रविवार, 8 दिसंबर 2019

दबी आवाज़ें


मज़दूरों के हथौड़ी 




ठोंकने की आवाज़,

सब्जीवाले की 

दाम चीख़ती आवाज़,

विश्वविद्यालयों की

गूँजती बेक़रार आवाज़,

सुबह-सुबह अज़ान और 

मुकद्दस भजनों की आवाज़,

बस्तियों में ढील हेरती 

युवतियों की आवाज़,

सड़कों पर कोलतार बिछाते 

रोडरोलर की आवाज़,

पोखरों में नंगे नहाते 

बच्चों की आवाज़,

खेत को मथते 

ट्रैक्टरों की आवाज़,

झुंड में घूमते कुत्तों के 

भौंकने की आवाज़,

ट्रॉली में ईंट ढोते

लेबरों की आवाज़,

साक़ी और बदमस्त 

शराबियों की आवाज़,

स्कूलों की छुट्टी करतीं

घण्टियों की आवाज़,

ट्रेन में नल्ली बेचते

छोटे बच्चे की आवाज़,

चाँद को निहारते

दो उश्शाक़ों की आवाज़,

खेल दिखाते

मदारी की आवाज़,

क़ज़ा पर

राम-नाम-सत्य की आवाज़,

मसाईबों से 

शिकस्त खाने की आवाज़,

लाख और कांच से बनी

चूड़ियों की आवाज़,

आईसक्रीम-गोलगप्पे बेचते

अंकल की आवाज़,

मुख़ालिफ़त करती

आमादा अफ़राद की आवाज़,

हक़-हुक़ूक़ औ' 

जज़्बात की आवाज़,


दब जाती है

उस निज़ाम की आवाज़ के आगे

जो शबाब पर है

और मसल देना चाहती है

हर उस आवाज़ को 

जो उसका फ़ैज़ नहीं करतीं!


आयुष चतुर्वेदी

  छात्र (कक्षा 11)

   वाराणसी






मंगलवार, 3 दिसंबर 2019

बदल चुका हूं

आज मैं, वो नही


जो पहले था
मैं बदल चुका हूं
..........
पहले था सीधा साधा,
नेकदिल, विश्वासी, संजिदगी भरा
पर आज
कितना बदल चुका हूँ ।
माया के जंजीरों से जकड़ चुका हुँ ।
देखता मौका हूँ,
जब मिलता,मार लेता हूँ ।
आज
छिप गया है पाप मुझमे,
मानसिक विकार मुझमे,
पैसे का प्यार मुझें,
ठगने का अधिकार मुझमे,
दुश्मनी का वार मुझमे,
यारो का खुद्दार मुझमे,
नाते रिश्ते यार दोस्त में,
स्वार्थ का जहनूम मुझमें
देखो तो
कितना बदल चुका हूँ ।
था करता आदर बड़ों का
लोक लाज थी तन में
भावों का सम्मान करना,
रुचता था इस मन में
झुक जाना नारी के सम्मान में
अपनो के प्यार में,यारों के दीदार में,
कितना मुझको भाता था
पर आज
कितना बदल चुका हूँ ।
चूकता ना मौका मैं
नार से खिलवार का,
सरोबार का,व्यापार का,
ताश के पत्तो जैसे
लाश का, सर्वनाश का
देखो तो सही,
रहम मेरा मर गया है,
इस जाहिल संसार में,
शेष कुछ भी न बचा है
इस कोठे-से मकान में,
मैं कितना बदल गया हूँ ।
मैं मर -सा गया हूँ ।


कैलाश चंद्र 'माही'
उत्तरासर-झुंझुनूं

सोमवार, 2 दिसंबर 2019

दोहरा चरित्र

तुम कहते हो महिला की

कोई जाति नहीं होती। 

फिर शोषण की कैसे

अपनी जाति हो सकती है।


तुम कहते हो आज के

दौर में कहाँ है जातिवाद 

फिर क्यों हमें पायल तडवी

की तरह मौत दे देते हो 


तुम ना जानो दर्द हमारा,

आकर देखो फिर बोलो

तुम्हे बस आता है

हम पर व्यंग्य करना


तुम क्या जानो समस्या हमारी

पितृसत्ता जातिवाद, निरक्षरता, तंगहाली, पूर्वाग्रह 

इतनी छोटी कहां है मेरी आजादी कि

तुम्हें और तुम्हारे जैसों को पूरी जगह ना हो”

 

मेरा तो बस इतना है मानना

दलित स्त्रियों के चिंतन और संघर्ष कठिन हैं

पर वह लड़ रही है और लड़ती रहेगीं


टीना कर्मवीर सामाजिक कार्यकर्ता

,स्वतंत्र विश्लेषक, शोधार्थी

रविवार, 27 अक्तूबर 2019

चुनावाँ की टेम में

चुनावाँ की टेम मै भोत मजा आवीं हीं ।
ओ मजो बै दूर बैठ्या ई उठावीं हैं ।
---------
जद बेरो पड़ै कै
बसुन्दरा आरी है ।
तो,
भक्तां कै पाँख लाग्यावीं हीं ।
पूरो जोर सोर, खुमारी बै,
रेली मै उतारी हीं ।
-------
अयाँ'ई
जद बेरो पड़ै कै
गैलोत की रेली है ।
तो
लोग उफणना चालू हो ज्यावैं हीं ।
चाल ढाल सारी बदल ज्यावीं हीं ।
कइयां कै मन मै कुलबुलाट जागै,
तो
कई सारा फुफ्कारै लाग ज्यावीं हीं ।
कई सोच बिचार करै,
तो
कई उठावापटक ।
ई जोस जोस् माईं करै बै,
देखण हाला नाटक ।
-----------
समजण हालां दूर बैठ्या,
बैठ्या ईं नीगा मारीं हीं ।
कदै आतां न देखीं
कदै जातां न देखीं
ई टेम को पूरो मजो,
बैठ्या बैठ्या ईं उठावीं हीं ।
----------
----------
कांगरेस की रेली मै जाणै सै,
लोग खींहि
ओ कांगरेसी है ।
अर
भाजपा की रेली मै जाणै सै
खै कै
ओ भाजपा को है ।
पण
मैनै तो
न्यू लागै है कै,
घणकरां कै
दोन्यू कान्या'ईं हात मारीं हीं ।
----------
ई फड़फड़ाहट मै बाकै,
पाव आदपा हात आ ज्यावै है ।
जकी को तेल चोपड़ बणाय बै,
पूरी पाँच साल निकाली हीं ।
चुनावाँ को पुरो मजो बै दूर बैठ्या ई उठावै हीं
बै दूर बैठ्या ई उठावीं हीं ।
दूर बैठ्या ईं उठावीं हीं ।
-----------
-कैलाश चन्द्र 'माही'
प्राध्यापक-उदयपुर

दिवाली

चंपक वन की शान निराली
देखो आई है दीवाली
भालू  ने की है खूब सफाई
खरगोश भी लाए आज मिठाईबंदर  ने जलाए दीप
कोयल सुनाए मीठे गीत
हाथी बोला सब आ जाओ
नाचो-गाओ मौज मनाओ
वनराज ने भी सबको गले लगाया
जंगल में मंगल छाया ,
सबका मन हरषाया

  कवियत्री निभा कुमारी 


      राजनगर , मधुबनी , बिहार 

मंगलवार, 15 अक्तूबर 2019

दोहे

  

