रविवार, 29 सितंबर 2019

गंधर्व विवाह


ऑनर किलिंग की शिकार पत्रकार निरूपमा पाठक को याद करते हुए



मुझे नहीं मालुम
तुम्हारी हत्या हुई
या
तुमने की
आत्महत्या
हां,
कह सकती हूं इतना
दोनों ही परिस्थितियों में
सिद्ध नहीं हुए, किसी
के प्रयोजन
हो सकता है
सोचा हो तुमने
गर, प्रेम से मेरे
झुक रहा शर्म से
मां-बाप का सिर
वे नहीं चाहते
अपनाना ‘प्रिय’ को
और तुम स्वयं
हो न सकी इतनी आधुनिक
जो रोज- रोज बदलो प्रेमी
तुमने तो माना,
प्रेम का प्रस्फुटन
होता है एक बार
मिलती है जन्नत
एक बार
समर्पित होता तन-मन
एक बार
और सोचा
पहुंचाकर प्रेम को
शादी के द्वार
कर लूं तन-मन का उद्धार
पर,मना न सकी
मानी पिता को;
जो नहीं जानते, क्या है मान
न तोड़ ही सकी
उनके अहंकार
या मनोविकार को

मिथ्याकांक्षा, कट्टरता
और कठोरता को
न सह सकी वे
धमकियां
जो मिली कई रूपों में
बरंबार
जब निकले पिता- भाई घर से
तब कांप उठा जिस्म तो
क्या आत्मा भी
कहीं कर न डालें वे मनमानी
और पहुंचा दें
‘प्रिय’ को
मौत के घर
तब बचाने को
प्रियतम को
दिखा वही इक रास्ता
जो बनता रहा है सदियों से
प्रेमियों का अंतिम हथियार
मिटा दूं स्वयं को
पर आई फिर रूकावट
उदर में पलता
प्रेम का अंश
मांग रहा था -
संसार में आने का अधिकार
दुविधा में पड़ी फिर तुम
द्वंद हुआ मन में
पिता -पुत्र में चुने किसे
कशमकश के बीच भी
तुमने चुना ‘ प्रिय ‘ को
और झूल गई फांसी पर
कौन जाने
तुम्हारे सामंतवादी पिता
अपने मान
में हो गए अंधे
होनहार पुत्री की अपेक्षा
भा रहा हो दंभ
और
रचा फिर
स्नेहपगे
भाई और जनक ने
तुम्हारे
लिए ष्डयंत्र
नहीं जानती तुम
रहा सब
उसी का हिस्सा
बाहर होने के
छदम आवरण
के भीतर
घुसे वे घर में
उन्हीं कलाइयों वाले हाथों ने
जिनपर बांधा करती थी
तुम राखी
और उसी पिता ने
करती रही जिसपर
गर्व और भरोसा अब तक
और उस मां ने
जिस पर तुमने
भी लुटाया स्नेह
और बनाया राजदार
बलि लेली तुम्हारी
पर निरूपमा
बताओ न
क्या सिद्ध हुए
उनके प्रयोजन?
क्या
अब लेंगी जनम नहीं
दूसरी निरूपमा?
वे तो रहे तुमसे भी
नादान
अब तो जान गई हैं
सारी
निरूपमा
पिता के मान ,
उनके दाव और चाल को
अब नहीं करेगी कोई
उनसे मनुहार
मांगेगी नहीं
विवाह के लिए
आशीर्वद
सब करेगी गंधर्व विवाह


...शेली खत्री

गुरुवार, 26 सितंबर 2019

राष्ट्र के मार्गदर्शक हैं शिक्षक

समाज में गुरू अर्थात शिक्षक का स्थान सबसे ऊपर है ।प्रारंभिक से लेकर अंतिम समय तक उनके द्वारा दी गयी शिक्षा से जीवन प्रकाशित होती रहती है।जो मनुष्य शिक्षक का सम्मान करता है सही मायने में शिक्षित है।शिक्षा से ही सम्मान है।आदर- भाव, आचार -विचार, व्यवहार और संस्कार जीतने भी गुण हैं सभी को सम्माहित कर कोई सही मायने में शिक्षक बनता है और लोगो को शिक्षा देता है।जिस प्रकार माली छोटे छोटे पौधों को बड़ा और फलदार वृक्ष बनाने में मेहनत करता है ठीक उसी तरह हमारे शिक्षक भी बच्चों के पीछे छुपे प्रतिभा को निखार कर उन्हें सही रास्ते पर ले जाते है और भविष्य के इंजीनियर, डाॅक्टर साइंटिस्ट और अधिकारी बनाते हैं।

शिक्षक के योगदानो को समाज कभी नही भूला पाता और भूलना भी नही चाहिये। शिक्षा देना भी एक कठिन तपस्या है।देने वाला भी सोचता है कि मैं आज जो कुछ इसे बता रहा हूँ वह यह कितना ग्रहण कर पाएगा उसके दिमाग में क्या चल रहा है?,इसका क्या असर होगा? ठीक डाॅक्टर की तरह जब वह मरीज को कोई दवा देता है तो उसके गुण दोष के बारे में अवश्य सोचता है। शिक्षा के साथ भी शिक्षक ऐसा जरूर सोचते हैं।

आज कल की पद्धति जरूर बदल गयी है लेकिन शिक्षा की धूरी आज भी शिक्षक ही हैं इस बात को सभी को समझना होगा और शिक्षक के प्रति आदिकाल वाला व्यवहार रखना ही होगा।लोग तनिक सी बातो पर शिक्षक के साथ दुर्वयहार कर देते है कोई शिक्षक आज कडाई नही बरतता क्योंकि हंगामा खडा हो जाता है मानवाधिकार संगठन,बाल अधिकार कानून सब पीछे पड़ जाते जिससे शिक्षको के मनोवल को आघात लगता है और वे उस रूचि से काम नही कर पाते।

समस्याएँ कई है आधुनिकतम चीजो का अभाव,पुस्तके,लाइब्रेरी प्रयोगशालायें, भवन तथा जर्जर पडे सिस्टम से नित जूझना पडता है। फिर भी वे शिक्षा जगत को आगे ले जाने के लिए कठिन परिश्रम तो करते ही है ।इसमें यदि लोगो का साथ मिल जाये तो और भी अच्छा होगा।


शिक्षक का समाज और राष्ट्र निर्माण में बडा महत्वपूर्ण स्थान रहा है।देशप्रेम संस्कार और सभ्यता एक स्कूल के द्वारा प्रदान की गयी शिक्षा से ही जागृत होकर हमारे लहू में दौडता है जो आगे चलकर देश समाज और परिवार के काम आता है हमारे आर्दश भी शिक्षक है हमारे निष्कर्ष भी शिक्षक ही हैं इसलिए शिक्षक का सम्मान हमेशा से हमारे समाज में सर्वोपरि माना गया है।

शिक्षा का व्यवसायीकरण शिक्षा जगत के लिए जहर है जिससे समाज और राष्ट्र को सोचना होगा। नित बढ़ते फीस ऊँची होती खर्च और पीठ पर लदते किताबो के बोझ ने जैसे शिक्षा की कमर तोड के रख दी।सरकारी स्कूलो में उदासीनता और प्राईवेट के पीछे भागते लोग यही सच्चाई बनकर रह गयी है ।सरकारी स्कूलों में शिक्षक की कमी सुविधाओ की कमी वही प्राईवेट स्कूलो में सुविधा के साथ हाईटेक व्यवस्था मौजूद रहता है जिसके कारण ऊँची फीस वसूली जाती है।एडमिशन से लेकर रोज बदलते स्लेबस की किताबो पर भी मोटी रकम ली जाती है ऐसे सिस्टमों के सहारे कैसे कम आमदनी वाले या मध्यमवर्गीय परिवार वाले अपने बच्चों को शिक्षा दे पाएँगे गंभीर चिंता का विषय बना हुआ है। हलांकि सरकारें भरसक इस खाई को कम करने के लिए प्रयासरत है लेकिन बिना कठोर निर्णय के समस्या का समाधान होना मुश्किल सा प्रतीत होता है।पांव फैलाये इस जहर में कोई हाथ डालना नही चाहता क्योंकि सभी शहर में नामी गिरामी व्यक्तियों के बच्चे पढ़ते हैं।

शिक्षा को समान बनाना एक विकल्प है जब एक संविधान एक राष्ट्र हो सकता है तो एक शिक्षा क्यों नही? एक स्लेबस क्यो नही ?एक शिक्षा होने से समान शिक्षा होगी समान किताबे होगी और समान विचारधारा का जन्म होगा जिससे पनप रही खाई कम हो सकेगी साथ ही साथ कम खर्च भी होगे।मेरा मानना है कि शिक्षा से जुडे लोग इस विषय पर अवश्य सोचते होंगे ।

                                  आशुतोष

                                  पटना बिहार

जल समाधि-: एक अवलोकन

      भारत और नेपाल दोनों देश एक दूसरे के पड़ोसी होने के साथ-साथ उनमें काफी समानताएं भी पाई जाती हैं। यही कारण है कि नेपाल की धरती पर साहित्यकार डॉ लोकनाथ वर्मा राहुल कृत उपन्यास जल समाधि  को पढ़ने पर ऐसा लगता है कि वह विदेशी धरती पर नहीं वरन् भारत के किसी गांव की धरा पर लिखा गया है। जिसके नायक है शंकर,जिसे लोग प्यार से काका कहते हैं। और जल कपट रहित सरल स्वभाव के छोटे बड़े का उचित सम्मान देने वाले शंकर काका कहलाने के उम्र के हैं भी।पर गांव के अधिकांश लोगों की तरह हैं वो अंगूठाछाप।


