चूड़ियाँ भी अपनी हद जानती हैं
चूड़ियाँ भी अपनी हद जानती है
रंगों का भी मतलब जानती है
 कलाई का फर्क जानती है

नीली,पीली,हरी,गुलाबी,
नारंगी रंगों की होती है चूड़ियाँ 
पर इसमें लाल रंग जो है न 
वो चूड़ी होने से पहले 
अपने रंग की कद्र जानता है
अपने रंग की हद जानता है

ये नाजुक कलाईयों में बँधा गोल जाल है
देखने में बहुत सुंदर होती है  चूड़ियाँ 
ये सबको मोहित करने का हुनर जानती है

यूँ तो चूड़ियाँ चुप रहती है पर 
हाथ में रहते हुए बहुत कुछ बोलती है, 
बस देखने वाला सुन पाएं
इसकी खनखन बहुत प्यारी है,
पर ये खनखन कभी- कभी शोर भी बन जाती है

ये चूड़ियाँ कलाईयों का फर्क जानती है
समय का महत्त्व जानती है
क्यूँकि ये चूड़ियाँ अपनी हद जानती है
  …सोनिया(शोधार्थी, महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय)

हमारे सम्मानित रचनाकार का दावा है कि यह उनकी स्वरचित रचना है।

Leave comment

Your email address will not be published. Required fields are marked with *.