  जीवन भर नर्तन किया, फिर ली आंखें मूँद ।

   गर्म तवे पर नाचती, ज्यों छन-छन-छन बूँद ।।

  ****

'अंकुर'! मन के कुम्भ में, डाल प्रेम का इत्र ।

 पीकर  महके मित्र बन, सारे शत्रु विचित्र ।।

   ****

रंच नहीं कटुता कहीं ,ऐसा हो संसार  ।

 तब भव - सागर पार हो, तेरा-मेरा प्यार  ।।

   ****

आप सभी से पूछिए, मिलकर उनका क्षेम ।

जन गण मन में 'आपके', प्रति बस जाए प्रेम  ।

 ***

काम-क्रोध-मद-लोभ ही, है जिसका आधार।

कभी नहीं मिलता उसे, रघुनन्दन का  प्यार।।

*****

पछताएं मत आप अब, करें हाथ से सैर ।

 वक़्त भागता जा रहा , सर पर रखकर पैर।।

 ****

चुहिया भी निकली नहीं, खोदे खूब पहाड़।

ताड़ प्रश्न; हल तिल नहीं, तिल बन बैठा  ताड़।

   *****

तन पर तम छा जाय पर, बुझे न मन का दीप।

मन है मोती प्रेम का, तन है उसका सीप।।

गुरुवार, 10 अक्तूबर 2019

अभी तो कुतरे गए हैं पंख

तबाही दूर नहीं, सोने की चिड़िया की
अभी तो कुतरे गए हैं पंख,
आने वाले वक्त में,
खत्म हो जाएंगे जंगल,
दूषित हो जाएंगी नदियां,
फटने लगेंगे कान के पर्दे,
पर आधुनिक मानव,अभी सुविधाएं चाहता है।


भारत, अब भी विकासशील है
सम्भवतः पचास साल बाद भी रहेगा
विकास की 'रेस' में,दौड़ रहा निरन्तर
प्रकृति के दोहन में,जरा पीछे नहीं हटेगा।


खत्म कर दिए जाते हैं,जंगल के जंगल
यहां विकास के नाम पर,
फिर बिछा दी जातीं है सड़कें और पटरियां,
निर्मित होती जा रहीं गगनचुंबी इमारतें।


लोग नहीं करते परवाह जंगलों की,
पर वे जमीन से खत्म होकर
उग आते हैं उनके अपने भीतर,
जिन्हें काट पाने का सामर्थ्य
नहीं जुटा पाते वे अंत तक।


सड़कों पर सरपट दौड़ती गाड़ियां
रोज़ उगलती हैं विषैला जहर,
जो धीरे धीरे घुलता शरीर में
और विकास से पहले ही, आ जाती है मौत।


शायद अर्थ से ही 'अर्थ' का विनाश हो रहा
क्या यहीं रुकेगी ये विनाशलीला,
या ला पटकेगीे हमे उस खण्डहर में,
जहां भावनाएँ दीवारों से कुरेदनी पड़ेगी...!


बिटिया सयानी हो गई

बिटिया सयानी हो गई,

मां के बराबर हो गई है।

खोज कर अच्छा सा रिश्ता,

हाथ पीले कर दो इसके।


हो गया अब क्या होगा पढ़ के,

जाए अब वो घर बसाए।

देखे अपना घर बार अब वो,

समझे थोड़ी दुनिया दारी।


अब बात ऐसी हो रही है,

रिश्तेदारों की मीटिंग में।

बिटिया बेचारी शांत होकर,

पर्दे के पीछे से सुन रही है।


सुन के ये सब सोचती है,

देखती है एक बार खुद को।

क्या अब बदल गया है ऐसा,

क्या परिवर्तन नया हुआ है।


थी अभी तक आजाद जो वो,

कॉलेज के सपने थी सजाए।

सोचती थी जीत लेगी,

दुनिया की सारी मंजिलों को।


पर क्या पता था ,जल्द ही

पैरों में होंगी बेड़ियां।

करना होगा चौका - बर्तन,

घेर लेंगी मजबूरियां।


सुन कर सबकी बात सारी,

सपने तैर गए आंखों में।

देख कर के भविष्य अपना,

मूंद ली उसने भी आंखें।


देख कर के भविष्य अपना

मूंद ली उसने भी आंखें।


हैप्पी इंडिपेंडेन्स डे

कपड़े मैले कुचले
पाँव नंगे
चेहरा धूल से सना
और आग-सी चिलचिलाती धूप,
हाथ में प्लास्टिक के
तिरंगों का गुच्छा लिए
शहर की सबसे तंग
रेड लाइट पर,
सस्ती-महंगी सभी गाड़ियों की
शीशें पीटतीं
वो गूंगी लड़की।
नज़र तक न फेरते
कारों वाले,
कभी इन्तजार कर
तो कभी दुत्कारने पर
आगे बढ़ जाते उसके पैर।


रेड लाइट पर टाइम काटने को
कोई कभी पूछ डालता-
''कैसे दिए?''
दाहिने हाथ की पाँचों उँगलियाँ खोलकर
वह बताती-
''दस के दो ''
ये सोचकर कि वो झंडे लेगा
वो रुक जाती
पर लाइट होते ही वो निकल पड़ता।


गाड़ी के साथ कुछ दूर
भागकर पैसे लेने पड़ते
तो कभी दौड़कर पैसा पकड़ाना पड़ता
कई बार तो पैसे भी ना मिल पाते,
हॉर्न बजातीं कारें-बाइकें
बड़ी-बड़ी गाड़ियाँ
बड़ी तेज़ी-से
उसके दाएँ-बाएँ से गुजरतीं,
तो कुछ उसे
गरियाते हुए निकल जाते-
''अरे मरेगी क्या?''
उस बीच से निकलने की
उसकी वो जद्दोजहद
और उसका जीवन से ये
निर्मोह संघर्ष देख
सिर झन्ना जाता
और हृदय सहम जाता,
कभी किनारे पहुँचने से पहले
तो कभी पहुँचते ही
रेड लाइट हो जाती,
और वह पुनः लौट पड़ती
शीशें पीटने।
एक बड़ी-सी कार आकर रुकी
शीशा सरका
"फ्लैग्स लेना है बेटा?''
चलो दीदी को हैप्पी इंडिपेंडेंस डे बोल दो-
''हैप्पी इंडिपेंडेंस डे दी ''


अपनी ही उम्र की वो लड़की
और उसकी वो बात,
उसका वो दूध-सा सफेद चेहरा
उसके रंग-बिरंगे नए-नए
सुंदर कपड़े,
उसको लगातार दुलारती
उसकी वो 'मॉम ',
और न जाने क्या-क्या,
एक दम से सब
उसकी नजरों के सामने घूम जातीं,
जिसकी माँ ने तीन झंडे लिए थे
और वो भी दस में,
उसकी धड़कनें बढ़ने लगतीं
और पसीने की एक धार
उसकी कनपट्टी से निकल पड़ती,
और अचानक हॉर्न की तेज़ आवाज़
उसे एक झटके में जगा देती
दिन के इस भयानक स्वप्न से।


आँखें मींचते
और पसीने से तर
सड़क के डिवाइडर से उठकर
और इधर-उधर नजरें दौड़ा,
वह पुनः निकल पड़ती
आज़ादी मनाने।


भूपेंद्र


( शोधार्थी,(पीएच-डी) दिल्ली विश्वविद्यालय)

शुक्रवार, 4 अक्तूबर 2019

पुलवामा

क्या होगा भयानक दृश्य वहां
वीरों ने गवाये प्राण जहां
कतरा कतरा था खून गिरा
थम गया समय ही पल में वहां


चल रहे लोग चलतीं गाड़ी
हुआ रक्त तेज रुक गयीं नाड़ी
झकझोर दिया इस हमले ने
देखें रस्ता घर माँ ठाढ़ी


थी उम्र अभी बचपने की
कुरबानी दे दी सपनों की
वो गया देश रक्षा हित में
आ बाहों में लेटा अपनों की


एक पिता की लाठी टूट गयी
एक माँ ठाढ़ी जो रुठ गयी
बहना की डोली उठने से पहले
उसकी जिंदगी थी छूट गयी


पत्नी अब तक है सदमे में
बच्चे बिलखें सब अपने में
भयभीत कलम मेरी लिखने को
जैसे हुआ है ये सब सपने में


पवन कुमार,
(दिल्ली विश्वविद्यालय के छात्र हैं)

बुधवार, 2 अक्तूबर 2019

गांधी जयंती विशेष

महात्मा गांधी सत्य और अहिंसा के पुजारी माने जाते है जिन्होंने सत्य और अहिंसा का पाठ पढ़ा कर हमें गुलामी जैसी बेड़ियों को तोड़कर बाहर निकलना सिखाया है। गांधी जी का जन्म 2 अक्टूबर 1869 ई में गुजरात के पोरबंदर में हुआ था और आज हम 2 अक्टूबर को गांधी जयंती के रूप में मनाते हैं। गांधी जयंती का मतलब सिर्फ गांधी जी की फोटो पर फूलों के हार चढ़ाना नहीं है ना ही उन पर बड़े-बड़े भाषण देना और न ही कविताएं बोलना है गांधी जयंती का महत्व तब ही सार्थक माना जा सकता है।जब हम गांधी जी की शिक्षाओं को विचारों को अपने जीवन में अपनाएं।
गांधी जी कहते थे,
"अगर आप दुनिया को सुधारना चाहते हो तो आज से ही खुद को सुधारना शुरू कर दे"