  गांव में कुछ लोग खबरी होते हैं वे बात को फ़ैलाने में माहिर होते हैं सुखवा  ये बात (काका को भगवान श्रीराम चंद्र जी मिले थे और अपनी बगल में बैठाकर काफी देर तक बात किया था) पल भर में पूरे गांव में फैला देता है। गांव वाले विश्वासी होते हैं इसका पता हमें इस बात से चलता है कि भगवान श्रीराम चंद्र से काका की मुलाकात वाली बात लोगों के कान में पड़ते ही काका के दरवाजे पर झाड़ फूंक कराने वालों की भीड़ लग जाती है। इसके साथ साथ गांव वाले अनपढ़ होने के बावजूद भी हाजिर जवाबी उस्ताद होते हैं। बजरंगी महाराज और सुखवा के वार्तालाप की एक बानगी- '' तुम अपने आंखिस देखें रह्यो ।"

" का देखब जरुरी है ।"

" जब तक न देखौ अपने नैना तब तक न मानो किसी के कहना।"

" महाराज एक बात बताना जाय का आप अपने बाबा के बाप का देखगा है।"

" नहीं।"

''मतलब उनका आप नाहीं मनते।"

   गांव किस तरह उच्च वर्ग के लोगों को निम्न वर्ग के लोगों को यकायक मिलने वाला सम्मान हजम नहीं होता।एक उदाहरण-" बजरंगी महाराज के छातिप सांप लोटत रहे,जब ऊ काका के प्रशंसा सुनत रहें।चिंतुवा ठीक होगा। चमत्कार होयगा।"इसी तरह सुकइया कहता है-"गये रहें भ इया , बजरंगी महाराज कहिन काका तीर जाव।दुलारे से भगाया दिहिन।"

शिक्षा में आते बदलाव के बारे में मास्टर मुरली कहते हैं-" शिक्षक और शिष्य केर अंतर्संबंध बहुत मधुर रहे लेकिन अब लरिकन से डेराय क परत है।"

   गांव में जिसकी लाठी उसकी भैंस वाली कहावत चरितार्थ होती है कल्लन मियां के चरित्र से।जो धन और जन बल में संपन्न होने के साथ-साथ राजनीतिक पहुंच वाले भी हैं जिसके कारण कोई उनके खिलाफ आवाज नहीं उठा सकता।ये जानते हुए भी कि कल्लन मियां नाममात्र का काम दिखाकर सरकारी रकम डकार गए।मगर कौन अपनी हड्डी पसली तुडवाये।यही स्थिति आज भारत के अधिकांश गांवों की है।

  दुनिया चांद और अन्य ग्रहों पर पहुंच रही है भारत के गांव में आज भी छूआछूत और भेदभाव व्याप्त है । जिससे अछूता रामपुर भी है-" महाराज लोग सोचें लागे इसके टठियक (थाली) गुड़ अऊर गगरक(गागर) पानी कइसे लीन जाय।जात केइ ई अछूत।" लेकिन इस बीमारी का इलाज मुरली के सहयोग से होता है। गांव में पिछड़े पन का कारण है संगठन का अभाव और दादागिरी।जिसका उपाय है-"बुराई से लड़ने खातिर जमात चाही , संगठन चाही।काका के अगुवाई में मुरली जैसे बुद्धिजीवियों के सहयोग से ऐसी संगठन बनता है कि रामपुर पुरे क्षेत्र में और देश की पत्र पत्रिकाओं में चर्चा का विषय बन जाता है और आपसी सहयोग से रामपुर गांव में बिना सरकारी मदद के ही सड़क ,अस्पताल, स्कूल बना जाता है खाद्यान्न उत्पादन औद्योगिक क्षेत्र में क्षेत्र में अग्रणी।


   लेकिन इस उपन्यास के नायक काका देश के ठेकेदारों (राजनेताओं)के चंगुल में फंस जाते हैं। प्रजातंत्र में परिवर्तन वाले काका के विचार से एक तरह की शांति पूर्ण क्रांति चिंगारी जल उठती है और राजनेताओं को अपना राजनीतिक कैरियर खतरे में नजर आता है। जिससे बौखलाए धर्म वीरसिंह नामक नेता ने रामपुर सामुहिक आटा चावल उद्योग का बना पैकेट डीलर को मिला कर खाद्यान्न विक्री पर रोक लगा देता है, जिसके कारण एक परिवार को भूख से परेशान होकर आत्महत्या करनी पड़ती है। इस घटना से क्षेत्र के अन्य नेताओं को भी राजनीति चमकाने का मौका मिलता है और वे भीड़ को लेकर शहर के गोदाम पर कब्जा कर लेते हैं। मास्टर मुरली और उनके सहायक को पुलिस भीड़ से बचाकर अस्पताल पहुंचाती है। नेताओं के उकसाने से बौखलाई भीड़ अनियंत्रित होकर शहर में तोड़फोड़ और शुरू कर देती है जिससे पुलिस प्रशासन को कर्फ्यू की घोषणा करनी पड़ती है।

   नेता लोग अपने समर्थकों के साथ रामपुर पहुंच कर भाषण बाजी शुरू कर देते हैं तभी लोगों को पता चलता है कि भाषणबाजी करने वाले नेता धर्म वीर सिंह के कारण यह घटना घटी और शहर में पुलिस इन्हें तलाश रही है।जो काका की हर बात सर आंखों पर रखने लगी थी ।काका की बात अनसुनी कर उग्र भीड़ नेता धर्म वीर सिंह और उनके समर्थकों को आग के हवाले कर देती है।

  हमारे देश में किस प्रकार अपराधी साक्ष्य के अभाव में और अपने चहेतों के सहयोग से सजा से बच जाते हैं इस का उदाहरण काका के शब्दों में-" इतने लोग का न्यायधीश फांसी न दै पाई।साक्ष्य के अभाव में हमका जज दोषी न ठहराय पाई,हम बरी होई जाइब।"

काका अपने समर्थकों से मुरली का अंतिम संस्कार करके लौटते वक्त कहते हैं-"अगर हम राजनीतिक परिवर्तन वाली बात न किये होइत तो ई घटना न घटत।दंगा भवा, कर्फ्यू लगा , मास्टर भाग्या के दुनिया छोडय के परा।नेतन‌का जिंदा जलाय दीनग।जब भगवान श्रीराम का अपने कर्मन केर ा प्रायश्चित जल समाधि लेइ के करय का परा।तो हमहुं अपने कर्मन केर प्रायश्चित क्रिस।"इतना कहकर काका पीछे गड्डे में कूद पड़े और देखते समाधिस्थ।सुखवा सोचता है कि ये जल समाधि भगवान श्रीराम चंद्र की है या काका की।

नेपाल की धरा पर लिखा गया ये उपन्यास भारतीय ग्राम जीवन का एक काका खींचते हुए उसमें सुधार और और भारतीय नेताओं के स्वार्थपूरण घृणित चाल को उजागर करता है।।

*****

उपन्यास-  जल समाधि ।                      

लेखक-    लोकनाथ वर्मा राहुल

प्रकाशक- ग्रामदीप साप्ताहिक हिंदी अवधी नेपाल

समीक्षक-उदय - राज वर्मा उदय

प्रकाशन वर्ष-2010

मूल्य- 500/

मंगलवार, 24 सितंबर 2019

मैं भी तो शहीद था

बारिशों के बाद जो

बीमारियों की घात हो

जंग का ऐलान तब

मेरी ख़ातिर हो चुका


मानकर आदेश को

मन में सोच देश को

ना ख़याल आज का

ना फ़िकर बाद का


सिर्फ़ एक लक्ष्य है

जो मुझे है भेदना

सीवर हो जहाँ रुका

वो मुझे है खोलना


बाल्टी, खपच्ची,रस्सी

ली उठा हाथ में

दो मेरे संगी भी

चल-चले थे साथ में


सुबह - सुबह की बात है

थोड़ी पर ये रात है

खोला ढक्कन जैसे ही

बदबू आई वैसे ही ।


कुछ नहीं था सूझता

कुछ नहीं था बूझता

बदन से कपड़े दूर कर

कमर में रस्सी बांधकर


सुरक्षा की ना बात है

ईश्वर का ही साथ है

आसपास मेरे सब

नाक-भौंह सिकोड़कर


साथ मे खड़े हैं सब

पास में ना कोई अब

मैं अकेला ही भला हूँ

जो भी हो देखेगा रब


काली-काली गंदगी

कितनों का ये मल है

और

कितनो की ये लेट्रिन


दुश्मन से लड़ना है अब

सोच छोड़ उतरना है अब

एक को पकड़ा के रस्सी

देह नरक की ओर बढ़ दी


गर्दन तक मल में  हूँ

आज हूँ बस कल ना हूँ

गैस अब चढ़ रहा है

सिर दर्द बढ़ रहा है ।


है अंधेरा ही अंधेरा

रोशनी की बात ना कर

जैसा अब ये हो रहा है

वैसा फिर ना साथ कर


बढ़ रहा हूँ,

चल रहा हूँ

कुछ नहीं सुनाई देता

कुछ नहीं दिखाई देता


मुहँ में मल घुस रहा है

नाक में भी ठुस रहा है ।

आँख तक भी आ रहा

साँस नहीं आ रहा है ।


चीखना मैं चाहता हूँ

रो नहीं भी पा रहा हूँ

डर रहा हूँ, डर रहा हूँ

मर रहा हूँ, मर गया हूँ।


देह मेरी को खोजते हैं

पर नहीं अभी पा रहा हूँ

मिल रहा हूँ, मिल गया हूँ

मल के साथ , बन मल गया हूँ।


नहीं कोई चर्चा हुई है

नहीं कोई बातें है करता

कैसे मरा, किसके लिए था

नहीं कोई ये पूछता ।



सोचता हूँ ?


