशा। तथा समाज के नागरिक की मनोदशा का निर्माण शिक्षा तय करती है।



              ...पवन कुमार (दिल्ली विश्वविद्यालय के छात्र हैं।


हमारे सम्मानित रचनाकार का दावा है कि यह उनकी स्वरचित रचना है।







बुधवार, 22 मई 2019

आपको चाहना

आपको चाहना ।
मेरी आदतों का पुलिंदा बन गया।
जब सोचा छोड़ दूँगा तुम्हे।
वही शाम मेरी शहादत का रहनुमा बन गया।
अब बता ऐ खुदा!
किसने बनाई ऐसी कुदरत?
क्योंकि मेरी एक-एक साँस।
उसका नपा-तुला तराजू बन गया।
लेकिन एक तो जबरजस्त बात है उसमें।
जब-जब सोचा।
वो दिन ही शमाँ से बंध गया।
न जाने क्यों।
आपको चाहना।
मेरी आदतों का पुलिंदा बन गया।
..अंकित चौरसिया (रिसर्च स्कॉलर)

मंगलवार, 30 अप्रैल 2019

मेरे पिता

मेरे पिता ने मुझे जिंदगी में 
सबसे बड़ा तोहफा दिया, 
उन्होंने मुझ में यकीन किया,

मेरे पिता ने पंख दिए उड़ने के लिए,
मां ने मुझे उडने का मौका दिया
 एक हौसले से भरी जिंदगी,
और जीने का अवसर दिया
 
तेरा यूं कहना हौसला बुलंद रख 
मंजिल मिल ही जाएगी भरोसा रख 
खुद पर राहें आसान हो ही जाएंगी

यह व्यथा नहीं है मेरी यह तो सच्चाई है 
संघर्ष के गर्भ से निकली इच्छाओं की कहानी।।।
टीना कर्मवीर (सामाजिक कार्यकर्ता और  शोधार्थी हरियाणा)

हमारे सम्मानित रचनाकार का दावा है कि यह उनकी स्वरचित रचना है

रविवार, 21 अप्रैल 2019

माँ की ममता

माँ की ममता
कई सलतनतें रही होंगी,
पर कोई मां सा न रहा होगा

बाहों मे तो बहुतो ने लिया है,
पर गोद में तो मां ने ही लिया होगा

खाना तो बाहर भी मिलता है,
पर प्यार मिलाकर खाना मां ने ही बनाया होगा

फिकी चीजें भी जब मिठी हो जाती थी,
वो छू दे अगर राख वो भी कीमती हो जाती थी

महीनों तक अपनी कोख में रखा संभाल के,
मां के अलावा सालों तक सीने से किसी और ने न लगाया होगा

अपना ज़ूखाम न देखा,दर्द न देखा
हल्दी वाला दूध तो मां ने हमें ही पिलाया
होगा

कहते हैं धरती पर भगवान मां के रूप में मिलता है,
मूरत को भी कोई ऐसे नहीं ठूकराता जैसे लोगों ने मां को ठूकराया होगा

घर को संभलते संभालते एक कोने तक आ गई जो!
रसोई से चारपाई तक, खाना कोई उसके लिए न लाया होगा

बूढ़ी आँखें ठंडक ले लेती हैं बच्चे को देखकर,
देखकर भी अनदेखा जैसे माँ को किया किसी पराये को भी न किया होगा

सिर्फ चार पाए हैं चारपाई में लेकिन, घर में उसकी जगह नहीं
इतना अकेला तो उसे शादी मे विदाई के वक्त भी न लगा होगा

शिकवे तो लोग कर देते होंगे मगर,
मरते दम तक जो बस दुआओं से नवाजे़ तुम्हें, ऐसा इंसान न रहा होगा

लोग तो बहुत आए होंगे जिंदगी में,
पर कोई मां सा न आया होगा

रिश्ते तो बहुत रहे होंगे मगर
कोई मां सा न रहा होगा!