गांधी जी के इन विचारों का यही अर्थ है कि पहले हमें खुद को सुधारना होगा,खुद में एक बदलाव लेकर आना होगा तो ही हम समाज को सुधार सकते हैं,समाज को बदल सकते है  क्योंकि जो इंसान खुद को सुधार सकता है वही समाज को सुधार सकता है समाज में बदलाव ला सकता है। गांधी जी कहते थे,
"आदमी अक्सर वो बन जाता है जो वो होने में यकीन करता है. अगर मैं खुद से यह कहता रहूँ कि मैं फ़लां चीज नहीं कर सकता, तो यह संभव है कि मैं शायद सचमुच वो करने में असमर्थ हो जाऊं. इसके विपरीत, अगर मैं यह यकीन करूँ कि मैं ये कर सकता हूँ, तो मैं निश्चित रूप से उसे करने की क्षमता पा लूँगा, भले ही शुरू में मेरे पास वो क्षमता ना रही हो।"


  गांधीजी धर्म को व्यक्तित्व के विकास के लिए आवश्यक समझते थे परंतु धार्मिक आडंबर और कट्‌टरता से दूर रहते थे। परंतु आज हम उनकी शिक्षाओं पर ना चल कर धर्म के नाम पर आपस में लड़ मर रहे हैं धर्म के नाम पर नेता वोट मांग रहे हैं और हम वोट दे रहें हैं। गांधी जी कहते थे,
" मैं उसे धार्मिक कहता हूँ जो दूसरों का दर्द समझता है।"


गांधीजी को सत्य व अहिंसा का पुजारी कहा जाता है उन्होंने केवल भारत के लोगों को ही नहीं विश्व के समस्त लोगों को सत्य व अहिंसा का पालन करने का संदेश दिया हैं। उन्होंने भारत देश को जो सदियों से गुलाम था कभी मुगलों का कभी अंग्रेजों का उसको सत्य व अहिंसा के द्वारा ही स्वतंत्र करवाया। वह कहते थे,
"मेरा धर्म सत्य और अहिंसा पर आधारित है. सत्य मेरा भगवान है. अहिंसा उसे पाने का साधन।"
हमें भी गांधीजी के सत्य और अहिंसा को अपनाना होगा तभी हम जीवन में आगे बढ़ सकते हैं क्योंकि जो इंसान सत्य नहीं बोल सकता वह सत्य के लिए जी भी नहीं सकता। गांधी जी ने अहिंसा को मानव तक ही सीमित नहीं रखा उन्होंने जानवरों के प्रति होने वाली अहिंसा का भी विरोध किया। गांधी जी कहते थे,
"एक देश की महानता और नैतिक प्रगति को इस बात से आँका जा सकता है कि वहां जानवरों से कैसे व्यवहार किया जाता है।"इसके अलावा गांधी जी ने बहुत सारी शिक्षाएं दी है जैसे:-समय का महत्व,समानता में विश्वास,पाप से घृणा करो,पापी से प्रेम करो,अपनी कमजोरियों की स्वीकारोक्ति,औरों की सेवा, प्रेम की शक्ति,अदम्य इच्छा शक्ति,औरत के प्रति अन्याय का विरोध,जीवन में कर्म का महत्व, जीवो की प्रति दयालुता इत्यादि। गांधी जी कहते थे,


"आप मुझे जंजीरों में जकड़ सकते हैं, यातना दे सकते हैं, यहाँ तक की आप इस शरीर को नष्ट कर सकते हैं, लेकिन आप कभी मेरे विचारों को कैद नहीं कर सकते"


अंत में अपनी कलम को विराम देते हुए यही कहूंगा कि वास्तव में हमें गांधी जयंती मनानी है तो इसका सही ढंग यही है कि हम गांधी जी की शिक्षाओं और विचारों को अपने जीवन में अपनाएं जिससे हम अपने साथ-साथ समाज में भी एक नया बदलाव लेकर सकें।


     राजीव डोगरा,कांगड़ा हिमाचल प्रदेश (युवा कवि लेखक)


(भाषा अध्यापक)
गवर्नमेंट हाई स्कूल,ठाकुरद्वारा।

सत्य और अहिंसा के पुजारी राष्ट्रपिता महात्मा गांधी

      देश के स्वतंत्रता संग्राम और आजादी के लिए अपने प्राणों की आहुति देने वाले राष्ट्रपिता  महात्मा गांधी की पुण्यतिथि को पूरे देश में शहीद दिवस के रूप में मनाया जाता है । वर्ष 1948  में महात्मा गांधी की नाथूराम गोडसे ने गोली मारकर हत्या कर दी थी,और उनकी हत्या ने पूरे देश को हिला कर रख दिया था । इस दिन महात्मा गांधी की समाधि स्थल राजघाट पर राष्ट्रपति, उपराष्ट्रपति, प्रधानमंत्री ,रक्षा मंत्री राष्ट्रपिता महात्मा गांधी को अपने कर कमलों से श्रद्धा सुमन अर्पित करते हैं। महात्मा गांधी की याद में पूरे देश में सभाएं आयोजित की जाती है।



एक कार्यक्रम के दौरान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने सभी जनसाधारण से अपील की है ,कि महात्मा गांधी की पुण्यतिथि के अवसर पर 2 मिनट का मौन अवश्य धारण करें । गांधी जी ने देश को आजाद कराने के लिए सत्याग्रह का रास्ता अपनाया, वे सदैव अहिंसा में विश्वास रखते थे, अपने जीवन काल के दौरान उन्होंने जनसाधारण को इसी का पाठ पढ़ाया । अफ्रीका से वापस आकर गांधीजी ने स्वयं को स्वतंत्रता संग्राम के आंदोलन में झोंक दिया। 1915 के बाद महात्मा गांधी ने अंग्रेजो के खिलाफ एक के बाद एक आंदोलन आरंभ किए, 1920 में असहयोग आंदोलन चलाया, फिर 1930 में नमक के अत्याचारी कानून को तोड़ने के लिए आंदोलन किया ,दलितों के पक्ष में बढ़-चढ़कर भाग लिया,  उसके बाद 1942 में भारत छोड़ो आंदोलन चलाया, आखिर उनके अनथक प्रयत्नों के आगे अंग्रेजों को अपनी हार माननी ही पड़ी और 15 अगस्त 1947 को भारत अंग्रेजों की बेड़ियों से आजाद हो गया। महात्मा गांधी जी ने जिस रास्ते पर चलकर भारत को  आजाद कराया ,वह रास्ता सत्य और अहिंसा पर आधारित था। उनका प्रयोग हमारे जीवन के कई पडावों में अत्यधिक मददगार साबित होता है। उन्होंने सदैव अच्छा व्यवहार करने, सच बोलने की सीख और जरूरतमंद लोगों की सहायता करने की शिक्षा दी।


महात्मा गांधी जी सत्य को ही भगवान मानते थे । वह जाति, धर्म, लिंग के आधार पर किए जाने वाली भेदभाव के सदैव खिलाफ थे ।महात्मा गांधी सत्य और अहिंसा को ही मानवता का सबसे कीमती उपहार मानते है अगर हम महात्मा गांधी के अनथक प्रयासों को सार्थक करना चाहते हैं और भारत को  उन्नति और समृद्धि की  राहों  की ओर ले जाना चाहते हैं ,तो हमें उनकी सीख पर चलना होगा ,तभी हम एक उज्जवल भारत के सपने को पूर्णता पूरा कर सकते हैं और समाज में व्याप्त बुराइयों का मुकाबला डट कर कर सकते हैं।


अमित डोगरा

(पी एच.डी, गुरु नानक देव विश्वविद्यालय अमृतसर)