स्वस्थ जीवन देने को ही

सीवर में मैं था उतरा

देश का सोचा था मैंने

देश का सम्मान था करता ।


न कहीं भी नाम आया

न कोई मुझे जानता

न कहीं गिनती है मेरी

न कोई सम्मान आया


न कोई मैडल मिलेगा

न अखबारों में छपूँगा

न मिलेगा मान मुझको

न स्वर्णाक्षरों में लिखूँगा ।


लड़ा मैं भी था

लड़ाई की थी मैंने भी

लड़ते-लड़ते ही मरा था

मैं भी जीत के करीब था

देश पर जो मर मिटा

मैं भी तो शहीद था ।।


दीपक मेवाती 'वाल्मीकि'

पी.एच.डी. शोध छात्र (IGNOU)

आशादीप

सपनो का टूट जाना
टूट कर बिखर जाना
जैसे गहरी खाई में गिरते जाना
अचानक ही धुंधलका छा जाना


नयन अश्रु भी कुछ पल के
फिर भी पा लेने की चाहत
गहन अंधकार में भी
जुगनुओं की जगमग


आशाओं के दीप
हवाओं के झोंकों से
जलते-बूझते,टिमटिमाते
कुछ पल का अंधकार


दूर गगन में
बादलों की ओट से
बाहर आने को आतुर
चाँद-तारे


नहीं छूपते आशादीप
बार-बार बादलों के छा जाने पर
या फिर
धरती पर छाई धुंध के पहरे पर


डॉ प्रदीप उपाध्याय,


उपाध्याय नगर,मेंढकी रोड़,देवास,म.प्र.

बारिश के दिनों में

बारिश के दिनों में
बारिश के दिन याद नहीं करता
बारिश की रातें याद करता हूँ मैं


उन्हीं रातों के भींगते अंधेरे में उगतीं थीं
मां की आंखें
अंधेरा चीरने की कोशिश में
कभी गुम हो जाती थीं
घर के अंदर उसी अंधेरे में
कभी बरसती नहीं थीं,
बस पसीजती थीं कभी-कभी
घर की कच्ची दीवार की तरह


घर दुबका रहता था
अंधेरे की भींगी -भारी चादर में
हम भाई - बहनें दुबके रहते थे
एक रस्सी खाट पर मां की सूती साड़ी में
और पिता उसपर डाल देते थे
अपनी एक पुरानी खद्दर धोती
कि हम बच्चों की देह में बची - बनी रहे गरमी
लेकिन हम बच्चे तब यह कहाँ समझते थे
कि धोती - साड़ी का सम्मिलित संघर्ष जरूरी है
दुनिया में गरमी बचाने के लिए


भींगते अंधेरे में
माँ जब बुझी हुई ढिबरी दुबारा बालती थी
हम बच्चे नहीं जानते थे कि
यह ढिबरी दरअसल वह
अपनी ही आंखों से निकालती थी
और पिता उसकी थरथराती रोशनी में
शिनाख्त करते थे - छप्पर कहाँ - कहाँ चूता था
और माँ को बताते थे कि
चूते हुए छप्पर के नीचे घर में
कौन-सा कोना सुरक्षित है ढिबरी के लिए
ताकि रोशनी में कम होती रहे रात की लंबाई


पिता ही बताते थे माँ को
कि कहाँ -कहाँ करने थे तैनात
घर के सारे खाली बरतन
घर की जमीन गीली होने से बचाने के लिए
घर के ठीक बीचोंबीच खड़ा
वह बूढ़ा खंभा क्यों चिढ़ता था
बरतन - बूँद की टन् - टन् जुगलबंदी पर
और वह क्यों सहमा रहता था
दीवार पर अपनी ही मोटी छाया हिलती देख
हम बच्चे यह कहां समझते थे तब ?


सिरहाने में बैठी मां,पैताने में बैठे पिता
उनके चेहरे से चूती हुई चिंता फिलहाल
ढिबरी में खत्म होते मिट्टी तेल को लेकर थी या
उस डूबते धान को लेकर जिसके सीस पर
टिके होते थे कल के सुख और सपने
हमें तब यह सब समझ में कहां आता था !


और जैसे - जैसे असुरक्षित होते जाते थे
घर में बाकी कोने एक - एक कर
ढिबरी और हम बच्चे सहित खाट की जगह
रात - भर बदलते ही रहते थे मां - पिता
ताकि ढिबरी बलती रहे
और वे हमें भींगते अंधेरे से बचा सकें
बचा सकें वे अपनी जिंदगी की कुल कमाई
आगे बारिश के दिनों में खरचने के लिए


अभी यहाँ
उन रातों को याद किए बिना मुश्किल है अभी की बारिश को कोई अर्थ देना
और बारिश को समझे बिना मुश्किल है
जिंदगी की जड़ें ढूँढना


इसलिए
बारिश की रातें याद करता हूँ मैं
बारिश के दिन याद नहीं करता
बारिश के दिनों में


दिलीप दर्श
मूल निवास : बलिया, प्रखंड – रूपौली, जिला – पूर्णिया, बिहार.

पानी और पत्थर

मुझे नफरत को
पानी नहीं पत्थर बनाना है
और प्रेम को बनाना है पानी


रोकना है हर हाल में प्रेम को
पत्थर बनने से


घृणा के पत्थर चुनने हैं
आबाद इलाके से और उन्हें बनाकर पहाड़
मनुष्यता के नितांत परित्यक्त क्षेत्र में कहीं
कैद कर देना है
पहाड़ी जड़ता के अभेद्य घेरे में
अगर रखना है दूर उन्हें
हवा में पत्थर उछालनेवाले घृणास्पद हाथों से
असंख्य माथे को फूटने से बचाना है अगर
बचाना है मनुष्यता को पत्थर से


इसलिए पानी बनाना है प्रेम को
बहाना है उसे दसों दिशाओं में मुझे


पानी में बहाना है
मुर्दा शांति से बुना सफेद बर्फ का मोटी कफन
पानी से तोड़ना है वह पहाड़
अन्यथा वह
धरती की छाती पर खड़ा रहेगा
गड़ा रहेगा
शूल बनकर सदियों- सहस्राब्दियों तक
मनुष्यता के परित्यक्त क्षेत्र में


इसलिए प्रेम को पानी बनाना
समय की जरुरत है
फिलहाल पानी का मतलब तबीयत है


दिलीप दर्श
मूल निवास : बलिया, प्रखंड – रूपौली, जिला – पूर्णिया, बिहार.

भीड़ से खारिज आदमी

भीड़ से खारिज आदमी भले ही हारा हुआ लगता है
कभी हारा हुआ नहीं होता
वह अकेला या बेसहारा हुआ लगता है
पर कभी अकेला या बेसहारा नहीं होता


भीड़ से खारिज आदमी का
सिर्फ और सिर्फ भूगोल ही होता है
कोई इतिहास नहीं होता
उसके पास नहीं होती कोई दूसरी संज्ञा
या एक भी विशेषण
अपने नाम के शुरु - आखिर में लगाने के लिए
कोई शीर्ष- पूंछ नहीं होते


क्योंकि शीर्ष - पूंछ मिलते हैं
सिर्फ इतिहास के संरक्षित अभयारण्य में
और वहाँ नाबाद हिलते हैं
किसी विजेता के फरमानी इशारों पर
भीड़ से खारिज आदमी पहले ही
खारिज कर चुका होता है ऐसे इशारों को
समय रहते इन्कार कर चुका होता है
शीर्ष और पूंछ के बीच हकलाती जिंदगी को


भीड़ से ख़ारिज आदमी
स्वीकार कर चुका होता है
शीर्ष- पूंछ विहीन अस्तित्व के अपने भूगोल को
वह पहचान चुका होता है
भीड़ में खड़े व्यवस्था के मदारी को
जान चुका होता है कि आज के दौर में
मदारी दरअसल एक संपेरा है
बजाता है नित नये सुरों में बीन दिन भर
बीन सांप के लिए है या भीड़ के लिए
यह एक बड़ा रहस्य है
और इस रहस्य को जिज्ञासा की खुजलाती धूप से बचाने के लिए
बीच बीच में वह नए-नए अंदाज़ में दिखाता है
सांपों का खतरनाक खेल
पैदा करता है डर का ऐसा मायावी बाजार
जहाँ सांप आभासी रूप में और बड़े दिखते हैं
और डर वास्तविक रूप में उनसे भी इतना बड़ा कि
शाम तक जिज्ञासा से ज्यादा जरूरी हो जाते हैं वे जंतर
जिन्हें बेचना हो जाता है तब बहुत आसान
और खरीदना भी बहुत ज़रूरी


भीड़ से खारिज आदमी जानता है
जंतर की असलियत
यह भी कि सांप दंतहीन है दरअसल
और डर एक झूठ है
सच यही है कि
भीड़ से जो बिल्कुल खारिज या अपदस्थ है
अपनी सोच में वही साफ है, वही स्वस्थ है

दाता बनकर तो देखो!

मैं जानता हूँ
उनके सामने
तुम याचक बनकर ही तो
रहते आये हो अब तक
तभी तो हर बार की तरह
इस बार भी
भूख/भय
गरीबी/लाचारी
बेरोजगारी
बेहाल शिक्षा/स्वास्थ्य/आवास
के विरुद्ध संघर्ष
और
भ्रष्टाचार मिटाने
हताशा दूर करने
और
विकास के नाम पर
न्याय दिलाने
वे आते हैं तुम्हारे पास
कभी पूरे न होने वाले
आश्वासन/
वायदें/
घोषणाएँ लेकर
जानते हैं कि
तुम याचक हो
और
तुम्हें भूलने की आदत है
और वे दाता
तुमने ही तो बनाया है उन्हें
कभी तुम भी
अपनी
बेचारगी को छोड़कर
अपनी
क्षमता को पहचानकर
भूमिका बदलकर तो देखो
वे याचक बनकर आते हैं
और
याचक ही बने रहें
एक बार
तुम स्वयं
दाता बनकर देखो।

गुरुवार, 19 सितंबर 2019

कुपोषण

कुपोषण है शत्रु बड़ा बलवान
इसे मिलकर भगाना है
चलिए अब हम सबको
जागरूकता का अलख जगाना है


जागरूकता ऐसी की बच्चे हो
स्वस्थ सेहतमंद
न कम हो ऊँचाई और
न कम हो वजन


खाने में शामिल हो
पौष्टिक, संतुलित आहार
विटामिन ,प्रोटीन,वसा,कार्वोहाइड्रेटयुक्त
भोजन करना है तैयार


माँ के अलावा अभिभावकों की
जिम्मेदारी की जरूरत है
बच्चे को खाना खिलाइए
बच्चे तो भगवान की मूरत है।


कवियत्री निभा कुमारी
(राजनगर ,मधुबनी , बिहार)

मेरे प्यारे अटल

मेरे प्यारे अटल!