अन्नू अग्रवाल (दिल्ली विश्वविद्यालय की पूर्व छात्रा हैं)

हमारे सम्मानित रचनाकार का दावा है कि यह उनकी स्वरचित रचना है

शनिवार, 20 अप्रैल 2019

राजनीति और लोकतंत्र।

जब हुआ मतदान।
खूब बाँटा गया।
दारू और राशन-दान।

देश की जनता।
समझ वैठी।
यही है।
राजनीति का।
अमूल्य-दान।

लेकिन।
भईया जब वैठे।
गद्दी पर।
वही राशन-दान।

बन गया।
बिलकुल विषपान।
क्योंकि अब हुआ।
अपना-अपना।
राम-राम।

लेकिन।
इसका क्या हो।
समाधान।

इसलिए।
भारतीय राजनीतिक पार्टियों को।
अंकित चौरसिया का प्रणाम।🙏
डॉ. अंकित चौरसिया(दिल्ली विश्वविद्यालय)
हमारे सम्मानित रचनाकार का दावा है कि यह उनकी स्वरचित रचना है

शुक्रवार, 19 अप्रैल 2019

कब संम्भव...

हर चाँद में वों मंजर ही हो 
हर प्रेमी उसे कुछ यूँ झाँके  
हर वक्त रहे चाँदनी सफर 
यह कब संम्भव , यह कब संम्भव ॥ 

हर रोज जेहन में आये तूं
बस मीठा ही मुस्काये तूं  
हर प्यार भरी नजरे तेरी 
कुछ चुपके से कह जायें यूँ
हर बात जो लुक - छुप हो जाये 
यह कब सम्भव , यह कब संम्भव ॥ 

तू आकर मेरा आंगन देख 
ये रुखा –सुखा सावन देख 
तेरे होने की पहचान हो 
दिल में तेरा एहसान न हो 
यह कब संम्भव, यह कब संम्भव ॥

जीवन तो यूँ ही कट जाता है 
एहसास दिलो में रह जाता है
हम –तुम एक साँस में न बंधते 
यह दर्द भला ही क्यों होता 
एक राह पर चलते –चलते यूँ 
दो प्यार के प्यासे न मिलते 
यह कब संम्भव, यह कब संम्भव ॥

कोई शख्स जिसे यूँ बांध ले तू 
अपनी बाहों में साध ले तू 
हर रोज वो जिन्दा ,यूँ ही जी ले 
तेरे प्यार बिना यह कब संम्भव 
यह कब संम्भव, यह कब संम्भव ॥
 ...सुचित कुमार यादव (दिल्ली विश्वविद्यालय में पीएचडी स्कॉलर है और हिन्दू कॉलेज में राजनितिक विज्ञान पढ़ाते हैं)


शुक्रवार, 12 अप्रैल 2019

स्पात की

जो है यह हाल
तो आगे क्या होगा,
बनी स्पात की दुनियां
यहां मनुष्य का क्या होगा।

खो दिया सब आज यहां
ना जाने आगे क्या होगा,
देखि यह दहल जातु है दिल
यहां मनुष्यता का क्या होगा।

संवेदनहीन बने हैं सब
इस अचला का क्या होगा,
पवन सी पवन ना रही अब
आखिरी सांस का क्या होगा।

सुधर लो समय कम बचा है
ना जाने आगे क्या होगा,
हश्र हालत सा होगा अब
पिरोये धागे में भोगा।।
..पवन कुमार(दिल्ली विश्वविद्यालय के छात्र हैं)
हमारे सम्मानित रचनाकार का दावा है कि यह उनकी स्वरचिय रचना है

बुधवार, 10 अप्रैल 2019

टेम्पो चालक

देखा मैंने एक टेम्पो चालक
था गंध भरा अच्छा था लुक,
वह बात देशभक्ति की करे
न जिये ज़िन्दगी न है मरे।

वह नंगे पैरों था बैठा
हर बात में रहता था ऐंठा,
थी विबाइयाँ उसकी
जो करे बात मीठी मीठी।