स्वीकार है मुझे

मुझे स्वीकार है
हां हां मैं दलित हूं
स्वीकार है मुझे, कि मैं
निम्न जाति का पाप हूं
गर्भ में तो, मैं भी पला हूं
फिर क्यों किसी का अभिशाप हूं
मुझे स्वीकार है, मेरा नीच होना
गन्दगी में जीना दूसरो का मलवा ढोना
हां हां मैं दलित हूं
अपने कर्मो से अपने धर्मों से
तुम बड़े हो ,मुझसे नही मेरी नियति से बड़े
मैं पाप हूं अभिशाप हूं ,
अपनी माँ के गर्भ का अभिशाप
मेरी पीड़ा सहनीय है,
क्योंकि में सहना जानता हूं
तुम्हारी गालियों और अत्याचारों को पहचानता हूं
जीता हूं उन गंदी बस्तियों में आज भी
जूठन खाता हूं, तुम्हारी मैं आज भी,
बस करो ये अत्याचार हमपर ,
मुझे स्वीकार है
हां हां मुझे स्वीकार है
मेरा दलित होना
मुझे स्वीकार है ।


नाम – लक्ष्मी (पीएचडी हिंदी jnu)

रविवार, 29 सितंबर 2019

गंधर्व विवाह


ऑनर किलिंग की शिकार पत्रकार निरूपमा पाठक को याद करते हुए



मुझे नहीं मालुम
तुम्हारी हत्या हुई
या
तुमने की
आत्महत्या
हां,
कह सकती हूं इतना
दोनों ही परिस्थितियों में
सिद्ध नहीं हुए, किसी
के प्रयोजन
हो सकता है
सोचा हो तुमने
गर, प्रेम से मेरे
झुक रहा शर्म से
मां-बाप का सिर
वे नहीं चाहते
अपनाना ‘प्रिय’ को
और तुम स्वयं
हो न सकी इतनी आधुनिक
जो रोज- रोज बदलो प्रेमी
तुमने तो माना,
प्रेम का प्रस्फुटन
होता है एक बार
मिलती है जन्नत
एक बार
समर्पित होता तन-मन
एक बार
और सोचा
पहुंचाकर प्रेम को
शादी के द्वार
कर लूं तन-मन का उद्धार
पर,मना न सकी
मानी पिता को;
जो नहीं जानते, क्या है मान
न तोड़ ही सकी
उनके अहंकार
या मनोविकार को

मिथ्याकांक्षा, कट्टरता
और कठोरता को
न सह सकी वे
धमकियां
जो मिली कई रूपों में
बरंबार
जब निकले पिता- भाई घर से
तब कांप उठा जिस्म तो
क्या आत्मा भी
कहीं कर न डालें वे मनमानी
और पहुंचा दें
‘प्रिय’ को
मौत के घर
तब बचाने को
प्रियतम को
दिखा वही इक रास्ता
जो बनता रहा है सदियों से
प्रेमियों का अंतिम हथियार
मिटा दूं स्वयं को
पर आई फिर रूकावट
उदर में पलता
प्रेम का अंश
मांग रहा था -
संसार में आने का अधिकार
दुविधा में पड़ी फिर तुम
द्वंद हुआ मन में
पिता -पुत्र में चुने किसे
कशमकश के बीच भी
तुमने चुना ‘ प्रिय ‘ को
और झूल गई फांसी पर
कौन जाने
तुम्हारे सामंतवादी पिता
अपने मान
में हो गए अंधे
होनहार पुत्री की अपेक्षा
भा रहा हो दंभ
और
रचा फिर
स्नेहपगे
भाई और जनक ने
तुम्हारे
लिए ष्डयंत्र
नहीं जानती तुम
रहा सब
उसी का हिस्सा
बाहर होने के
छदम आवरण
के भीतर
घुसे वे घर में
उन्हीं कलाइयों वाले हाथों ने
जिनपर बांधा करती थी
तुम राखी
और उसी पिता ने
करती रही जिसपर
गर्व और भरोसा अब तक
और उस मां ने
जिस पर तुमने
भी लुटाया स्नेह
और बनाया राजदार
बलि लेली तुम्हारी
पर निरूपमा
बताओ न
क्या सिद्ध हुए
उनके प्रयोजन?
क्या
अब लेंगी जनम नहीं
दूसरी निरूपमा?
वे तो रहे तुमसे भी
नादान
अब तो जान गई हैं
सारी
निरूपमा
पिता के मान ,
उनके दाव और चाल को
अब नहीं करेगी कोई
उनसे मनुहार
मांगेगी नहीं
विवाह के लिए
आशीर्वद
सब करेगी गंधर्व विवाह


...शेली खत्री

गुरुवार, 26 सितंबर 2019

राष्ट्र के मार्गदर्शक हैं शिक्षक

समाज में गुरू अर्थात शिक्षक का स्थान सबसे ऊपर है ।प्रारंभिक से लेकर अंतिम समय तक उनके द्वारा दी गयी शिक्षा से जीवन प्रकाशित होती रहती है।जो मनुष्य शिक्षक का सम्मान करता है सही मायने में शिक्षित है।शिक्षा से ही सम्मान है।आदर- भाव, आचार -विचार, व्यवहार और संस्कार जीतने भी गुण हैं सभी को सम्माहित कर कोई सही मायने में शिक्षक बनता है और लोगो को शिक्षा देता है।जिस प्रकार माली छोटे छोटे पौधों को बड़ा और फलदार वृक्ष बनाने में मेहनत करता है ठीक उसी तरह हमारे शिक्षक भी बच्चों के पीछे छुपे प्रतिभा को निखार कर उन्हें सही रास्ते पर ले जाते है और भविष्य के इंजीनियर, डाॅक्टर साइंटिस्ट और अधिकारी बनाते हैं।

शिक्षक के योगदानो को समाज कभी नही भूला पाता और भूलना भी नही चाहिये। शिक्षा देना भी एक कठिन तपस्या है।देने वाला भी सोचता है कि मैं आज जो कुछ इसे बता रहा हूँ वह यह कितना ग्रहण कर पाएगा उसके दिमाग में क्या चल रहा है?,इसका क्या असर होगा? ठीक डाॅक्टर की तरह जब वह मरीज को कोई दवा देता है तो उसके गुण दोष के बारे में अवश्य सोचता है। शिक्षा के साथ भी शिक्षक ऐसा जरूर सोचते हैं।

आज कल की पद्धति जरूर बदल गयी है लेकिन शिक्षा की धूरी आज भी शिक्षक ही हैं इस बात को सभी को समझना होगा और शिक्षक के प्रति आदिकाल वाला व्यवहार रखना ही होगा।लोग तनिक सी बातो पर शिक्षक के साथ दुर्वयहार कर देते है कोई शिक्षक आज कडाई नही बरतता क्योंकि हंगामा खडा हो जाता है मानवाधिकार संगठन,बाल अधिकार कानून सब पीछे पड़ जाते जिससे शिक्षको के मनोवल को आघात लगता है और वे उस रूचि से काम नही कर पाते।

समस्याएँ कई है आधुनिकतम चीजो का अभाव,पुस्तके,लाइब्रेरी प्रयोगशालायें, भवन तथा जर्जर पडे सिस्टम से नित जूझना पडता है। फिर भी वे शिक्षा जगत को आगे ले जाने के लिए कठिन परिश्रम तो करते ही है ।इसमें यदि लोगो का साथ मिल जाये तो और भी अच्छा होगा।


शिक्षक का समाज और राष्ट्र निर्माण में बडा महत्वपूर्ण स्थान रहा है।देशप्रेम संस्कार और सभ्यता एक स्कूल के द्वारा प्रदान की गयी शिक्षा से ही जागृत होकर हमारे लहू में दौडता है जो आगे चलकर देश समाज और परिवार के काम आता है हमारे आर्दश भी शिक्षक है हमारे निष्कर्ष भी शिक्षक ही हैं इसलिए शिक्षक का सम्मान हमेशा से हमारे समाज में सर्वोपरि माना गया है।