तुम कहाँ गुम हुए?

 कहाँ गुम हुए ?

मेरे प्यारे अटल!

तुम में था एक कवि,

और एक नेता सरल।

तुम कहाँ गुम हुए ?

मेरे प्यारे अटल!

हैं तुम्हें खोजते 

मेरे दोनों नयन,

हो कहाँ तुम,

कहाँ कर रहे हो शयन?

आओ वापिस 

तुम्हें देखना चाहता हूँ।

कुछ पुष्प मैं तुमपर 

फेंकना चाहता हूँ।

मानता हूँ कि 

आना है मुश्किल बड़ा।

राह में है 

हिमालय भी आड़े खड़ा।

पर दिखाओ

तुम अपना वही हौसला।

फोड़ दो 

पर्वतों का घमंडी घड़ा।

कर रहा हूँ प्रतीक्षा

हर क्षण, पल -पल।

आ जाओ लौट कर मेरे प्यारे अटल।

आ जाओ लौट कर मेरे प्यारे अटल।।


मंगलवार, 17 सितंबर 2019

गजल

1. गजल

ताल्लुक़ात की सूरत संभालकर रखना

कोई न कोई महूरत संभालकर रखना

हर इक से मांग के शर्मिंदगी न हो तुमको

तुम अपनी सारी ज़रूरत संभालकर रखना

खुदा के बंदों ने कितने खुदा बना डाले

तुम अपने दिलकी ये मूरत संभालकर रखना

ये कह दिया कि मैं तेरे ही काम आऊँगा

हमें बवक़्ते ज़रूरत सम्भाल कर रखना

तुम्हारे दोस्त तुम्हे धोखा देने वाले हैं

मेरी पुरानी अदावत संभाल कर रखना


2. ग़ज़ल


इश्क़ में जान गंवा देने का दिल मे इरादा होता था

चार आंखों में और तो कुछ नहीं सिर्फ भरोसा होता था


ख़्वाब देखने की सब मे इक बीमारी सी होती थी

आंखें कम सुन्दर होती थीं सुन्दर सपना होता था


बचपन से ही रिश्तों का मतलब समझाया जाता था

सोने की गुड़िया होती थी हीरे का गुड्डा होता था


खून के रिश्ते, दर्द के रिश्ते, प्रेम के रिश्ते होते थे

रिश्तों में रिश्ते होते थे ऐसा रिश्ता होता था


कल तक अपने गाँव मे सम्बन्धों की फसलें उगती थीं

भय्या भाभी, चाची चाचा, मौसी ताया, होता था


मिन्नत को अफसोस यही है  कहाँ  गए वो सारे लोग

जिनकी प्यारी बातों में हर रंग निराला होता था ।


3. ग़ज़ल


किसी के ख़ुश्क लबों की मैं प्यास हो जाऊं

अगर वो चुप रहे मैं भी उदास हो जाऊं

तुम्हारे दर्द सुनूँ और मैं रहूं खामोश

ज़रूरी है मैं तेरे आस पास हो जाऊं

मेरे क़रीब से मुँह फेर कर नहीं जाना

कहीं न ऐसा हो मैं बदहवास हो जाऊं

ग़रीब बच्चों की ख़ातिर मुझे वो दौलत दे

मैं इनकी रोटी जटाओं, लिबास हो जाऊं

वो नंगे पांव चले लान में कभी 'मिन्नत'

तो मैँ भी उसके लिए सब्ज़ घास हो जाऊं ।


सोमवार, 16 सितंबर 2019

शब्द

इस देश में
लोग यूँ हीं मरते हैं


लेकिन 'यूँ हीं'
मरने के लिए
इनका देशी होना जरूरी है।


याद रखना
अगर शब्द 'विदेशी' जुड़ा हो
तो आसान नहीं है
इनका मरना।


सरकारी अस्पतालों में
मरे लोग और
पांच सितारा अस्पतालों में
दिवंगत आत्माओं के बीच
कुछ तो फर्क होता है।


तुम इतरा सकते हो
ऐसी जगह होने पर
जहाँ किसी प्रजाति के
आगे या पीछे लगे शब्द
बदल सकते हैं उसका मोल।


अफ़सोस है
वो शब्द जिस दुनिया से
आए हैं,
वहाँ शब्दों की नहीं
सिर्फ प्रजाति की कीमत होती है।


 श्वेतांक कुमार सिंह
चकिया, बलिया/
कोलकाता

गुरुवार, 12 सितंबर 2019

ग़ज़ल

 लोग मरते नहीं थे दुआ के लिए


सिर्फ़ जीते रहे वो अना के लिए


बेहया को ये कोई बताए ज़रा
हुस्न पैदा है होता हया के लिए


दिल मेरा आपने है दुःखाया बहुत
हाल पर छोड़िए अब ख़ुदा के लिए


देख लूँ इक झलक मौत आ जाएगी
ज़िन्दगी है बची इल्तज़ा के लिए


दंड उसका सुदामा को मिलता नहीं
कुछ बचाता अगर वो सखा के लिए


बलजीत सिंह बेनाम
सम्प्रति:संगीत अध्यापक

मंगलवार, 10 सितंबर 2019

समय हूँ

समय हूँ,समय हूँ मैं
मंजिल का मूल्यवान् हूँ।


जरा इस बात पर ध्यान दो मेरा-
तेरे जीवन की अनोखी क़ीमत हूँ ,
मोती से ऊपर मूल्य है मेरा
बड़ा बलवान हूँ ,
बड़ा  धनवान हूँ।


न मेरा कोई सजीव तन है
न मेरा अपना मन है
न मुझें आराम है
न किसी का प्रतिक्षा है
सिर्फ टिक-टिक कर-
मैं चलता हूँ।
जो इंसान मुझें
बेवफ़ा समझता है
इक-उम्र के बाद व
बहुत पछ्ताता है।


हाँ मैं समय हूँ
इसलिए इंसान की
निरंतर साथ हूँ।
मुझें सब महत्व देते हैं
चाहे धनी हों या निर्धन ,
चाहे चोर हों या धर्मनिष्ट ,
चाहे मजदूर हों या सैनिक।


जरा-सी मेरी-
क़ीमत में इंसान
मंजिल लेती है
प्राण खो देता है ,
मेरी कहानी अजब-सी है
समय हूँ, समय हूँ मैं
मंजिल का मूल्यवान् हूँ।


अनुरंजन कुमार "अँचल"
जिला -:अररिया ,बिहार

शनिवार, 7 सितंबर 2019

नया कानून

497 लो जी स्वागत कर लो
आ गया है नया कानून
जहाँ नर, नारी स्वच्छद भाव से
पूरा कर सकेंगे मन का जूनून
नारी परपुरूष को गले लगा सकती है
तो पुरूष भी लेकर परनारी का सहारा
कर सकता है पत्नी, परिवार से किनारा
दोनों मनायेंगे रंगरलियां, परिवार को छोडकर मंझधारा
नैतिकता को छोडकर
खुला होगा व्यभिचार
दैहिक सम्बन्धों के सामने
खडा रोयेगा परिवार
कुछ सोचकर थोडी कल्पना कीजिये
सोच, समझ कर ही फैसला दिजिये
बडे, बुजुर्गों, परिवार के रिश्तों
बच्चों, को भी एक नजर सोचिये
हमारी परिवार की शर्मोहया,
संस्कार, हँसी और ख़ुशी
सब बदल जायेंगे मातम में,
सबको मिलेंगे गम, और दुखी
हमारी भारतीय सोच तो हमेशा से
घर को मन्दिर बनाने की रही है
माँ, बहन, बेटी, पत्नि सारे रिश्तों में
अपनेपन की महक रही है
ऐसी खुली छूट के हमारे
जीवन पर दूरगामी परिणाम होंगें
परिवार टूटेंगे,भावनात्मक, रूप से भी
पति, पत्नि भी अलगाव भोगेंगे
थका हारा नर जब शाम को
परिवार की ठंडी छाँव तले आता है
पत्नि, बच्चे, परिवार में सभी को
हँसते, मुस्कुराते देख जन्नत का सुख पाता है
हमारे सनातन धर्म की विशेषता
यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते
रमन्ते तत्र देवता रही है
ये पाश्चात्य संस्कृति हमारी जडों को
खोखला करने का काम कर रही है
एक विदेशी जोसेफ की याचिका पर
कानून भारत के रिश्तों को बदल देता है
और भारतीय मर्यादा, संस्कृति
को ताक पर रख देता है
हर एक रिश्ता इक मर्यादा
में ही पनप सकता है औ, ये रिश्ता
स्नेह, प्रेम, आदर, सम्मान की
मजबूत नींव पर ही चलता है
नारी को विचारों को अभिव्यक्त
करने की आजादी दीजिए
स्नेह, प्रेम, सम्मान ,गुण दीजिए
पर, यूँ उसे कुलटा बनाकर
कलंकित न कीजिये
नारी और नगरवधु में
क्या फर्क कर पाओगे
जब रिश्ते,अहसास और
जमीर ही ना जिन्दा रख पाओगे
हमारा सनातन धर्म रिश्तों की
पवित्रता को सम्मान देता है
जब बनेंगे खुले सम्बन्ध तो
फिर कौन किसको मान देता है
भारतीय समाज को भी इस
कानून के दुष्परिणाम भोगने होंगे
विदेशों की देखा ~देखी अगर
ऐसे कानून भारत में लाये जायेंगे
मेरा भारत धर्म, संस्कृति, औ,
रिश्ते जी जान से निभाता है
विदेशियों की नकल मत करो
भारतवासी अपनी आन, बान पर मरता है


