गुलामी का दौर एकदम नहीं आया था भारत में…
गुलामी का दौर एकदम नहीं आया था भारत में…समय के साथ उसकी सीमा बढ़ती गयी जिससे देश को गुलामी जैसी जकड़न से गुजरना पड़ा।
भारत में ईस्टइंडिया कंपनी का आगमन हुआ जो भारतवासियों का विश्वास जीतने में सफल रही थी। यही कारण था कि भारत जैसे प्रबुद्ध देश पर ईस्टइंडिया कंपनी और अंग्रेजों ने शासन किया। इस कंपनी ने देशवासियों के विश्वास को जीता साथ उनकी खुशहाली नए कारोबार, नई चेतना का प्रस्ताव रखा और अपनी सत्ता स्थापित की और समय के साथ इस कंपनी का विस्तार हुआ। इस कंपनी का कम समय में काफ़ी विस्तार हुआ, यह धीरे-धीरे भारत पर अपना कब्जा करने लगी जिसमें वह सफल भी हुई । इस कंपनी ने सर्वप्रथम अपनी जगह आम जन में बनाई…जिससे उनका भरोसा जीता जा सके। दरअसल ऐसा प्रतीत होता है कि आज भारत की समकालीन राजनीतिक पार्टियां भी इसी का अनुसरण कर रही हैं।
 यक़ीनन किसी व्यक्ति या समाज को अपने भरोसे में लाना उसकी शिक्षा और बुद्धिमत्ता को दर्शाता है…क्योंकि शिक्षित और जागरूक व्यक्ति बिना सोचे समझे किसी व्यक्ति या संस्था पर भरोसा नहीं कर सकता। क्योंकि उसे अपने अधिकारों का निर्वाह करना आता है उन्हें जीना आता है। किसी देश या समाज के लोगों को मानसिक गुलाम बनाना है तो उसकी शिक्षा व्यवस्था को ध्वस्त किया जाना अति आवश्यक है। बहरहाल जिस व्यक्ति या समाज की शिक्षा पर प्रहार हो जाये वह व्यक्ति स्वतः मानसिक गुलाम हो जाता है…उसे गुलाम बनाने की आवश्यकता नहीं पड़ती।

    शिक्षा समाज का एक ऐसा हिस्सा है जिससे व्यक्ति ही क्या समाज को भी गुलाम बनाया जा सकता है। क्योंकि जबतक व्यक्ति शिक्षित नहीं होगा वह अपने अधिकारों के प्रति सजग नहीं हो सकता यही कारण है कि आज की राजनीतिक पार्टियां इसका लाभ उठाती हैं और समकालीन शिक्षा प्रणाली में हस्तक्षेप करती हैं। आज केंद्रीय विश्वविद्यालयों में ही नहीं केंद्रीय स्कूलों और राज्यस्तरीय स्कूलों में भी सरकारें हस्तक्षेप करती हैं। दरअसल सरकारी स्कूलों की ख़स्ता हालत पहले से ही है जिसके ऊपर सरकार उनका निजीकरण करने पर विचार कर रही है (इंटरनेट से जानकारी प्राप्त)। जिससे गरीब तबकों के बच्चे शिक्षा से वंचित हो जाएंगे…दरअसल यह पहलू बेरोजगारी से जुड़ा है, आज देश में बेरोजगारी दर ७.२% हो गयी है जो भयाभय है। जब तक छात्र (बच्चे) के परिवार की आमदनी नहीं होगी वह छात्र नहीं पढ़ सकता।
    कारण कोई हो लेकिन उसका जुड़ाव हरेक बिंदु से होता है। सामाजिक, राजनीतिक, आर्थिक, धार्मिक आदि एक दूसरे से सहसंबंध रखते हैं इनका एक दूसरे के बिना कोई अस्तित्व नहीं है। ये समस्याएं हरेक समय और काल में थीं इनका निवारण भी किया गया और यह निवारण तभी संभव था जब उसकी आलोचना, समालोचना हुई जिसमें अहम भूमिका साहित्य ने निभाई और हर काल के समकालीन साहित्यकारों और कवियों ने इन सभी कारणों की भरपूर निन्दा की।
      आधुनिककाल में भारतेंदु युग के साहित्यकारों ने, सत्ता के पक्ष में भी लिखा और उसका विरोध भी किया। भारतेंदु हरिश्चंद्र ख़ुद लिखते हैं…
         “अंगरेज राज सुख साज सजे सब भारी
            पै धन विदेस चलि जात इहै अति ख़्वारी।।”

