हर पल तुम्हें याद करती हूँ…
हर पल तुम्हें याद करती हूँ, 
क्यौं तुमसे इतना प्यार करती हूँ। 
तुम दर्द इतना देते हो,  
हर साँस में मुझको 
फिर क्यों ये जिंदगी , 
मैं तुम्हारे नाम करती हूँ। 

तुम काला साया हो, 
मैं धूप हूँ सुबह की
फिर क्यों तुम्हारी कालिमा में ,
खुद मैं ढलती हूँ। 

तुम वो परिंदा हो 
जिसका न कोई घर, 
मैं ढूँढती तुझमें पनाह 
फिर भी न जाने क्यों। 

तुम आसूंओं में डूबी 
इक परछाई से, 
मैं फिर भी तेरी बारिशों में भीगती रहूँ। 

तुम मोह का एक सागर , 
मैं मुक्ति का किनारा
फिर क्यों मैं तेरे बंधन से छूट न सकूँ। 

क्या ये तेरा प्यार है, 
जिसे हराना है
या फिर मेरी भूल ,
जिसे फिर सुधारना है।
कीर्ति ( दिल्ली विश्वविद्यालय की पूर्व छात्रा हैं)

हमारे सम्मानित रचनाकार का दावा है कि यह उनकी स्वरचित रचना है

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