सीमा गर्ग " मंजरी "

शुक्रवार, 6 सितंबर 2019

हंसराज कॉलेज (दिल्ली विश्वविद्यालय ,दिल्ली)के सेमिनार हॉल में 'बाली उमर'उपन्यास पर मुख्य वक्ता के रूप में बोलते हुए।

हंसराज कॉलेज (दिल्ली विश्वविद्यालय ,दिल्ली)के सेमिनार हॉल में 'बाली उमर'उपन्यास पर मुख्य वक्ता के रूप में बोलते हुए दिनांक 27.08.2019 के दिन-

बाली उमर-भगवंत अनमोल

1.लेखक परिचय-
आचार्य रामचंद्र शुक्ल ने लिखा है -

"बिना परिचय के प्रेम नहीं हो सकता ।यह परिचय पूर्णतया तो साक्षात्कार से होता है।"

यह कथन काफी हद तक सटीक है।किसी भी व्यक्ति या लेखक या उनकी रचना को जानने, समझने और बुझने के लिए उस व्यक्ति से,लेखक से या उनकी रचना से साक्षात्कार करना पड़ता है।ठीक उसी प्रकार भगवंत अनमोल के 'बाली उमर' उपन्यास को समझने के लिए इनके अक्षरशः शब्दों,वाक्यों और विचारों को आत्मसात और असहमति प्रकट करने की जरूरत है।यह तभी संभव है,जब आप इन्हें शुरू से अंत तक पढ़ेंगे।

भगवंत अनमोल युवा लेखक हैं।इनकी रचना को हर उम्र के लोगों ने हाथों हाथ लिया है।इन्हें उत्तर प्रदेश हिंदी संस्थान के 'बालकृष्ण शर्मा नवीन पुरस्कार 2017' भी प्राप्त हो चुके हैं।उनकी पुस्तक 'जिन्दगी 50-50' पर कई विद्यार्थी शोध कर रहे हैं।

2.पात्र परिचय:-
पोस्टमैन(बंटी),खबरीलाल(पेटर),गदहा(रिंकू),आशिक(झण्डी लाल),'पागल है' आदि हैं।खबरीलाल ग्रामीण समाज में घटित सभी घटनाओं के लेखा जोखा रखा करते थे,पोस्टमैन समाज में एक दूसरे का संदेश पहुंचाने का कार्य किया करते थे,गदहा समाज के उन बच्चों में शामिल थे,जो कम पढ़ते थे और ज्यादा सोचते थे ,आशिक बचपन से ही आशिकी लेकर पैदा होनेवाले बच्चे थे और 'पागल है' उस समाज में परिस्थितियों का शिकार है।इनके अलावा और अन्य पात्र मयूरी,मिश्रराइन,मुखिया जी,बम्बईया आदि हैं।

3.उपन्यास के संदर्भ में

'बाली उमर' एक सामाजिक उपन्यास है,जिसे बालकों के द्वारा प्रस्तुत किया गया है।यह नवाबगंज के दौलतपुर मोहल्ले के बच्चें की कहानी है,जिस प्रकार प्रेमचंद के उपन्यास 'गोदान' बेलारी और रेणु के उपन्यास'मैला आँचल' मेरीगंज की कहानी है,ठीक उसी प्रकार यह कहानी है।यह भले मासूम बच्चे और शरारती बच्चों कहानी हो,मगर उनके सवाल देश और समाज के सवाल हैं।यह अपने समय की राजनीति और जातीय क्षेत्रीय पहचानों के संघर्ष का उपन्यास है।यह उपन्यास भाषा के नाम पर, धर्म के नाम पर, जाति के नाम पर , क्षेत्र के नाम पर बढ़ रहे द्वेष के दस्तावेज हैं।इन द्वेषों में भारतीय सभ्यता संस्कृति की पहचान धुंधली होती जा रही है।शुरू से अंत तक मनोरंजन के माध्यम से अपने समय के समस्याओं को समझाने और समझने में लेखक सफल हुए हैं।यह उपन्यास एक लड़का का आजादी की मांग करता है।इस उपन्यास में प्रेम है,संघर्ष है,समाज के दोहरे चरित्र हैं,इंसानियत हैं,भूख है,तड़प हैं और उम्मीद है।इस उपन्यास को निम्नलिखित बिंदु के माध्यम से समझने का प्रयास करेंगे-
1.अपनी अनुभूति को समाज तक पहुंचाने की तड़प-

भगवंत अनमोल अपने जीवन के सूक्ष्म से सूक्ष्म अनुभव को समाज तक पहुंचाने के लिए उत्सुक हैं।इन्होंने अपने जीवन के कटु अनुभव और सुखद अहसास को इस उपन्यास में शब्दबद्ध करने का प्रयास किया।यह अहसास उनके जीवन के किस्से हैं।वह अंदर ही अंदर धुंधला न पड़ जाएं,इसकी चिंता लेखक को है।उसे वे प्रकट कर देना चाहते हैं।जैसे-
"मेरे अंतर्मन में दबा यह किस्सा वक्त के साथ धुंधला पड़ता जा रहा है इससे पहले की यह कहानी अंदर ही अंदर दम तोड़ दे,मैं आपलोगों तक पहुंचा देना चाहता हूँ।"
यह तड़प सामाजिक तड़प है।एक इंसान की तीव्र उत्कण्ठता है।अपने जीवन के अनुभव को समाज को समर्पित कर देने की समृद्ध लालसा है,ताकि समाज का तनिक उद्धार हो सकें और भावी पीढ़ी उससे प्रेरणा प्राप्त कर सके।

2.सामाजिक कुरुतियाँ का पर्दाफाश-

ग्रामीण समाज और नगरीय समाज में अनेक कुरुतियाँ विद्यमान हैं।इन दोनों जगह पर रिश्ते की आड़ में वासना छुपे होते हैं और अनैतिक संबंध जुड़े होते हैं।ये संबंध हमारे मर्यादा को तार तार करते हैं।इसका भी बखूबी ख्याल लेखक ने रखा है जैसे-
"जानते हो वे?कल हम छप्पर के नीचे से भोगिल घर में झाँक देखे थे।वह टेलर की दुलहिन सिर्फ उसका घर का काम नहीं करत आये।भोगिल के साथ काण्ड भी करती है।"
यह उक्तियाँ सिद्ध करती है कि लेखक समाज के रग रग से वाकिफ हैं और खासकर इन कुरुतियों से।

3.राजनीति पर प्रहार

'बाली उमर' उपन्यास राजनेता का पर्दाफाश करते हैं।उनकी सत्ता प्रवृति को उजागर करते हैं।यह उपन्यास शोषण के पक्षधर पर कटाक्ष करती है।समाज और देश के जनप्रतिनिधि जनप्रिय नहीं हैं,बल्कि लठप्रिय हैं।जैसे-
"यह कहावत प्रचलित है कि जो सबसे बड़ा लठमार होता है,वही नेता बनता है।"
इस पंक्ति की जाँच पड़ताल करने पर और आज के जनप्रतिनिधि को देखने पर पता चलता है कि यह कहीं न कहीं सटीक है।

4.विवाह व्यवस्था-

भारतीय सभ्यता और संस्कृति की पहचान दांपत्य सूत्र हैं।यह सूत्र दो अनजाने लोगों को सात जन्म तक साथ साथ रहने की वकालत करती है।सात जन्म कोई रहे न रहे ,मगर एक जन्म के अधिकांश वक्त हँसते खेलते और मुस्कुराते हुए दोनों जी लेते हैं।यह इस व्यवस्था का सुंदर रूप है।यह दो लोगों के मिलन के साथ अनेक के ख्वाबों का मिलन होता है।जैसे-
"शादी सिर्फ दो लोगों की होती है,पर उस शादी से ख्वाब कई लोगों के जुड़े होते हैं।शादी की रात दो लोगों का मिलन नहीं कराती है,बल्कि नए लोगों के प्रेम प्रसंगों की शुरुआत की भी रात होती है।"

5.भोजन के बदले लातों की अशर्फियाँ-

'पागल है' इस उपन्यास का प्राण पात्र हैं।ये कन्नड़ समाज के हैं।इन्हें हिंदी नहीं आती है।इनके चाचा ने यहाँ इन्हें छोड़ दिया है।इनके चाचा को अपने भाई से कुछ असंतोष हैं,मगर यह असंतोष मर्यादा और सादगी की चादर ओढ़े हुए हैं।इनके अंदर द्वेष की ज्वाला है,जिसका शिकार 'पागल है' हुआ है।
'पागल है'(गोविंद) एक रात जंगल में काटी है।उन्होंने तालाब का जल पिया है।जलती धरती पर पाँव रखकर कई कोस चला है।भयानक रात में अनेक डरावने पशु पक्षी की आवाजें सुनी हैं।उनकी कमीजें फट चुकी हैं।उनके शरीर धूल धूसरित हैं और चेहरे भयानक हैं।वे आशिक के बहन के भोज को देखकर अपनी क्षुब्धा मिटाने की अदम्य साहस किये हैं,मगर उनके इस साहस के बदले उन्हें लातों की अशर्फियाँ प्राप्त हुई है।जैसे-
"इन सालों को लगता है कि मुफ्त का खाना है खा लो।"
ये वही सभ्य समाज के सभ्य लोग हैं,जो भूख,गरीबी,रोजगार और न जाने कितने धार्मिक और दान की परंपरा पर बड़े बड़े बड़े व्याख्यान देते हैं और प्रतिष्ठा की पोटली सर पर बाँधकर घूमते फिरते हैं,मगर ये औघरदानी यहाँ पर एक भूखे को भोजन देने में असफल हो गए हैं।यह समाज का कटु सत्य है।समाज के द्वारा किया गया अमानवीय व्यवहार है।यह दृश्य सभ्य समाज पर प्रश्नवाचक चिन्ह खड़ा करता है।

