आप भी…
आप भी इस देश की संतान हैं ,
किसने आपको पथभ्रष्ट किया है ,
या स्वयं ही भूल गए हो ,
आखिर तो आप भी इंसान हैं।

किस चाह से हो लड़ रहे ,
क्यों नफरतें फैला रहे ,
लोगों में डर बैठा रहे ,
क्या यही ईमान हैं।

दबा देते हो चीखें ,
 नहीं सिसकने भी देते ,
बुझा देते हो नन्हे चराग़ को भी ,
क्या तुम्हारे भीतर हृदय नहीं पाषाण हैं।

ना बच्चों को बख्श रहे हो ,
ना बुजुर्गों को बख्श रहे हो ,
क्यों झकझोर रहे समाज को ,
क्या बनाना चाहते हर एक को शैतान हैं।

मार रहे जिन्हें आप ,
समझ किसी गैर का ,
जब समझोगे खुद को भारतीय तब जानोगे ,
वह भी तो आपकी ही संतान हैं।
…धर्मवीर सिंह ( दिल्ली विश्वविद्यालय के पूर्व छात्र हैं)

हमारे सम्मानित रचनाकार का दावा है कि यह उनकी स्वरचित रचना है

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