बिटिया

बिटिया बिन घर-आँगन सूना, छोड़ चली बाबूल की गलियाँ।। ना सुनाई देती पायल की खनक, बिटिया तेरे बिन घर-आँगन सूना। छा गया है घर गलियों में सन्नाटा, कौन गुथेगा घर में आंटा।। कहाँ गई मेरी बिटिया जो घर आने पर, मुस्कान लिए बड़े प्यार से पानी देती थी, पहली दफा

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गुलाम आज़ादी

मुबारक हो, मुबारक हो आज़ाद हिंद के गुलाम नागरिकों को आज़ादी मुबारक हो। गुलाम हो, गुलाम हो आज भी तुम अपने कामुक विचारों के गुलाम हो। शिकार हो, शिकार हो आज भी तुम गली चौराहों में घूमती फिरती अपनी गंदी नज़र का शिकार हो। बेहाल हो, बेहाल हो आज भी

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कश्मीर समस्या

काश्मीर में सभी बग़ावत करने वाला शातिर है डाल फुट का मज़ा उठाने वाला कोई माहिर है जो सोच रहा है ये चिंगारी जला ही देगी जन्नत को मैं कहता हूं ये सोचने वाला सबसे बड़ा जाहिल है ।। कभी ना बिगड़ी है कश्मीरियत नफरत फैलाने वालों से बिगड़ के

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मेरे प्यारे अटल

मेरे प्यारे अटल! तुम कहाँ गुम हुए? कहाँ गुम हुए ? मेरे प्यारे अटल! तुम में था एक कवि, और एक नेता सरल। तुम कहाँ गुम हुए ? मेरे प्यारे अटल! हैं तुम्हें खोजते मेरे दोनों नयन, हो कहाँ तुम, कहाँ कर रहे हो शयन? आओ वापिस तुम्हें देखना चाहता

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वृद्ध की पीड़ा

चक्कर खा कभी-कभी गिर जाता हूँ रखता हूँ बेखबर इस खबर से तुमको मेरे लाल कि… न हो तू परेशान अब मैं बूढ़ा हो गया हूँ फटे कपड़ों पर रफू करवा काम चलाता हूँ न रखता हूँ ख्वाहिशें नयी कपड़ों कि मेरे लाल अब मैं बूढ़ा है गया हूँ मेरे

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राखी का त्यौहार

ऐसा नहीं है कि इस सावन पूर्णिमा की मुझे कोई ख़ुशी नहीं होती, और मेरा दिल नही करता कि किसी की कलाई पर, वो सुंदर सी राखी बांध दूँ, जो हर साल अलग-अलग रंगों और डिज़ाइन की खरीदा करती हूँ, पर नहीं बांधती राखी अब मैं किसी की कलाई पर

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तिरंगा

आओ तिरंगा लहराये आज तिरंगा फहराये स्वतन्त्रता दिवस का पर्व है चलो मिलकर खुशियाँ मनाये तीन रंग में बना है निर्मल देश का गर्व बढाता है भारतीय जनमानस में देशप्रेम की हिलोरें भरता है केसरिया रंग शौर्य लाता श्वेत शांति प्रतीक है हरियाली है हरित रंग देश की समृद्धि दर्शाता

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एक वेश्या, कविता

  आखिर मनुष्य ही होती है ये वेश्या क्यों नहीं समझता समाज इनको  अपना हिस्सा – क्यों किया इनको तुम ने  दरकिनार   अपनी भूख मिटाने के लिए बना लेते हो  इनको अपना  नहीं तो इनके कोठे (घर) को भी तुम गाली देते हो  आखिर क्यों    सुनो शायद वह

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आखिर कब तक

आखिर कब तक मुझे यूंही नफरत करोगे। मिट्टी में मिलने के बाद तो एक दिन तुम याद करोगे। आखिर कब तक अपने दिल की धड़कनों से मुझे दूर करोगे। सांसे रुक जाने के बाद तो अपनी धड़कनों में तो एक दिन मुझे सुनोगे। आखिर कब तक मेरे दर्द पर मुस्कुराओ

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कमल फूल

इंसान कमल फूल की तरह जियों क्योंकि- कमल फूल कीचड़ में खिलता है, लेकिन सभी इंसान  उसे चाहने लगती है; इसलिए कि अपने दु:ख में रहता है दुसरे के उपयोग में आता है । इंसान यदि बनना है कमल फूल की तरह बनों अपने लाख दु:ख में भी दुसरे की

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