मंगलवार, 3 सितंबर 2019

संतुष्ट है भारत

मैं चाहती थी एक कविता लिखना
पर वो शब्द आते नहीं मेरे ज़हन में
जो बयां कर सके उन संवेदनाओ को,
जो महसूस होती हैं उन हर एक माता-पिताओं को,


जिनके नोनिहालों ने ऑक्सीजन की कमी से
तोड़ दी थीं सांसे, छोड़ दिया था शरीर,
और चले गए इस दुनिया से कहीं बहुत दूर
जिनकी उम्मीदें पंख लगने से पहले ही
कटने लगी हैं उस जानलेवा बीमारी से


जिसमें खत्म होते जा रहे है
वे नन्हें नन्हें बचपन
जिन्हें अभी खेलना था
पकड़म-पकड़ाई और छुपन-छुपाई
दोष किसका है!


उन मासूमों का या फिर उस राजनीति का?
जो संसद में मुद्दों की जगह "नारे" परोसती है,
अगर कुछ घट जाये तो विपक्ष को कोसती है।
राख हो जाते हैं वो देश के युवा
आग में जलकर


जिन्हें भावी आईपीएस,टीचर और डॉक्टर बनना है,
न बचा सके उन्हें अग्निशमन यन्त्र और रक्षामंत्रालय के मंत्री ही
बस देश का मुद्दा रहा सबको राष्ट्रवादी बनना है।


पंखे से झूलते पाए जाते हैं
शिक्षण संस्थानों में वे छात्र
जो छोड़ जाते हैं बेबसी में
कुछ प्रश्नचिह्न इस व्यवस्था पर


जो लाख कोशिशों के बाद भी ढलती नहीं,बदलती नहीं।
आख़िर कौन सन्तुष्ट है भारत की नीतियों से,
जिसकी अर्थव्यवस्था सही ढंग से चलती नहीं।
शहीद होते जाते हैं देश के जवान
कभी आतंकवादी हमलों में
तो कभी देश की सीमाओं पर,
कोई नहीं पूछने जाता


क्या गुजरती है उनके परिवार पर।
घटनाएं घटती हैं और फिर अखबारों में
दब जातीं हैं कहीं गहरे अतल में
कोई कार्यवाही नहीं,सुनवाई नहीं
इस भारतीय ससंद के पटल में।
ऐसा हाल हो चुका है अब


उस सोने की चिड़िया रूपी भारत का
जहाँ बालक,किशोर,प्रौढ़ और जवान
देश का हर नागरिक है परेशान,
शिक्षा नहीं, स्वास्थ्य नहीं, रोजगार नहीं
फिर कैसे है ये भारत मेरा महान..!!


कमलेश ( शोधार्थी, हैदराबाद विश्वविद्यालय )