अल्लाह औ ईश्वर

मेरे यहाँ एक नया नया मन्दिर खुला है,नाम हालांकि प्राचीन रखा है।लालची लोग आएं जल्दी – जल्दीमन्दिर को प्राचीन बनाये जल्दी – जल्दीइसलिए भंडारा सुबह-शाम चला रखा है। लालची लोग जाते हैं कुछ मांगनेऔर देकर आ जाते हैं यह भी नहींविचारते जिससे खुद मांगने जा रहे हैंउसे भला क्या दे

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मैं लिखूं के ना लिखूं

मैं लिखूं के ना लिखूं , मुझपर दबाव है किमैं उनके हक में लिखूंमेरी कलम सदा विरोध। मैं लिखूं के ना लिखूं ,क्या चुप हो जाऊंमान लूं इसे खुदा फरमानजिये जाऊं चुपचाप। मैं लिखूं के ना लिखूं ,मुझे डर है कहीं देखमेरे शब्द समझ जाएंमेरे भीतर के डर को। मैं

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संतुष्ट है भारत

मैं चाहती थी एक कविता लिखना पर वो शब्द आते नहीं मेरे ज़हन में जो बयां कर सके उन संवेदनाओ को, जो महसूस होती हैं उन हर एक माता-पिताओं को, जिनके नोनिहालों ने ऑक्सीजन की कमी से तोड़ दी थीं सांसे, छोड़ दिया था शरीर, और चले गए इस दुनिया

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आप भी…

आप भी इस देश की संतान हैं , किसने आपको पथभ्रष्ट किया है , या स्वयं ही भूल गए हो , आखिर तो आप भी इंसान हैं। किस चाह से हो लड़ रहे , क्यों नफरतें फैला रहे , लोगों में डर बैठा रहे , क्या यही ईमान हैं। दबा

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डॉ पायल तड़वी का गुनाह क्या था..?

यही की वह महाराष्ट्र के #आदिवासी परिवार से थी। नेशनल मेडिकल कॉलेज में पोस्ट ग्रेजुएट (एम.डी.) की  पढाई कर रही थी..!!कॉलेज की कुछ सीनियर, तुच्छ मगजी सवर्ण महिलाओ ने…जाति के नाम पर डॉ पायल तड़वी को प्रताड़ित करना शुरू कर दिया। व्हाटसअप ग्रुप में उसकी जाति को लेकर मजाक उड़ाया

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गुलामी का दौर एकदम नहीं आया था भारत में…

गुलामी का दौर एकदम नहीं आया था भारत में…समय के साथ उसकी सीमा बढ़ती गयी जिससे देश को गुलामी जैसी जकड़न से गुजरना पड़ा। भारत में ईस्टइंडिया कंपनी का आगमन हुआ जो भारतवासियों का विश्वास जीतने में सफल रही थी। यही कारण था कि भारत जैसे प्रबुद्ध देश पर ईस्टइंडिया

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आपको चाहना

आपको चाहना । मेरी आदतों का पुलिंदा बन गया। जब सोचा छोड़ दूँगा तुम्हे। वही शाम मेरी शहादत का रहनुमा बन गया। अब बता ऐ खुदा! किसने बनाई ऐसी कुदरत? क्योंकि मेरी एक-एक साँस। उसका नपा-तुला तराजू बन गया। लेकिन एक तो जबरजस्त बात है उसमें। जब-जब सोचा। वो दिन

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राजनीति और लोकतंत्र।

जब हुआ मतदान। खूब बाँटा गया। दारू और राशन-दान। देश की जनता। समझ वैठी। यही है। राजनीति का। अमूल्य-दान। लेकिन। भईया जब वैठे। गद्दी पर। वही राशन-दान। बन गया। बिलकुल विषपान। क्योंकि अब हुआ। अपना-अपना। राम-राम। लेकिन। इसका क्या हो। समाधान। इसलिए। भारतीय राजनीतिक पार्टियों को। अंकित चौरसिया का प्रणाम।🙏

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स्पात की

जो है यह हालतो आगे क्या होगा,बनी स्पात की दुनियांयहां मनुष्य का क्या होगा। खो दिया सब आज यहांना जाने आगे क्या होगा,देखि यह दहल जातु है दिलयहां मनुष्यता का क्या होगा। संवेदनहीन बने हैं सबइस अचला का क्या होगा,पवन सी पवन ना रही अबआखिरी सांस का क्या होगा। सुधर

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टेम्पो चालक

देखा मैंने एक टेम्पो चालकथा गंध भरा अच्छा था लुक,वह बात देशभक्ति की करेन जिये ज़िन्दगी न है मरे। वह नंगे पैरों था बैठाहर बात में रहता था ऐंठा,थी विबाइयाँ उसकीजो करे बात मीठी मीठी। आज पढ़े लिखे है देशभक्तवह करें प्रेम,हैं प्रेम भक्त,वह दिन भर रोज़ कमाता थादो-चार रोटियां

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