6.भगवान पर सवाल-

उपन्यासकार भारतीय समाज के सबसे बड़े सत्ता पर भी सवाल उठाते हैं।ईश्वर को सर्वशक्तिमान मानने वालों को नंगा करते हैं।उनके सवाल के आगे ईश्वर के पक्षधर पंगु बने हुए खड़े लगते हैं।जैसे-
"कहाँ गए ये ईश्वर को पूजनेवाले?कहाँ गए थे हर इंसान को ईश्वर की औलाद कहननेवाले?एक ईश्वर की औलाद भूखी दर दर भटक रही थी।उसका क्या होगा?आखिर वह भी किसी का बेटा है,किसी के जिगर का टुकड़ा है।हम क्यों अपने से भिन्न लोगों के साथ बुरा बर्ताव करते हैं?"
समाज के पास इस सवाल का जवाब है।शायद अगर हो भी तो निर्लज्जता पूर्ण आचरण का ही एक उदाहरण होगा।कोई समाज इतना निर्दयी कैसे हो सकता है?जरा सोचिए हम मनुष्य के लायक हैं या नहीं।अभी मनुष्य बनने के लिए सदियों का सफर त तय करना पड़ेगा।

7.सुखद स्मृति याद आना-

मानव का मन हमेशा दुख के पल में सुखद स्मृति से टकराते हैं।जो पल संयोग का अमृत होता है ,वही वियोग का विष।यह विष ही जिंदगी की सार्थकता है।शुक्ल जी ने सच ही लिखा है-"जिनका दिल सही सलामत है,जिनका हृदय मारा नहीं गया है,उनकी दृष्टि अतीत की ओर जाती है।" इस तराजू पर तौलने के बाद हम पाते हैं कि पागल का दिल सलामत है।उन्हें अपने अतीत के सुखद पल याद हैं।जैसे-
"तभी उसे याद आया कि उसके नाराज होने के बाद उसके बाबू उसके लिए मिठाई लेकर आये और उसने नाराजगी में वह मिठाई फेंक दी थी।उस वक्त कहाँ पता था कि ऐसा समय आएगा जब उसे पीने के लिए पानी और खाने के लिये भोजन तक नसीब नहीं होगा।

8.खुद की पहचान खो देना-

'पागल है' लातों और घूसों के अशर्फियाँ खाकर मूर्छित होकर जमीन पर गिर पड़े थे।उनकी मूर्च्छा टूटी।तब तक में लोग भोजन कर चुके थे।उन्होंने उनके फेंके पतल से बिन बीनकर खाया ।यह दृश्य प्रेमचंद के कहानी 'बूढ़ी काकी' की याद दिलाती है।इस दृश्य को देखकर मुखिया का हृदय द्रवित हो गया और वे उन्हें अपने घर ले आया,जहाँ पर उनके भाषा और बोली कोई समझते नहीं हैं।उन्हें पशु चराने का कार्य सौंपा गया और सुखी रूखी रोटी देकर तथा फटी चादरे और फटी बिस्तर देकर अपने कर्तव्य का इतिश्री समझ लिया गया ।अब वे एक मजदूर थे।पेट पर काम करनेवाले मजदूर।उनकी पहचान मिट चुकी थी।जैसे-
"एक तरफ उसके एक ही प्रान्त की ऐश्वर्या राय ने कुछ महीने पहले ही विश्व सुंदरी का खिताब हासिल कर विश्व भर में पूरी भारत का नाम रौशन किया था और अपनी पहचान बनायी थी,वही दूसरी ओर उसी प्रान्त का एक लड़का अपने ही देश में पहचान खो चुका था।"

9.मौत को गले लगाना-

इंसान परिस्थितियों से लड़कर कभी कभी काफी कमजोर हो जाते हैं।वे किंकर्तव्यविमूढ़ता की स्थिति में आ जाते हैं।उन्हें जीवन का कोई राह नहीं दिखाई पड़ता है,ऐसे विषम परिस्थिति में लोग मौत को गले लगाने के लिए आतुर हो जाते हैं।मगर इससे बड़ी कायरता इस संसार में कुछ भी नहीं हो सकता है।जिंदगी को जिंदादिली के साथ जीना चाहिए।'पागल है' एकबार वहाँ से भागने का प्रयास किया था,मगर वे सफल नहीं हो पाए।उसके बाद उन्होंने मौत को गले लगाने का प्रयास किया,परन्तु उन्हें एक स्त्री की झलक ने बचा लिया।जैसे-
"किसी भी व्यक्ति के लिए प्रेम या स्त्री आकर्षण से अधिक आकर्षण क्या हो सकता है।वह ऐसा ही कर रहा था कि तभी उसके सामने से एक लड़की गुजरी।"
यह गुजरना उनकी नई जिंदगी की शुरुआत है।इसलिए छायावादी कवियों ने खासकर नारी को विशेष सम्मान दिया था।जयशंकर प्रसाद ने तो नारी को श्रद्धा और विश्वास की साक्षात मूर्ति कही थी।उसने लिखा है-
"तुमुल कोलाहल कलह में
मैं हृदय की बात रे मन।"
सच नारी का जीवन पुरुष के जीवन का परिचायक है।यू कहें तो पुरुष का और इस संसार का अस्तित्व उसके बिना संभव ही नहीं है।

10.भाषा की विभिन्नता और एक उम्मीद-

जैसा कि शुरू से ही विदित है कि "पागल है" कन्नड़ समाज के हैं।वे हिंदी वासी प्रदेश में अभी विद्यमान हैं,मगर उन्हें हिंदी नहीं आती है।यहाँ पर लेखक दो संस्कृतियों को जोड़ते हैं।बम्बईया ग्रामीण क्षेत्र का ही लड़का था,मगर वे बंबई तक की यात्रा कर चुके हैं।ये पात्र "गोदान" के 'गोबर' की याद दिलाते हैं।वे थोड़ा कन्नड़ भी जानते हैं-सिर्फ परिचय भर।वे चारों के साथ खेल खेल रहे हैं।वहीं पर 'पागल है' पशु चरा रहे हैं।बम्बईया समाज के अवधारणाएं और उनकी झूठी बंदिशे को उघाड़ते हैं।वे 'पागल है' से बात करते हैं।जैसे-
बंबईया-नमस्कारा,हेगीदिरा(नमस्कार कैसे हो?)
'पागल है' का जवाब-सरियागी नी ईदी(ठीक ही है।)
बंबईया-एन नी उठा मड़ीदिया(क्या तुमने खाना खा लिया?)
जवाब-हां,उठा माड़ीदे(हां, खा लिया)
बंबईया-निन्ना हेसुरु ऐनु(तुम्हारा नाम क्या है?)
जवाब-गोविंद
ये संक्षिप्त वार्तालाप ही उनकी जिंदगी की आजादी की गाथा लिख देती है।

11.हिंदी सिखाने की जिद और नाटक की तैयारी-

अब चारों मित्र जान चुके हैं कि 'पागल है' पागल नहीं हैं।वे उन्हें सिखाने की बीड़ा उठाते हैं और उनकी आजादी की लड़ाई लड़ने का बीड़ा उठाते हैं और उसके लिए नाटक का सहारा लेते हैं।सिखाने के क्रम में वे एक बच्चे की तरह उन्हें अक्षर ज्ञान देते हैं।जैसे-
"जिस तरह एक बच्चे को सिखाते हैं हर चीज दिखाकर बताते है कि यह एक केला है,तो केला दिखाते हैं।शरीर के अंगों पर हाथ रखकर बताते हैं कि यह नाक है और यह कान है।"

12.मुखिया का अत्याचार-

जब मुखिया को पता चलता है कि 'पागल है' नहीं हैं,तो वे हर संभव उन्हें 'पागल है' सिद्ध करने का प्रयास करते हैं।वे उन्हें मित्रों से मिलने पर पाबंदी लगा देते हैं।उन्हें काफी मारते हैं।उन्हें मार कर भूसा वाले घर में डाल देते हैं।जैसे-
"जब मुखिया जी को पता चला कि मेरी आजादी के लिए मेरे दोस्त नाटक कर रहे हैं तो उन्होंने मुझे बहुत मारा।मार मार कर भूसा वाले कमरा में डाल दिया बाहर से बंद कर दिया। मैं दो दिन से भूखा।मुझे बहुत मारा।
यह वर्णन ही सभ्य लोग के सादगी पर बड़ा सवाल पैदा करते हैं।ये दोहरा चरित्र का एक उदाहरण हैं।ऐसे अनेक उदाहरण हमारे समाज में उपलब्ध हैं।

13.आदर्श पात्र-

'पागल है' यहाँ पर एक आदर्श पात्र के रूप में हमारे सामने आते हैं।जीवन के तमाम संघर्ष के बावजूद भी किसी से द्वेष और घृणा नहीं।जैसे-
"अगर आप मेरा बदला लेना चाहते हैं तो मुझे मेरे घर छोड़ दीजिए।"यह दृश्य 'रंगभूमि' के सूरदास और 'गोदान' के होरी तथा जैनन्द के 'त्यागपत्र' के मृणाल की याद दिलाते हैं।

