कुछ ऐसा अनोखा है यहां के रिश्तों में,
जो टूट- जुड़ कर पूरा होता है किश्तों में।
प्रेम-प्रेम सभी करते हमेशा पर
न जाना कभी प्रेम कहते किसे हैं?

जाने नहीं उसूल, सुने इसके कई हैं,
देखा है डूबे, पार होते कई हैं।
दो जन के मिलते ही न हो जाते प्रेमी,
दो मन का मिलना भी होता जरूरी।

करते परस्पर न जाने कितनी नीति,
होती सफ़ल किन्तु कितनों की प्रीति?
सागर बड़ा, ढेरों नावें जहां हैं!
लगे जाके पार, ऐसा टापू कहाँ है?

नाजुक है रिश्ता रखते वे संजोकर,
ग़र भूल हो भी तो माने वे क्योंकर?
डूब जाती किश्ती, बीच सागर में जाकर,
छोड़ देता पतवार मांझी, बवंडर में आकर!

दुनिया भरी है, प्रेम करने वालों से पूरी,
लो हम भी चले आये, ले ख़्वाहिश अधूरी,
सौंपी है हमने जिसे जीवन की नैया,
ले जाएगा पार वो निश्छल खिवैया..!!
…कमलेश (दिल्ली विश्वविद्यालय की छात्रा हैं)
हमारे सम्मानित रचनाकार का दावा है कि यह उनकी स्वरचित रचना है।

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