एक वेश्या, कविता
 

आखिर मनुष्य ही होती है ये वेश्या

क्यों नहीं समझता समाज इनको 
अपना हिस्सा – क्यों किया इनको तुम ने 
दरकिनार
 
अपनी भूख मिटाने के लिए बना लेते हो 
इनको अपना 
नहीं तो इनके कोठे (घर) को भी तुम गाली देते हो 
आखिर क्यों 
 
सुनो शायद वह कोठा नहीं 
घर है उनका 
गाली देने से पहले याद कर लेना उस पल 
को जिस समय वह तुमको सहती है 
वह भी अपने में लीन होती है 
तुम भी अपने में लीन रहो 
और मत दो गाली इनको 
 
यह भी मनुष्य है – समाज का एक हिस्सा 
जीने दो इनको 
मत दो गाली  
 
लेखक : प्रमोद कुमार मीणा दिल्ली विश्विद्यालय के छात्र हैं 

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