शिक्षा का व्यवसायीकरण शिक्षा जगत के लिए जहर है जिससे समाज और राष्ट्र को सोचना होगा। नित बढ़ते फीस ऊँची होती खर्च और पीठ पर लदते किताबो के बोझ ने जैसे शिक्षा की कमर तोड के रख दी।सरकारी स्कूलो में उदासीनता और प्राईवेट के पीछे भागते लोग यही सच्चाई बनकर रह गयी है ।सरकारी स्कूलों में शिक्षक की कमी सुविधाओ की कमी वही प्राईवेट स्कूलो में सुविधा के साथ हाईटेक व्यवस्था मौजूद रहता है जिसके कारण ऊँची फीस वसूली जाती है।एडमिशन से लेकर रोज बदलते स्लेबस की किताबो पर भी मोटी रकम ली जाती है ऐसे सिस्टमों के सहारे कैसे कम आमदनी वाले या मध्यमवर्गीय परिवार वाले अपने बच्चों को शिक्षा दे पाएँगे गंभीर चिंता का विषय बना हुआ है। हलांकि सरकारें भरसक इस खाई को कम करने के लिए प्रयासरत है लेकिन बिना कठोर निर्णय के समस्या का समाधान होना मुश्किल सा प्रतीत होता है।पांव फैलाये इस जहर में कोई हाथ डालना नही चाहता क्योंकि सभी शहर में नामी गिरामी व्यक्तियों के बच्चे पढ़ते हैं।

शिक्षा को समान बनाना एक विकल्प है जब एक संविधान एक राष्ट्र हो सकता है तो एक शिक्षा क्यों नही? एक स्लेबस क्यो नही ?एक शिक्षा होने से समान शिक्षा होगी समान किताबे होगी और समान विचारधारा का जन्म होगा जिससे पनप रही खाई कम हो सकेगी साथ ही साथ कम खर्च भी होगे।मेरा मानना है कि शिक्षा से जुडे लोग इस विषय पर अवश्य सोचते होंगे ।

                                  आशुतोष

                                  पटना बिहार

जल समाधि-: एक अवलोकन

      भारत और नेपाल दोनों देश एक दूसरे के पड़ोसी होने के साथ-साथ उनमें काफी समानताएं भी पाई जाती हैं। यही कारण है कि नेपाल की धरती पर साहित्यकार डॉ लोकनाथ वर्मा राहुल कृत उपन्यास जल समाधि  को पढ़ने पर ऐसा लगता है कि वह विदेशी धरती पर नहीं वरन् भारत के किसी गांव की धरा पर लिखा गया है। जिसके नायक है शंकर,जिसे लोग प्यार से काका कहते हैं। और जल कपट रहित सरल स्वभाव के छोटे बड़े का उचित सम्मान देने वाले शंकर काका कहलाने के उम्र के हैं भी।पर गांव के अधिकांश लोगों की तरह हैं वो अंगूठाछाप।


  गांव में कुछ लोग खबरी होते हैं वे बात को फ़ैलाने में माहिर होते हैं सुखवा  ये बात (काका को भगवान श्रीराम चंद्र जी मिले थे और अपनी बगल में बैठाकर काफी देर तक बात किया था) पल भर में पूरे गांव में फैला देता है। गांव वाले विश्वासी होते हैं इसका पता हमें इस बात से चलता है कि भगवान श्रीराम चंद्र से काका की मुलाकात वाली बात लोगों के कान में पड़ते ही काका के दरवाजे पर झाड़ फूंक कराने वालों की भीड़ लग जाती है। इसके साथ साथ गांव वाले अनपढ़ होने के बावजूद भी हाजिर जवाबी उस्ताद होते हैं। बजरंगी महाराज और सुखवा के वार्तालाप की एक बानगी- '' तुम अपने आंखिस देखें रह्यो ।"

" का देखब जरुरी है ।"

" जब तक न देखौ अपने नैना तब तक न मानो किसी के कहना।"

" महाराज एक बात बताना जाय का आप अपने बाबा के बाप का देखगा है।"

" नहीं।"

''मतलब उनका आप नाहीं मनते।"

   गांव किस तरह उच्च वर्ग के लोगों को निम्न वर्ग के लोगों को यकायक मिलने वाला सम्मान हजम नहीं होता।एक उदाहरण-" बजरंगी महाराज के छातिप सांप लोटत रहे,जब ऊ काका के प्रशंसा सुनत रहें।चिंतुवा ठीक होगा। चमत्कार होयगा।"इसी तरह सुकइया कहता है-"गये रहें भ इया , बजरंगी महाराज कहिन काका तीर जाव।दुलारे से भगाया दिहिन।"

शिक्षा में आते बदलाव के बारे में मास्टर मुरली कहते हैं-" शिक्षक और शिष्य केर अंतर्संबंध बहुत मधुर रहे लेकिन अब लरिकन से डेराय क परत है।"

   गांव में जिसकी लाठी उसकी भैंस वाली कहावत चरितार्थ होती है कल्लन मियां के चरित्र से।जो धन और जन बल में संपन्न होने के साथ-साथ राजनीतिक पहुंच वाले भी हैं जिसके कारण कोई उनके खिलाफ आवाज नहीं उठा सकता।ये जानते हुए भी कि कल्लन मियां नाममात्र का काम दिखाकर सरकारी रकम डकार गए।मगर कौन अपनी हड्डी पसली तुडवाये।यही स्थिति आज भारत के अधिकांश गांवों की है।

  दुनिया चांद और अन्य ग्रहों पर पहुंच रही है भारत के गांव में आज भी छूआछूत और भेदभाव व्याप्त है । जिससे अछूता रामपुर भी है-" महाराज लोग सोचें लागे इसके टठियक (थाली) गुड़ अऊर गगरक(गागर) पानी कइसे लीन जाय।जात केइ ई अछूत।" लेकिन इस बीमारी का इलाज मुरली के सहयोग से होता है। गांव में पिछड़े पन का कारण है संगठन का अभाव और दादागिरी।जिसका उपाय है-"बुराई से लड़ने खातिर जमात चाही , संगठन चाही।काका के अगुवाई में मुरली जैसे बुद्धिजीवियों के सहयोग से ऐसी संगठन बनता है कि रामपुर पुरे क्षेत्र में और देश की पत्र पत्रिकाओं में चर्चा का विषय बन जाता है और आपसी सहयोग से रामपुर गांव में बिना सरकारी मदद के ही सड़क ,अस्पताल, स्कूल बना जाता है खाद्यान्न उत्पादन औद्योगिक क्षेत्र में क्षेत्र में अग्रणी।


   लेकिन इस उपन्यास के नायक काका देश के ठेकेदारों (राजनेताओं)के चंगुल में फंस जाते हैं। प्रजातंत्र में परिवर्तन वाले काका के विचार से एक तरह की शांति पूर्ण क्रांति चिंगारी जल उठती है और राजनेताओं को अपना राजनीतिक कैरियर खतरे में नजर आता है। जिससे बौखलाए धर्म वीरसिंह नामक नेता ने रामपुर सामुहिक आटा चावल उद्योग का बना पैकेट डीलर को मिला कर खाद्यान्न विक्री पर रोक लगा देता है, जिसके कारण एक परिवार को भूख से परेशान होकर आत्महत्या करनी पड़ती है। इस घटना से क्षेत्र के अन्य नेताओं को भी राजनीति चमकाने का मौका मिलता है और वे भीड़ को लेकर शहर के गोदाम पर कब्जा कर लेते हैं। मास्टर मुरली और उनके सहायक को पुलिस भीड़ से बचाकर अस्पताल पहुंचाती है। नेताओं के उकसाने से बौखलाई भीड़ अनियंत्रित होकर शहर में तोड़फोड़ और शुरू कर देती है जिससे पुलिस प्रशासन को कर्फ्यू की घोषणा करनी पड़ती है।

   नेता लोग अपने समर्थकों के साथ रामपुर पहुंच कर भाषण बाजी शुरू कर देते हैं तभी लोगों को पता चलता है कि भाषणबाजी करने वाले नेता धर्म वीर सिंह के कारण यह घटना घटी और शहर में पुलिस इन्हें तलाश रही है।जो काका की हर बात सर आंखों पर रखने लगी थी ।काका की बात अनसुनी कर उग्र भीड़ नेता धर्म वीर सिंह और उनके समर्थकों को आग के हवाले कर देती है।

  हमारे देश में किस प्रकार अपराधी साक्ष्य के अभाव में और अपने चहेतों के सहयोग से सजा से बच जाते हैं इस का उदाहरण काका के शब्दों में-" इतने लोग का न्यायधीश फांसी न दै पाई।साक्ष्य के अभाव में हमका जज दोषी न ठहराय पाई,हम बरी होई जाइब।"