14.एक शिक्षक के रूप में-

'पागल है' पात्र अपनी सीमा से बाहर हो गए हैं।वे अब एक शिक्षक के रूप में हैं।उनकी प्रेमिका खुद कहते हैं-
"तुमने यहाँ पर सात साल 'पागल है' बनकर गुजारे हैं।पर आनेवाली पूरी जिन्दगी एक शिक्षक के रूप में गुजारोगे।हम सभी को यह सीख देकर जा रहे हो कि चाहे विपरीत परिस्थिति मिल जाये,हमें हार नहीं मानना चाहिए।अपनी जिजीविषा के सहारे भरसक जीना चाहिए।एक दिन जरूर कोई न कोई रास्ता निकलेगा।" -यही तो जिंदगी जिंदादिली है।

15.भाषा-

इस उपन्यास में ग्रामीण बोलियाँ हैं।जैसे- दे गन्ना दे गन्ना।ग्रामीण शब्द हैं-दुलहिन,कपड़न, टेलर,कुकुर भोज आदि।इनके पात्र के नाम भी ग्रामीण हैं-खबरीलाल ,आशिक,पोस्टमैन गदहा, पागल है आदि।भाषा सरल और स्पष्ट है।भाषा में प्रवाहमयता का ख्याल रखा गया है।

16.एक उम्मीद-

यह उपन्यास एक उम्मीद पर लाकर छोड़ती है।यह उम्मीद जिंदा शब्द है। इसके सहारे लोग जिंदगी जीते हैं।यह उम्मीद एक विश्वास का है और प्रेम का है।जैसे-
" 'पागल है' ने अपने आँसुओं को रोकते हुए हामी भर दी।हां, मैं तुम्हें लेने जरूर आऊँगा।"

17.निष्कर्ष-

यह उपन्यास जीवन में आस्था पैदा करता है।इस उपन्यास के लेखक को समाज का बोध है,प्रेम का बोध है,भाषा की विभिन्नता का बोध है,गुलामी का बोध है और अपनी आजादी का बोध है।यह उपन्यास पाठक को अपने में बाँधकर रखने का सामर्थ्य रखता है।'पागल है' की लड़ाई और आजादी एक खाँचे से बाहर जाने की है।यह उपन्यास मनुष्य के निजी जीवन की व्याख्या करता है।यह भारतीय जनजीवन की जिजीविषा और जिंदगी की संभावनाएं की वकालत करता है।इस उपन्यास में विद्या को मुक्ति देने का एक सशक्त हथियार के रूप में प्रस्तुत किया गया है।भले इस उपन्यास का शीर्षक -'बाली उमर' है,मगर यह हर उम्र की दस्तावेज है।इनके केंद्र में प्रेम है,आकर्षण है,संघर्ष है,आजादी की लड़ाई है,नगरी सभ्यता का मिलन है,जीवन का सौंदर्य है और उमीद की एक किरण हैं।

18.अपील-

एक आलोचक को पक्ष और विपक्ष दोनों पर विचार करना चाहिए।ये आलोचक की प्रतिभा का भी एक प्रमाण है,परंतु जबरदस्ती निंदा करना और रचना पर सवाल उठाना एक अपराध भी है।सवाल करना बुरी बात नहीं है,मगर सवाल के पीछे अपना तर्क प्रस्तुत नहीं करना बुरी बात है।हमें यह कहने में संकोच नहीं है कि एक आलोचक को लगे कि इस लेखक की सर्वांग वर्णन ही सत्य है,तो उन्हें आत्मसात कर लेने में कहीं संकोच नहीं होनी चाहिए।रचना को रचना के तरह पढ़ना चाहिए न कि पक्ष विपक्ष की दृष्टि से ।रचना को पूर्णतः पढ़ लेने के बाद पक्ष विपक्ष की दृष्टि अपनानी चाहिए,ताकि उनके हर संदर्भ स्पष्ट नजर आए।बस इतना ही-

-तेजप्रताप कुमार तेजस्वी
दिल्ली विश्वविद्यालय,दिल्ली

जब पत्ता गिरता है

कोई पत्ता 


अगर धीरे से भी गिरे
तो
पूरे घर को
जड़ तक हिला देता है


पेड़ तो खड़ा है
पहले जैसा
पर
आंधियों का रुख
बता देता है


उसकी चुप्पी की गूंज
भोर की
फुर्तीली किरण से चलकर
दरवाजे पर पड़े
अखबार में
साफ सुनाई देती है


उसका गिरना
गेंहू बनने की प्रक्रिया पर
विराम जैसा है


उसका धूल से मिलना
घरों की खिड़कियों और
दरवाजों का बंद होना है
इतना हीं नहीं
बच्चों के बचपना का
मंद होना है


लेकिन
गिरना तो है,
चाहे जितना यत्न करो
वो गिरेगा जरूर
शायद
मेरे आँगन में
तुलसी का पौधा बनकर
या मेरे खेत में
बबूल का पेड़ बनकर।।


श्वेतांक कुमार सिंह
बलिया/कोलकाता

गुरुवार, 5 सितंबर 2019

लाचार बच्चा

मै उन जैसा नहीं था
उनका नादानियां, भोलापन
सबको अच्छा लगता
पर मैं उन जैसा कहा था
मै तो डहरा अपंग सिर्फ अंग,दिमाग से
नहीं होता अपंग जनाब
न आत्मविश्वास हो न साहस न ही हों
तेज,चमक,न खिलखिलाकर हस्ता था
मै तो बस जी भर के अपनी मां के गले
लग रोना चाहता था
मै हर समय खुद को कमजोर समझता था
जीने का बस एक यही सहारा
की अपना भी दिन आएगा
ना दिन आया ना रातों को चैन
बस यूंही कश्मकश में ज़िन्दगी कटती गई
क्यों हूं मै ऐसा, क्यूं नहीं मै उन जैसा
सम्मान पाने के लिए तो लड़ रहे हैं सब
मैं भी बस इज्जत ही चाहता था ज़िन्दगी
तुझसे बस इतना ही
मै लाचार सहमा बच्चा


टीना कर्मवीर


(सामाजिक कार्यकर्ता और  शोधार्थी हरियाणा)

सच बुरा होता है

सच बुरा होता है
बहुत बुरा...
इस हद तक कि
तुम मजबूर होते हो
झुकने को
हाँ झूठ की तरफ
वो झूठ जो,
उसे अच्छा लगता है
वो झूठ जो
तुम सच कहते हो
कितनी चालाकी से
मशहूर हो तुम
इस प्रवृति में
तब्दील के प्रवृति


पूजा चम्याल

बुधवार, 4 सितंबर 2019

मेरे पिता

मेरे पिता ने मुझे जिंदगी में
सबसे बड़ा तोहफा दिया,
उन्होंने मुझ में यकीन किया,


मेरे पिता ने पंख दिए उड़ने के लिए,
मां ने मुझे उडने का मौका दिया
एक हौसले से भरी जिंदगी,
और जीने का अवसर दिया


तेरा यूं कहना हौसला बुलंद रख
मंजिल मिल ही जाएगी भरोसा रख
खुद पर राहें आसान हो ही जाएंगी


यह व्यथा नहीं है मेरी यह तो सच्चाई है
संघर्ष के गर्भ से निकली इच्छाओं की कहानी।।


टीना कर्मवीर


(सामाजिक कार्यकर्ता और  शोधार्थी हरियाणा)

धर्म बता दो

अगर भूख कौम के रास्ते आती है
तो रोटी का भी कोई धर्म बता दो


आप धनाढ्य हैं,आप बच जाएँगे
खेतिहरों का भी कोई साल नर्म बता तो


दिल्ली की बाँहों में हैं सब रंगीन रातें
किसी मल्हारिन का भी चूल्हा गर्म बता दो


बेटियों से ही सब उम्मीद की जाएँगी क्या
देश के संसद में भी बची हुई शर्म बता दो


मन्दिर जाने से ही पाप-पुण्य होता है क्या
फिर आधुनिक बाबाओं का भी कर्म बता दो


कविताएँ जो कह पाती सब की बातें
तो तहखानों में कैद ज्ञान का मर्म बता दो


सलिल सरोज

मेरा चाँद

मेरा चाँद निकल आया है,ज़मीं पे रोशनी हो गई
उस आसमाँ के चाँद की जरूरत नहीं,इक्तिला करो


गर फिर भी है कुछ खुशफहमी उस चाँद को तो
मेरे चाँद के पाकीज़ा तबस्सुम से मुकाबला करो


हम दिखाएँगे तुम्हें इन सितारों की सब बदमाशियाँ
शाम ढ़लते ही पुरानी गली में हम से मिला करो


ख़त लिखने का चलन नहीं तो क्या हुआ
अपनी बोलती आँखों से ही इश्क़ का सिलसिला करो


मैं ठण्डी हवा की दुशाला ओढ़े तकता रहूँ तुम्हें
तुम किसी बाग में मोगरे की तरह हिला करो


आया हूँ दिसम्बर में तुम्हारे शहर दिल्ली में
घड़ी दो घड़ी धूप बन कर मुझ पर खिला करो


बस ख़त्म करें ये दूरियाँ कुछ इस कदर कि
तुम खुद को चाँदनी चौक ,मुझे लाल किला करो


मैं बन जाऊँ व्याकुल सी भागती हुई कोई मेट्रो
तुम बस भीड़ में मुझ तक आने का हौसला करो


मैं बल्लीमारान की गलियों की ज़हमतें उठा लूँ
तुम जो ग़ालिब का शेर बनकर मुझ पर छलका करो


मैं तुझ में बिड़ला मंदिर की घंटियों सा गूँजा करूँ
तुम मुझ में जामा मस्जिद की अजान सा ढ़लका करो


सलिल सरोज

अब नहीं आएगा कोई

अब नहीं आएगा कोई
ज्योतिबा फूले ,
राजा राम मोहन राय ,
और नहीं आएगा कोई अम्बेडकर


क्योंकि समाज बट गया है
टुकड़े-टुकड़े टुकड़े-टुकड़े
तुमको स्वयं ही लड़नी होगी
अपनी लड़ाई , छोड़ना होगा सारा डर..