भारतेंदु की इन पंक्तियों में सत्ता की आलोचना भी है और सराहना भी। इन्होंने हर्ष भी प्रकट किया है और दुःख भी। द्विवेदी युग में सत्ता की आलोचना ही ज्यादातर मिलती है जिसमें सरकार की नीतियों का बारीकी से विरोध किया है।

         भारत के स्वतंत्र होने के बाद भी कई ऐसे कई लेखक और कवि हुए जिन्होंने सरकार पर सीधा तंज कसा और उसकी आलोचना की। जिनमें नागार्जुन, रघुवीर सहाय, दुष्यंत कुमार, धूमिल इत्यादि प्रमुख हैं। नागार्जुन कहते हैं…
            “रामराज में अबकी रावण नंगा होकर नाचा है,
                   सूरत शकल वही है भैया बदला केवल ढांचा है” 

रघुवीर सहाय-
          “राष्ट्रगीत में भला कौन वह भारत भाग्य विधाता है”
                  फटा सुथन्ना पहने जिसका गन हर चरना गाता है”

दुष्यंत कुमार-
                “मत कहो आकाश में कोहरा घना है
                       यह किसी की व्यक्तिगत आलोचना है”

और…
              “हो गयी है पीर पर्वत सी पिघलनी चाहिए,
                   इस हिमालय से कोई गंगा निकलनी चाहिए
                   सिर्फ हंगामा खड़ा करना मेरा मक़सद नहीं
                   मेरी कोशिश है कि ये सूरत बदलनी चाहिए”

और धूमिल ने लिखा है कि-
     “यह जनतंत्र जिसकी रोज सैकड़ो बार हत्या होती है और हर बार वह भेड़ियों की जुबान पर जिंदा है।”
और…
              “अपने यहां संसद तेली की वह घानी है
                      जिंसमें आधा तेल और आधा पानी है”

दरअसल इन्होंने जनता की आवाज को बुलंद कर सत्ता पर सीधा प्रहार किया है। लेकिन वर्तमान समय में ऐसे कवि या लेखक कम ही मिलेंगे और जो मिलते हैं वो कुछ अपवाद होते हैं। आज ज्यादातर साहित्यकार सत्ता के पक्षधर है यह पहली बार संभव हुआ। आज लेखक सत्ता की नीतियों से खुश तथा समाज की समस्याओं से पूरी तरह रूबरू हो चुका है!  जिसे समाज में कुछ खामियां नजर नहीं आतीं। दरअसल किसी भी काल का शासन तभी सुचारू रूप से चल सकता है जब उसकी आलोचना, समालोचना हो लेकिन आज ऐसा नहीं…आज के ज्यादातर लेखक सत्ता के अनुयायी हैं। यहां मुझे रागदरबारी के वो शब्द याद आ रहे हैं जो एक शिक्षक के संदर्भ में लिखे गए हैं….
      एक राष्ट्र तभी समृद्ध हो सकता है जब उसमें सामाजिक, सांस्कृतिक और आर्थिक समानता हो। राष्ट्र के निर्माण में अहम भूमिका समाज के नागरिक की होती है…वही तय करता है समाज की दिशा और दशा। तथा समाज के नागरिक की मनोदशा का निर्माण शिक्षा तय करती है।

              …पवन कुमार (दिल्ली विश्वविद्यालय के छात्र हैं।

हमारे सम्मानित रचनाकार का दावा है कि यह उनकी स्वरचित रचना है।







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