काका अपने समर्थकों से मुरली का अंतिम संस्कार करके लौटते वक्त कहते हैं-"अगर हम राजनीतिक परिवर्तन वाली बात न किये होइत तो ई घटना न घटत।दंगा भवा, कर्फ्यू लगा , मास्टर भाग्या के दुनिया छोडय के परा।नेतन‌का जिंदा जलाय दीनग।जब भगवान श्रीराम का अपने कर्मन केर ा प्रायश्चित जल समाधि लेइ के करय का परा।तो हमहुं अपने कर्मन केर प्रायश्चित क्रिस।"इतना कहकर काका पीछे गड्डे में कूद पड़े और देखते समाधिस्थ।सुखवा सोचता है कि ये जल समाधि भगवान श्रीराम चंद्र की है या काका की।

नेपाल की धरा पर लिखा गया ये उपन्यास भारतीय ग्राम जीवन का एक काका खींचते हुए उसमें सुधार और और भारतीय नेताओं के स्वार्थपूरण घृणित चाल को उजागर करता है।।

*****

उपन्यास-  जल समाधि ।                      

लेखक-    लोकनाथ वर्मा राहुल

प्रकाशक- ग्रामदीप साप्ताहिक हिंदी अवधी नेपाल

समीक्षक-उदय - राज वर्मा उदय

प्रकाशन वर्ष-2010

मूल्य- 500/

मंगलवार, 24 सितंबर 2019

मैं भी तो शहीद था

बारिशों के बाद जो

बीमारियों की घात हो

जंग का ऐलान तब

मेरी ख़ातिर हो चुका


मानकर आदेश को

मन में सोच देश को

ना ख़याल आज का

ना फ़िकर बाद का


सिर्फ़ एक लक्ष्य है

जो मुझे है भेदना

सीवर हो जहाँ रुका

वो मुझे है खोलना


बाल्टी, खपच्ची,रस्सी

ली उठा हाथ में

दो मेरे संगी भी

चल-चले थे साथ में


सुबह - सुबह की बात है

थोड़ी पर ये रात है

खोला ढक्कन जैसे ही

बदबू आई वैसे ही ।


कुछ नहीं था सूझता

कुछ नहीं था बूझता

बदन से कपड़े दूर कर

कमर में रस्सी बांधकर


सुरक्षा की ना बात है

ईश्वर का ही साथ है

आसपास मेरे सब

नाक-भौंह सिकोड़कर


साथ मे खड़े हैं सब

पास में ना कोई अब

मैं अकेला ही भला हूँ

जो भी हो देखेगा रब


काली-काली गंदगी

कितनों का ये मल है

और

कितनो की ये लेट्रिन


दुश्मन से लड़ना है अब

सोच छोड़ उतरना है अब

एक को पकड़ा के रस्सी

देह नरक की ओर बढ़ दी


गर्दन तक मल में  हूँ

आज हूँ बस कल ना हूँ

गैस अब चढ़ रहा है

सिर दर्द बढ़ रहा है ।


है अंधेरा ही अंधेरा

रोशनी की बात ना कर

जैसा अब ये हो रहा है

वैसा फिर ना साथ कर


बढ़ रहा हूँ,

चल रहा हूँ

कुछ नहीं सुनाई देता

कुछ नहीं दिखाई देता


मुहँ में मल घुस रहा है

नाक में भी ठुस रहा है ।

आँख तक भी आ रहा

साँस नहीं आ रहा है ।


चीखना मैं चाहता हूँ

रो नहीं भी पा रहा हूँ

डर रहा हूँ, डर रहा हूँ

मर रहा हूँ, मर गया हूँ।


देह मेरी को खोजते हैं

पर नहीं अभी पा रहा हूँ

मिल रहा हूँ, मिल गया हूँ

मल के साथ , बन मल गया हूँ।


नहीं कोई चर्चा हुई है

नहीं कोई बातें है करता

कैसे मरा, किसके लिए था

नहीं कोई ये पूछता ।



सोचता हूँ ?


स्वस्थ जीवन देने को ही

सीवर में मैं था उतरा

देश का सोचा था मैंने

देश का सम्मान था करता ।


न कहीं भी नाम आया

न कोई मुझे जानता

न कहीं गिनती है मेरी

न कोई सम्मान आया


न कोई मैडल मिलेगा

न अखबारों में छपूँगा

न मिलेगा मान मुझको

न स्वर्णाक्षरों में लिखूँगा ।


लड़ा मैं भी था

लड़ाई की थी मैंने भी

लड़ते-लड़ते ही मरा था

मैं भी जीत के करीब था

देश पर जो मर मिटा

मैं भी तो शहीद था ।।


दीपक मेवाती 'वाल्मीकि'

पी.एच.डी. शोध छात्र (IGNOU)

आशादीप

सपनो का टूट जाना
टूट कर बिखर जाना
जैसे गहरी खाई में गिरते जाना
अचानक ही धुंधलका छा जाना


नयन अश्रु भी कुछ पल के
फिर भी पा लेने की चाहत
गहन अंधकार में भी
जुगनुओं की जगमग


आशाओं के दीप
हवाओं के झोंकों से
जलते-बूझते,टिमटिमाते
कुछ पल का अंधकार


दूर गगन में
बादलों की ओट से
बाहर आने को आतुर
चाँद-तारे


नहीं छूपते आशादीप
बार-बार बादलों के छा जाने पर
या फिर
धरती पर छाई धुंध के पहरे पर


डॉ प्रदीप उपाध्याय,


उपाध्याय नगर,मेंढकी रोड़,देवास,म.प्र.

बारिश के दिनों में

बारिश के दिनों में
बारिश के दिन याद नहीं करता
बारिश की रातें याद करता हूँ मैं


उन्हीं रातों के भींगते अंधेरे में उगतीं थीं
मां की आंखें
अंधेरा चीरने की कोशिश में
कभी गुम हो जाती थीं
घर के अंदर उसी अंधेरे में
कभी बरसती नहीं थीं,
बस पसीजती थीं कभी-कभी
घर की कच्ची दीवार की तरह


घर दुबका रहता था
अंधेरे की भींगी -भारी चादर में
हम भाई - बहनें दुबके रहते थे
एक रस्सी खाट पर मां की सूती साड़ी में
और पिता उसपर डाल देते थे
अपनी एक पुरानी खद्दर धोती
कि हम बच्चों की देह में बची - बनी रहे गरमी
लेकिन हम बच्चे तब यह कहाँ समझते थे
कि धोती - साड़ी का सम्मिलित संघर्ष जरूरी है
दुनिया में गरमी बचाने के लिए


भींगते अंधेरे में
माँ जब बुझी हुई ढिबरी दुबारा बालती थी
हम बच्चे नहीं जानते थे कि
यह ढिबरी दरअसल वह
अपनी ही आंखों से निकालती थी
और पिता उसकी थरथराती रोशनी में
शिनाख्त करते थे - छप्पर कहाँ - कहाँ चूता था
और माँ को बताते थे कि
चूते हुए छप्पर के नीचे घर में
कौन-सा कोना सुरक्षित है ढिबरी के लिए
ताकि रोशनी में कम होती रहे रात की लंबाई


पिता ही बताते थे माँ को
कि कहाँ -कहाँ करने थे तैनात
घर के सारे खाली बरतन
घर की जमीन गीली होने से बचाने के लिए
घर के ठीक बीचोंबीच खड़ा
वह बूढ़ा खंभा क्यों चिढ़ता था
बरतन - बूँद की टन् - टन् जुगलबंदी पर
और वह क्यों सहमा रहता था
दीवार पर अपनी ही मोटी छाया हिलती देख
हम बच्चे यह कहां समझते थे तब ?


सिरहाने में बैठी मां,पैताने में बैठे पिता
उनके चेहरे से चूती हुई चिंता फिलहाल
ढिबरी में खत्म होते मिट्टी तेल को लेकर थी या
उस डूबते धान को लेकर जिसके सीस पर
टिके होते थे कल के सुख और सपने
हमें तब यह सब समझ में कहां आता था !