आज पढ़े लिखे है देशभक्त
वह करें प्रेम,हैं प्रेम भक्त,
वह दिन भर रोज़ कमाता था
दो-चार रोटियां खाता था।

ये शिक्षित सड़क पर उतर चले
जो हाथ बड़े में ये हैं पले,
हित देश में इनके न हाथ चलें
हर रोज़ देशभक्ति की बात गढ़े।

है कुमार देख ये सकुचाता
हैं देशभक्त,इन्हें क्या आता?
..पवन कुमार(दिल्ली विश्वविद्यालय के छात्र हैं)
हमारे सम्मानित रचनाकार का दावा है कि यह उनकी स्वरचित रचना है

कहाँ है सब्र...

 सब्र चाहिए मुझे।
परेशां हूँ ।
निकलता हूँ।
अपने डेरे से रोज।
उसके लिए।
कहाँ मिलेगा।
ये सब्र।
सब्र चाहिए मुझे।
मन अपने गति से।
भी अधिक।
ढूंढ़ता है उसे।
पूरी दुनिया।
देखता है मन।
पूरे सब्र से।
लेकिन सब है।
बस नही है।
वो ही।
सब्र नही है।
कहाँ ये सब्र।
सब्र चाहिए मुझे।
सब कहते है।
सब्र से रहो।
सब्र से खाओ।
सब्र से पीओ।
सब्र से घूमो।
सब्र से जीओ।
सब्र से पढ़ो।
इश्क़ में सब्र रखो।
सब्र से चलो।
सब्र से चिंतन करो।
कहाँ ये सब्र।
मुझे चाहिए सब्र।
पोथी भी पढ़ी।
वो भी सब्र से।
सुना है।
ये सब्र को।
समझा देती है।
यहाँ भी।
मन अपनी गति में।
सब्र न रखा ।
फिर न मिला मुझे।
तो बस वो ही सब्र।
कहाँ है ये सब्र।
सब्र चाहिए मुझे।
फिर से सोचा।
घूमते है जहाँ।
पढ़ते है पोथी।
लेकिन सबके बाद।
मिला सच में।
सब्र के रूप में
एक सब्र का सच।
सब सब्र देते है।
सब सब्र बताते है।
सब्र मिलता है।
अपने आप से ।
अपने सब्र से।
अपने आत्म से।
अपने सोच से।
अपने भरम।
उसे खत्म करने से।
मिलता है सब्र।
सच को सब्र से।
सुनने में।
अब यही है सब्र।
अभी मिला है सब्र।
ढूंढ़ लिया है सब्र।
अब नही छूटेगा।
ऐसा सब्र।
मुझे चाहिए था सब्र।
अब सब्र से हूँ।
बस यही तो है सब्र।

रचनाकार-
अंकित चौरसिया (दिल्ली विश्वविद्यालय में पीएचडी के छात्र हैं)
                                          हमारे रचनाकार का दावा है कि यह उनकी स्वरचित रचना है

मंगलवार, 9 अप्रैल 2019

वीरता की कहानी

दे गये हमको
वो वीरता की कहानी,
जिन्होंने देश के नाम
कर दी अपनी जवानी।

अपने खून से
देश को सींचा था,
दुश्मनों की आवाज़ को
वीरों ने मींसा था।

कदमों से कदम मिलाये थे
सबने गीत प्रेम के गाये थे,
ये अमर कहानियां हैं जग में
कांटे थे उनके पग - पग में।

था लक्ष्य आपका स्वदेशी
हम आज भी आप पर गर्व करें,
दुश्मनों से अब
हम भी ना डरें।

कोई भी भरता हो अपनी जेब
मगर हम बांटते हैं देश प्रेम
यदि इन राहों पर
पवन भी चल पाए
तो देश प्रेम में मधु लाए।
...पवन कुमार(दिल्ली विश्वविद्यालय के छात्र हैं)
हमारे सम्मानित रचनाकार का दावा है कि यह उनकी स्वरचित रचना है