माँ की ममता
माँ की ममता
कई सलतनतें रही होंगी,
पर कोई मां सा न रहा होगा

बाहों मे तो बहुतो ने लिया है,
पर गोद में तो मां ने ही लिया होगा

खाना तो बाहर भी मिलता है,
पर प्यार मिलाकर खाना मां ने ही बनाया होगा

फिकी चीजें भी जब मिठी हो जाती थी,
वो छू दे अगर राख वो भी कीमती हो जाती थी

महीनों तक अपनी कोख में रखा संभाल के,
मां के अलावा सालों तक सीने से किसी और ने न लगाया होगा

अपना ज़ूखाम न देखा,दर्द न देखा
हल्दी वाला दूध तो मां ने हमें ही पिलाया
होगा

कहते हैं धरती पर भगवान मां के रूप में मिलता है,
मूरत को भी कोई ऐसे नहीं ठूकराता जैसे लोगों ने मां को ठूकराया होगा

घर को संभलते संभालते एक कोने तक आ गई जो!
रसोई से चारपाई तक, खाना कोई उसके लिए न लाया होगा

बूढ़ी आँखें ठंडक ले लेती हैं बच्चे को देखकर,
देखकर भी अनदेखा जैसे माँ को किया किसी पराये को भी न किया होगा

सिर्फ चार पाए हैं चारपाई में लेकिन, घर में उसकी जगह नहीं
इतना अकेला तो उसे शादी मे विदाई के वक्त भी न लगा होगा

शिकवे तो लोग कर देते होंगे मगर,
मरते दम तक जो बस दुआओं से नवाजे़ तुम्हें, ऐसा इंसान न रहा होगा

लोग तो बहुत आए होंगे जिंदगी में,
पर कोई मां सा न आया होगा

रिश्ते तो बहुत रहे होंगे मगर
कोई मां सा न रहा होगा!

अन्नू अग्रवाल (दिल्ली विश्वविद्यालय की पूर्व छात्रा हैं)


हमारे सम्मानित रचनाकार का दावा है कि यह उनकी स्वरचित रचना है


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