जो तुम शरमा जाती हो
देख कर किसी को अपनी ओर देखता
जो तुम चुप रह जाती हो
थोड़ी देर की ही तो बात है सोचकर


जो तुम डर जाती हो
कुछ करने से पूर्व परिणाम सोचकर
जो तुम चुप हो जाती हो
की कोई नहीं समझेगा छोड़ो जाने दो


जो तुम अपना हक छोड़ती हो
कोई बात नहीं भाई तो पढ़ रहा है ना
जो तुम समझौता करती हो
लड़की तो पराई ही होती है ये सोचकर


जो गलत को भाग्य मानती हो
पति ही तो है मार भी दिया तो क्या हुआ
जो तुम अंधविश्वास करती हो
कोई चौर जब पीछे हो तो काले डोरे को चूमने का


बदलना होगा सबसे पहले
अपने द्वारा किये जा रहे गलत कार्यों को
तब ही तुम चल पाओगी
इस मानसिक रूप से अपंग समाज से आगे


धर्म
(आलोचना और सुझावों का स्वागत है)

दो जन

अक्सर ऐसा होता है
जब दो "जन" बात करते हैं
एक रिश्ता बन जाता है
फिर प्रेम भरी तकरार का
समाँ बन्ध सा जाता है


उम्मीद जुड़ जाती है
कही निराशा हो जाती है
"उसकी" फ़िक्र भीतर साँस लेती है
अक्सर ऐसा होता है...


ख्याल सो जाते हैं
नींद जागती रहती है...
आँखे नम हो जाती है
कुछ थम सा जाता है
सांसे जोर पकड़ती है
अक्सर ऐसा होता है...


प्रेम कहीं खुद को "तलाशता" है
सुर्ख़ आँखे हाल बयां करती है
आंसू यूँ बहते है...वो भी
साथ छोड़ रहे हो जैसे


ख़ामोशी गुनगुनाती है
आवाज़ "दब सी" जाती है
"प्रेम "भीगता रहता है
जैसे कभी न सूखने के लिए
अक्सर ऐसा ही होता है


मीनाक्षी गिरी


(शोधार्थी अन्तराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय वर्धा)

आखिर कब तक

आखिर कब तक
मुझे यूं ही नफरत करोगे।
मिट्टी में मिलने के बाद तो
एक दिन तुम याद करोगे।


आखिर कब तक
अपने दिल की धड़कनों से
मुझे दूर करोगे।
सांसे रुक जाने के बाद तो
अपनी धड़कनों में तो
एक दिन मुझे सुनोगे।


आखिर कब तक
मेरे दर्द पर मुस्कुराओ गए।
बेदर्द दुनिया से दर्द मिलने पर
एक दिन तो मुझे
याद कर तुम पछताओगे।


आखिर कब तक
मेरे खिलाफ औरों से
तुम गुफ्तगू करोगे।
एक दिन तो रो-रो कर
आहें भर मुझे याद करोगे।


राजीव डोगरा (युवा कवि लेखक,भाषा अध्यापक)

राजनीति और लोकतंत्र

जब हुआ मतदान।
खूब बाँटा गया।
दारू और राशन-दान।


देश की जनता।
समझ वैठी।
यही है।
राजनीति का।
अमूल्य-दान।


लेकिन।
भईया जब वैठे।
गद्दी पर।
वही राशन-दान।


बन गया।
बिलकुल विषपान।
क्योंकि अब हुआ।
अपना-अपना।
राम-राम।


लेकिन।
इसका क्या हो।
समाधान।


इसलिए।
भारतीय राजनीतिक पार्टियों को।
अंकित चौरसिया का प्रणाम।🙏


डॉ. अंकित चौरसिया(दिल्ली विश्वविद्यालय)

उसे मेरी याद तो आती होगी

उसे मेरी याद तो आती होगी
जब चाँद की आग़ोश में सूरज छुप जाता होगा
नदी की घाट से हर शख्स़ घर को लौट जाता होगा
रेत पर लिखा हर नाम, मिट जाता होगा
उसकी परछाई भी लम्बी हो जाती होगी
हर रोज छत पर शाम जो आती होगी
उसे मेरी याद तो आती होगी॥


झट–पट गुस्से में उसकी भौवें, तन जाती थी
पल एक पल में ही वो रूठ जाती
अगले पल ही जोरो की ठहाके लगाती थी
सुबह उठ फोन पर हाथ जो लगाती होगी
कुछ सोच, उसकी आँखे भर तो जाती होंगी
उसे मेरी याद तो आती होगी ॥


झुक जाती थी नज़रें उसकी, जो मैं प्यार से देखा करता था
ख़ुश हो लिपट जाती, जब कुछ लिखकर उसको पढ़ता था
तुम बहुत बेहतरीन लिखते हो, हमेशा लिखते रहा करो ,
वो ऐसा हर बार कह जाती थी
मुझे पढ़ने की चाहत में, मुझे सुनने की आहट में
आज भी नींद भरी रातों में जग तो जाती होगी
उसे मेरी याद तो आती होगी ॥


चौराहों पर अक्सर मैं रास्ता भटक जाया करता था
या फिर जान-बूझकर पूछा करता –
ये हम कहा आ-गये, किधर जाएगा ये रास्ता ?
क्योंकि उस शहर से मेरा कम ही था वास्ता
वो प्यार से मुझे हर रास्ता बताती
कभी हाँथ पकड़, संकरी गलियों में घुमाती थी
हर छोटी–बड़ी चीज़ को कुछ ऐसे बताती,
मानो पूरा शहर उसमें ही बसा हो


मैं मन्नत-ए-आरज़ू उसके दर पर जाता था
वो एक रहनुमा जैसी सब कुछ बता जाती थी
आज भी जब वो उन चौराहों से गुज़रती होगी
सर-सरी हवाएं, उसे छूकर तो जाती होंगी
उसे मेरी याद तो आती होगी ॥


सुचित कुमार यादव,


दिल्ली विश्वविद्यालय में पीएचडी स्कॉलर है


और हिन्दू कॉलेज में राजनीतिक विज्ञान पढ़ाते हैं ॥

कहाँ है सब्र...

कहाँ है ये सब्र।
सब्र चाहिए मुझे।
फिर से सोचा।
घूमते है जहाँ।
पढ़ते है पोथी।
लेकिन सबके बाद।
मिला सच में।
सब्र के रूप में
एक सब्र का सच।
सब सब्र देते है।
सब सब्र बताते है।
सब्र मिलता है।
अपने आप से ।
अपने सब्र से।
अपने आत्म से।
अपने सोच से।
अपने भरम।
उसे खत्म करने से।
मिलता है सब्र।
सच को सब्र से।
सुनने में।
अब यही है सब्र।
अभी मिला है सब्र।
ढूंढ़ लिया है सब्र।
अब नही छूटेगा।
ऐसा सब्र।
मुझे चाहिए था सब्र।
अब सब्र से हूँ।
बस यही तो है सब्र।


अंकित चौरसिया


(दिल्ली विश्वविद्यालय में पीएचडी के छात्र हैं)

एक वेश्या, कविता

आखिर मनुष्य ही होती है ये वेश्या





क्यों नहीं समझता समाज इनको




अपना हिस्सा - क्यों किया इनको तुम ने




दरकिनार




अपनी भूख मिटाने के लिए बना लेते हो




इनको अपना




नहीं तो इनके कोठे (घर) को भी तुम गाली देते हो




आखिर क्यों




सुनो शायद वह कोठा नहीं




घर है उनका




गाली देने से पहले याद कर लेना उस पल




को जिस समय वह तुमको सहती है




वह भी अपने में लीन होती है




तुम भी अपने में लीन रहो




और मत दो गाली इनको




यह भी मनुष्य है - समाज का एक हिस्सा




जीने दो इनको




मत दो गाली


मोद कुमार मीणा (दिल्ली विश्विद्यालय के छात्र हैं )

मंगलवार, 3 सितंबर 2019

अल्लाह औ ईश्वर

मेरे यहाँ एक नया नया मन्दिर खुला है,
नाम हालांकि प्राचीन रखा है।
लालची लोग आएं जल्दी - जल्दी
मन्दिर को प्राचीन बनाये जल्दी - जल्दी


इसलिए भंडारा सुबह-शाम चला रखा है।
लालची लोग जाते हैं कुछ मांगने
और देकर आ जाते हैं यह भी नहीं
विचारते जिससे खुद मांगने जा रहे हैं


उसे भला क्या दे सकते हैं, और यदि उसे
दे सकते हैं तो उससे मांगना कैसा ?
जरा सी अफवाह उड़ी नहीं कि ,
निकल पड़ते ईश्वर व अल्लाह को बचाने !


भूल जाते की हैं कि जब स्वयं पड़े होते हैं
किसी मुसीबत में तब आता है याद आते
हैं... अल्लाह औ ईश्वर ।
जब आप ईश्वर औ अल्लाह को खुद से


अधिक समझदार , अधिक बलवान औ
सर्वशक्तिमान मानते हैं।
तो फिर वह स्वयं की रक्षा के लिये
क्यों आप लोगों बुलायेगा ?


आप जरा विचार कीजिए जब ईश्वर
व अल्लाह की नजरों में सब समान हैं।
सभी उसके बन्दे हैं तो आप लोगों के
आपसी बैर से उसे क्या लाभ , लाभ होता है
कुछ बड़े लोगों का, राजनीतिक पार्टियों का...


धर्मवीर (दिल्ली विश्वविद्यालय के पूर्व छात्र हैं)