राजनीति और लोकतंत्र।
जब हुआ मतदान।
खूब बाँटा गया।
दारू और राशन-दान।

देश की जनता।
समझ वैठी।
यही है।
राजनीति का।
अमूल्य-दान।

लेकिन।
भईया जब वैठे।
गद्दी पर।
वही राशन-दान।

बन गया।
बिलकुल विषपान।
क्योंकि अब हुआ।
अपना-अपना।
राम-राम।

लेकिन।
इसका क्या हो।
समाधान।

इसलिए।
भारतीय राजनीतिक पार्टियों को।
अंकित चौरसिया का प्रणाम।🙏
डॉ. अंकित चौरसिया(दिल्ली विश्वविद्यालय)

हमारे सम्मानित रचनाकार का दावा है कि यह उनकी स्वरचित रचना है

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