क्या किस्मत का है 
फैंसला ना हमें पता है, 
फिर हर बार क्यों 
देती ये हमें सजा है,

ये दुनिया ये दीवारें, 
कहती रहती है हर पल 
लड़की ही क्यों सुने, 
सबकी बातें खुद पर l

बरी क्यों न हो जाती 
या पैदा ही ऐसे होती,
कि लड़का बनकर , 
सब बातें करने वालों को धोती l 

या फिर लटका देती 
उन्हें उल्टा,
ताकि उल्टी करके ही 
उनका दिमाग साफ होता l 

लेकिन हर एक को 
क्यों जवाब दें,
कि हम सही और गलत आप हैं,

कि लड़की होना 
नहीं कोई अपराध है,

उनकी उल्टी वाली बातों पर 
तो पानी मारना भी खराब है,
क्योकि साफ सुथरे वो नहीं, 
हम और आप हैं ….. l
..कीर्ति(दिल्ली विश्वविद्यालय की पूर्व छात्रा हैं) 
हमारे सम्मानित रचनाकार का दावा है कि यह उनकी स्वरचित रचना है।

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