मंगलवार, 3 सितंबर 2019

कब संभव


हर चाँद में वों मंजर ही हो
हर प्रेमी उसे कुछ यूँ झाँके
हर वक्त रहे चाँदनी सफर
यह कब संम्भव , यह कब संम्भव ॥ 







हर रोज जेहन में आये तूं
बस मीठा ही मुस्काये तूं
हर प्यार भरी नजरे तेरी
कुछ चुपके से कह जायें यूँ
हर बात जो लुक - छुप हो जाये
यह कब सम्भव , यह कब संम्भव ॥ 






तू आकर मेरा आंगन देख
ये रुखा –सुखा सावन देख
तेरे होने की पहचान हो
दिल में तेरा एहसान न हो
यह कब संम्भव, यह कब संम्भव ॥






जीवन तो यूँ ही कट जाता है
एहसास दिलो में रह जाता है
हम –तुम एक साँस में न बंधते
यह दर्द भला ही क्यों होता
एक राह पर चलते –चलते यूँ
दो प्यार के प्यासे न मिलते
यह कब संम्भव, यह कब संम्भव ॥





कोई शख्स जिसे यूँ बांध ले तू
अपनी बाहों में साध ले तू
हर रोज वो जिन्दा ,यूँ ही जी ले
तेरे प्यार बिना यह कब संम्भव
यह कब संम्भव, यह कब संम्भव ॥ 


डॉ. सुचित कुमार यादव


( हिन्दू कॉलेज में सहायक अध्यापक )