बिखरते रिश्ते…

अपनों का ये कैसा मंज़र देख रहा हूँ, मैं आज रिश्तों को बिखरता देख रहा हूँ। जिनके आँगन में गूंजती थी कभी, मेरे बचपन की किलकारियां, वहां आज अपनी जवानी को सिसकता देख रहा हूँ, मैं आज रिश्तों को बिखरता देख रहा हूँ। कभी था जिस घर में वो मंज़र

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दो जन

अक्सर ऐसा होता है जब दो “जन” बात करते हैं एक रिश्ता बन जाता है फिर प्रेम भरी तकरार का समाँ बन्ध सा जाता है उम्मीद जुड़ जाती है कही निराशा हो जाती है “उसकी” फ़िक्र भीतर साँस लेती है अक्सर ऐसा होता है… ख्याल सो जाते हैं नींद जागती

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संतुष्ट है भारत

मैं चाहती थी एक कविता लिखना पर वो शब्द आते नहीं मेरे ज़हन में जो बयां कर सके उन संवेदनाओ को, जो महसूस होती हैं उन हर एक माता-पिताओं को, जिनके नोनिहालों ने ऑक्सीजन की कमी से तोड़ दी थीं सांसे, छोड़ दिया था शरीर, और चले गए इस दुनिया

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बीती यादों को लेकर

बीती यादों को लेकर ही मत जियो मरो.. आगे और भी लोग आएंगे.. जिन पर तुम्हारा दिल आएगा जो बीत गयी सो बात गयी  अब बात कुछ करो नई पुराने में रखा क्या है  अपना तो हर पल नया है  जो सामने है उसे स्वीकार करो  जो चला गया उसे

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तुम्हारे जाने के बाद —-

हाँ मैंने रोया बहुत, तुम्हारे जाने के बाद  कई रात नहीं सोया, तुम्हारे जाने के बाद  हमने बहुत कुछ खोया तुम्हारे जाने के बाद बड़ी मुश्किलों से खुद को संजोया, तुम्हारे जाने के बाद  सब कुछ बहुत याद आता है, तुम्हारे जाने के बाद ॥     मैं जो तुमसे

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हर पल तुम्हें याद करती हूँ…

हर पल तुम्हें याद करती हूँ,  क्यौं तुमसे इतना प्यार करती हूँ।  तुम दर्द इतना देते हो,   हर साँस में मुझको  फिर क्यों ये जिंदगी ,  मैं तुम्हारे नाम करती हूँ।  तुम काला साया हो,  मैं धूप हूँ सुबह की फिर क्यों तुम्हारी कालिमा में , खुद मैं ढलती हूँ। 

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आपको चाहना

आपको चाहना । मेरी आदतों का पुलिंदा बन गया। जब सोचा छोड़ दूँगा तुम्हे। वही शाम मेरी शहादत का रहनुमा बन गया। अब बता ऐ खुदा! किसने बनाई ऐसी कुदरत? क्योंकि मेरी एक-एक साँस। उसका नपा-तुला तराजू बन गया। लेकिन एक तो जबरजस्त बात है उसमें। जब-जब सोचा। वो दिन

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