देखा मैंने एक टेम्पो चालक
था गंध भरा अच्छा था लुक,
वह बात देशभक्ति की करे
न जिये ज़िन्दगी न है मरे।

वह नंगे पैरों था बैठा
हर बात में रहता था ऐंठा,
थी विबाइयाँ उसकी
जो करे बात मीठी मीठी।

आज पढ़े लिखे है देशभक्त
वह करें प्रेम,हैं प्रेम भक्त,
वह दिन भर रोज़ कमाता था
दो-चार रोटियां खाता था।

ये शिक्षित सड़क पर उतर चले
जो हाथ बड़े में ये हैं पले,
हित देश में इनके न हाथ चलें
हर रोज़ देशभक्ति की बात गढ़े।

है कुमार देख ये सकुचाता
हैं देशभक्त,इन्हें क्या आता?

..पवन कुमार(दिल्ली विश्वविद्यालय के छात्र हैं)
हमारे सम्मानित रचनाकार का दावा है कि यह उनकी स्वरचित रचना है

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