बिखरते रिश्ते…
अपनों का ये कैसा मंज़र देख रहा हूँ,
मैं आज रिश्तों को बिखरता देख रहा हूँ।

जिनके आँगन में गूंजती थी कभी,
मेरे बचपन की किलकारियां,
वहां आज अपनी जवानी को सिसकता देख रहा हूँ,
मैं आज रिश्तों को बिखरता देख रहा हूँ।

कभी था जिस घर में वो मंज़र प्यार का,
आज उन्ही के हाथों में,
नफ़रत का खंजर देख रहा हूँ,
मैं आज रिश्तों को बिखरता देख रहा हूँ।

जिन रिश्तों ने कभी सींचा था अपनेपन को,
उन्ही रिश्तों को आज ज़हर का बीज बोते देख रहा हूँ,
मैं आज रिश्तों को बिखरता देख रहा हूँ।

जो चरित्र मैंने देखे थे,
वो अब नहीं रहे,
आज उनको ही चरित्रहीन होते देख रहा हूँ,
मैं आज रिश्तों को बिखरता देख रहा हूँ।

मैं भरोसा करूं तो किस पर करूं,
भरोसेमंदों को ही दगाबाज़ी करते देख रहा हूँ,
ख़ून के रिश्तों को ही,
ख़ूनी होते देख रहा हूँ
मैं आज रिश्तों को बिखरता देख रहा हूँ।

अहमियत रखती थी मेरी शख़्सियत, कभी जिनके लिए,
उन्हीं के सामने अपना क़िरदार निराधार देख रहा हूँ,
बेबस अपना वजूद देख रहा हूँ,
मैं आज रिश्तों को बिखरता देख रहा हूँ।

जो करते थे कभी दीन-ईमान की बातें,
उनको ही बेईमान होते देख रहा हूँ,
अदब करने वालों को ही,
बेअदब होते देख रहा हूँ
मैं आज रिश्तों को बिखरता देख रहा हूँ।

जो आँखे मेरे लिए रखती थीं कभी समुन्दर प्यार का,
उन्हीं आँखों में आज नफ़रत का सैलाब देख रहा हूँ,
मैं आज रिश्तों को बिखरता देख रहा हूँ।

जो हमसे मिलते थे कभी अंदाज़-ए-मोहब्बत के दरमियाँ,
उन्हीं से खुद को नज़रंदाज़ करते देख रहा हूँ,
मैं आज रिश्तों को बिखरता देख रहा हूँ।
मैं आज रिश्तों को बिखरता देख रहा हूँ।।
एम. आरिफ़ खान, पीएचडी स्कॉलर(दिल्ली विश्वविद्यालय) श्यामा प्रसाद मुखर्जी कॉलेज में राजनीतिक विज्ञान पढ़ाते हैं।

 

हमारे सम्मानित रचनाकार का दावा है कि यह उनकी स्वरचित रचना है।



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