और जैसे - जैसे असुरक्षित होते जाते थे
घर में बाकी कोने एक - एक कर
ढिबरी और हम बच्चे सहित खाट की जगह
रात - भर बदलते ही रहते थे मां - पिता
ताकि ढिबरी बलती रहे
और वे हमें भींगते अंधेरे से बचा सकें
बचा सकें वे अपनी जिंदगी की कुल कमाई
आगे बारिश के दिनों में खरचने के लिए


अभी यहाँ
उन रातों को याद किए बिना मुश्किल है अभी की बारिश को कोई अर्थ देना
और बारिश को समझे बिना मुश्किल है
जिंदगी की जड़ें ढूँढना


इसलिए
बारिश की रातें याद करता हूँ मैं
बारिश के दिन याद नहीं करता
बारिश के दिनों में


दिलीप दर्श
मूल निवास : बलिया, प्रखंड – रूपौली, जिला – पूर्णिया, बिहार.

पानी और पत्थर

मुझे नफरत को
पानी नहीं पत्थर बनाना है
और प्रेम को बनाना है पानी


रोकना है हर हाल में प्रेम को
पत्थर बनने से


घृणा के पत्थर चुनने हैं
आबाद इलाके से और उन्हें बनाकर पहाड़
मनुष्यता के नितांत परित्यक्त क्षेत्र में कहीं
कैद कर देना है
पहाड़ी जड़ता के अभेद्य घेरे में
अगर रखना है दूर उन्हें
हवा में पत्थर उछालनेवाले घृणास्पद हाथों से
असंख्य माथे को फूटने से बचाना है अगर
बचाना है मनुष्यता को पत्थर से


इसलिए पानी बनाना है प्रेम को
बहाना है उसे दसों दिशाओं में मुझे


पानी में बहाना है
मुर्दा शांति से बुना सफेद बर्फ का मोटी कफन
पानी से तोड़ना है वह पहाड़
अन्यथा वह
धरती की छाती पर खड़ा रहेगा
गड़ा रहेगा
शूल बनकर सदियों- सहस्राब्दियों तक
मनुष्यता के परित्यक्त क्षेत्र में


इसलिए प्रेम को पानी बनाना
समय की जरुरत है
फिलहाल पानी का मतलब तबीयत है


दिलीप दर्श
मूल निवास : बलिया, प्रखंड – रूपौली, जिला – पूर्णिया, बिहार.

भीड़ से खारिज आदमी

भीड़ से खारिज आदमी भले ही हारा हुआ लगता है
कभी हारा हुआ नहीं होता
वह अकेला या बेसहारा हुआ लगता है
पर कभी अकेला या बेसहारा नहीं होता


भीड़ से खारिज आदमी का
सिर्फ और सिर्फ भूगोल ही होता है
कोई इतिहास नहीं होता
उसके पास नहीं होती कोई दूसरी संज्ञा
या एक भी विशेषण
अपने नाम के शुरु - आखिर में लगाने के लिए
कोई शीर्ष- पूंछ नहीं होते


क्योंकि शीर्ष - पूंछ मिलते हैं
सिर्फ इतिहास के संरक्षित अभयारण्य में
और वहाँ नाबाद हिलते हैं
किसी विजेता के फरमानी इशारों पर
भीड़ से खारिज आदमी पहले ही
खारिज कर चुका होता है ऐसे इशारों को
समय रहते इन्कार कर चुका होता है
शीर्ष और पूंछ के बीच हकलाती जिंदगी को


भीड़ से ख़ारिज आदमी
स्वीकार कर चुका होता है
शीर्ष- पूंछ विहीन अस्तित्व के अपने भूगोल को
वह पहचान चुका होता है
भीड़ में खड़े व्यवस्था के मदारी को
जान चुका होता है कि आज के दौर में
मदारी दरअसल एक संपेरा है
बजाता है नित नये सुरों में बीन दिन भर
बीन सांप के लिए है या भीड़ के लिए
यह एक बड़ा रहस्य है
और इस रहस्य को जिज्ञासा की खुजलाती धूप से बचाने के लिए
बीच बीच में वह नए-नए अंदाज़ में दिखाता है
सांपों का खतरनाक खेल
पैदा करता है डर का ऐसा मायावी बाजार
जहाँ सांप आभासी रूप में और बड़े दिखते हैं
और डर वास्तविक रूप में उनसे भी इतना बड़ा कि
शाम तक जिज्ञासा से ज्यादा जरूरी हो जाते हैं वे जंतर
जिन्हें बेचना हो जाता है तब बहुत आसान
और खरीदना भी बहुत ज़रूरी


भीड़ से खारिज आदमी जानता है
जंतर की असलियत
यह भी कि सांप दंतहीन है दरअसल
और डर एक झूठ है
सच यही है कि
भीड़ से जो बिल्कुल खारिज या अपदस्थ है
अपनी सोच में वही साफ है, वही स्वस्थ है

दाता बनकर तो देखो!

मैं जानता हूँ
उनके सामने
तुम याचक बनकर ही तो
रहते आये हो अब तक
तभी तो हर बार की तरह
इस बार भी
भूख/भय
गरीबी/लाचारी
बेरोजगारी
बेहाल शिक्षा/स्वास्थ्य/आवास
के विरुद्ध संघर्ष
और
भ्रष्टाचार मिटाने
हताशा दूर करने
और
विकास के नाम पर
न्याय दिलाने
वे आते हैं तुम्हारे पास
कभी पूरे न होने वाले
आश्वासन/
वायदें/
घोषणाएँ लेकर
जानते हैं कि
तुम याचक हो
और
तुम्हें भूलने की आदत है
और वे दाता
तुमने ही तो बनाया है उन्हें
कभी तुम भी
अपनी
बेचारगी को छोड़कर
अपनी
क्षमता को पहचानकर
भूमिका बदलकर तो देखो
वे याचक बनकर आते हैं
और
याचक ही बने रहें
एक बार
तुम स्वयं
दाता बनकर देखो।

गुरुवार, 19 सितंबर 2019

कुपोषण

कुपोषण है शत्रु बड़ा बलवान
इसे मिलकर भगाना है
चलिए अब हम सबको
जागरूकता का अलख जगाना है


जागरूकता ऐसी की बच्चे हो
स्वस्थ सेहतमंद
न कम हो ऊँचाई और
न कम हो वजन


खाने में शामिल हो
पौष्टिक, संतुलित आहार
विटामिन ,प्रोटीन,वसा,कार्वोहाइड्रेटयुक्त
भोजन करना है तैयार


माँ के अलावा अभिभावकों की
जिम्मेदारी की जरूरत है
बच्चे को खाना खिलाइए
बच्चे तो भगवान की मूरत है।


कवियत्री निभा कुमारी
(राजनगर ,मधुबनी , बिहार)

मेरे प्यारे अटल

मेरे प्यारे अटल!


तुम कहाँ गुम हुए?

 कहाँ गुम हुए ?

मेरे प्यारे अटल!

तुम में था एक कवि,

और एक नेता सरल।

तुम कहाँ गुम हुए ?

मेरे प्यारे अटल!

हैं तुम्हें खोजते 

मेरे दोनों नयन,

हो कहाँ तुम,

कहाँ कर रहे हो शयन?

