मैं लिखूं के ना लिखूं
मैं लिखूं के ना लिखूं ,
मुझपर दबाव है कि
मैं उनके हक में लिखूं
मेरी कलम सदा विरोध।

मैं लिखूं के ना लिखूं ,
क्या चुप हो जाऊं
मान लूं इसे खुदा फरमान
जिये जाऊं चुपचाप।

मैं लिखूं के ना लिखूं ,
मुझे डर है कहीं देख
मेरे शब्द समझ जाएं
मेरे भीतर के डर को।

मैं लिखूं के ना लिखूं ,
पल पल टूटता है धैर्य
क्या गुनाह यूँही बढ़ता
जायेगा, बढ़ेगी अमानवीयता।

मैं लिखूं के ना लिखूं ,
कातिल कौन है पता नहीं
इंसाफ़ किसे चाहिए साहब
बस किसी को झुकाना है।

मैं लिखूं के ना लिखूं ,
सत्ता का रूप घिनौना है
भावनाओं में बहता भारत
राजनेताओं का खिलौना है।
समर्पित-बंगाल हिंसा

..धर्मवीर सिंह( दिल्ली विश्वविद्यालय के पूर्व छात्र )

हमारे सम्मानित रचनाकार का दावा है कि यह उनकी स्वरचित रचना है।

Leave comment

Your email address will not be published. Required fields are marked with *.