आओ वापिस 

तुम्हें देखना चाहता हूँ।

कुछ पुष्प मैं तुमपर 

फेंकना चाहता हूँ।

मानता हूँ कि 

आना है मुश्किल बड़ा।

राह में है 

हिमालय भी आड़े खड़ा।

पर दिखाओ

तुम अपना वही हौसला।

फोड़ दो 

पर्वतों का घमंडी घड़ा।

कर रहा हूँ प्रतीक्षा

हर क्षण, पल -पल।

आ जाओ लौट कर मेरे प्यारे अटल।

आ जाओ लौट कर मेरे प्यारे अटल।।


मंगलवार, 17 सितंबर 2019

गजल

1. गजल

ताल्लुक़ात की सूरत संभालकर रखना

कोई न कोई महूरत संभालकर रखना

हर इक से मांग के शर्मिंदगी न हो तुमको

तुम अपनी सारी ज़रूरत संभालकर रखना

खुदा के बंदों ने कितने खुदा बना डाले

तुम अपने दिलकी ये मूरत संभालकर रखना

ये कह दिया कि मैं तेरे ही काम आऊँगा

हमें बवक़्ते ज़रूरत सम्भाल कर रखना

तुम्हारे दोस्त तुम्हे धोखा देने वाले हैं

मेरी पुरानी अदावत संभाल कर रखना


2. ग़ज़ल


इश्क़ में जान गंवा देने का दिल मे इरादा होता था

चार आंखों में और तो कुछ नहीं सिर्फ भरोसा होता था


ख़्वाब देखने की सब मे इक बीमारी सी होती थी

आंखें कम सुन्दर होती थीं सुन्दर सपना होता था


बचपन से ही रिश्तों का मतलब समझाया जाता था

सोने की गुड़िया होती थी हीरे का गुड्डा होता था


खून के रिश्ते, दर्द के रिश्ते, प्रेम के रिश्ते होते थे

रिश्तों में रिश्ते होते थे ऐसा रिश्ता होता था


कल तक अपने गाँव मे सम्बन्धों की फसलें उगती थीं

भय्या भाभी, चाची चाचा, मौसी ताया, होता था


मिन्नत को अफसोस यही है  कहाँ  गए वो सारे लोग

जिनकी प्यारी बातों में हर रंग निराला होता था ।


3. ग़ज़ल


किसी के ख़ुश्क लबों की मैं प्यास हो जाऊं

अगर वो चुप रहे मैं भी उदास हो जाऊं

तुम्हारे दर्द सुनूँ और मैं रहूं खामोश

ज़रूरी है मैं तेरे आस पास हो जाऊं

मेरे क़रीब से मुँह फेर कर नहीं जाना

कहीं न ऐसा हो मैं बदहवास हो जाऊं

ग़रीब बच्चों की ख़ातिर मुझे वो दौलत दे

मैं इनकी रोटी जटाओं, लिबास हो जाऊं

वो नंगे पांव चले लान में कभी 'मिन्नत'

तो मैँ भी उसके लिए सब्ज़ घास हो जाऊं ।


सोमवार, 16 सितंबर 2019

शब्द

इस देश में
लोग यूँ हीं मरते हैं


लेकिन 'यूँ हीं'
मरने के लिए
इनका देशी होना जरूरी है।


याद रखना
अगर शब्द 'विदेशी' जुड़ा हो
तो आसान नहीं है
इनका मरना।


सरकारी अस्पतालों में
मरे लोग और
पांच सितारा अस्पतालों में
दिवंगत आत्माओं के बीच
कुछ तो फर्क होता है।


तुम इतरा सकते हो
ऐसी जगह होने पर
जहाँ किसी प्रजाति के
आगे या पीछे लगे शब्द
बदल सकते हैं उसका मोल।


अफ़सोस है
वो शब्द जिस दुनिया से
आए हैं,
वहाँ शब्दों की नहीं
सिर्फ प्रजाति की कीमत होती है।


 श्वेतांक कुमार सिंह
चकिया, बलिया/
कोलकाता

गुरुवार, 12 सितंबर 2019

ग़ज़ल

 लोग मरते नहीं थे दुआ के लिए


सिर्फ़ जीते रहे वो अना के लिए


बेहया को ये कोई बताए ज़रा
हुस्न पैदा है होता हया के लिए


दिल मेरा आपने है दुःखाया बहुत
हाल पर छोड़िए अब ख़ुदा के लिए


देख लूँ इक झलक मौत आ जाएगी
ज़िन्दगी है बची इल्तज़ा के लिए


दंड उसका सुदामा को मिलता नहीं
कुछ बचाता अगर वो सखा के लिए


बलजीत सिंह बेनाम
सम्प्रति:संगीत अध्यापक

मंगलवार, 10 सितंबर 2019

समय हूँ

समय हूँ,समय हूँ मैं
मंजिल का मूल्यवान् हूँ।


जरा इस बात पर ध्यान दो मेरा-
तेरे जीवन की अनोखी क़ीमत हूँ ,
मोती से ऊपर मूल्य है मेरा
बड़ा बलवान हूँ ,
बड़ा  धनवान हूँ।


न मेरा कोई सजीव तन है
न मेरा अपना मन है
न मुझें आराम है
न किसी का प्रतिक्षा है
सिर्फ टिक-टिक कर-
मैं चलता हूँ।
जो इंसान मुझें
बेवफ़ा समझता है
इक-उम्र के बाद व
बहुत पछ्ताता है।


हाँ मैं समय हूँ
इसलिए इंसान की
निरंतर साथ हूँ।
मुझें सब महत्व देते हैं
चाहे धनी हों या निर्धन ,
चाहे चोर हों या धर्मनिष्ट ,
चाहे मजदूर हों या सैनिक।


जरा-सी मेरी-
क़ीमत में इंसान
मंजिल लेती है
प्राण खो देता है ,
मेरी कहानी अजब-सी है
समय हूँ, समय हूँ मैं
मंजिल का मूल्यवान् हूँ।


अनुरंजन कुमार "अँचल"
जिला -:अररिया ,बिहार

शनिवार, 7 सितंबर 2019

नया कानून

497 लो जी स्वागत कर लो
आ गया है नया कानून
जहाँ नर, नारी स्वच्छद भाव से
पूरा कर सकेंगे मन का जूनून
नारी परपुरूष को गले लगा सकती है
तो पुरूष भी लेकर परनारी का सहारा
कर सकता है पत्नी, परिवार से किनारा
दोनों मनायेंगे रंगरलियां, परिवार को छोडकर मंझधारा
नैतिकता को छोडकर
खुला होगा व्यभिचार
दैहिक सम्बन्धों के सामने
खडा रोयेगा परिवार
कुछ सोचकर थोडी कल्पना कीजिये
सोच, समझ कर ही फैसला दिजिये
बडे, बुजुर्गों, परिवार के रिश्तों
बच्चों, को भी एक नजर सोचिये
हमारी परिवार की शर्मोहया,
संस्कार, हँसी और ख़ुशी
सब बदल जायेंगे मातम में,
सबको मिलेंगे गम, और दुखी
हमारी भारतीय सोच तो हमेशा से
घर को मन्दिर बनाने की रही है
माँ, बहन, बेटी, पत्नि सारे रिश्तों में
अपनेपन की महक रही है
ऐसी खुली छूट के हमारे
जीवन पर दूरगामी परिणाम होंगें
परिवार टूटेंगे,भावनात्मक, रूप से भी
पति, पत्नि भी अलगाव भोगेंगे
थका हारा नर जब शाम को
परिवार की ठंडी छाँव तले आता है
पत्नि, बच्चे, परिवार में सभी को
हँसते, मुस्कुराते देख जन्नत का सुख पाता है
हमारे सनातन धर्म की विशेषता
यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते
रमन्ते तत्र देवता रही है
ये पाश्चात्य संस्कृति हमारी जडों को
खोखला करने का काम कर रही है
एक विदेशी जोसेफ की याचिका पर
कानून भारत के रिश्तों को बदल देता है
और भारतीय मर्यादा, संस्कृति
को ताक पर रख देता है
हर एक रिश्ता इक मर्यादा
में ही पनप सकता है औ, ये रिश्ता
स्नेह, प्रेम, आदर, सम्मान की
मजबूत नींव पर ही चलता है
नारी को विचारों को अभिव्यक्त
करने की आजादी दीजिए
स्नेह, प्रेम, सम्मान ,गुण दीजिए
पर, यूँ उसे कुलटा बनाकर
कलंकित न कीजिये
नारी और नगरवधु में
क्या फर्क कर पाओगे
जब रिश्ते,अहसास और
जमीर ही ना जिन्दा रख पाओगे
हमारा सनातन धर्म रिश्तों की
पवित्रता को सम्मान देता है
जब बनेंगे खुले सम्बन्ध तो
फिर कौन किसको मान देता है
भारतीय समाज को भी इस
कानून के दुष्परिणाम भोगने होंगे
विदेशों की देखा ~देखी अगर
ऐसे कानून भारत में लाये जायेंगे
मेरा भारत धर्म, संस्कृति, औ,
रिश्ते जी जान से निभाता है
विदेशियों की नकल मत करो
भारतवासी अपनी आन, बान पर मरता है


सीमा गर्ग " मंजरी "