गुरुवार, 12 सितंबर 2019

ग़ज़ल

 लोग मरते नहीं थे दुआ के लिए


सिर्फ़ जीते रहे वो अना के लिए


बेहया को ये कोई बताए ज़रा
हुस्न पैदा है होता हया के लिए


दिल मेरा आपने है दुःखाया बहुत
हाल पर छोड़िए अब ख़ुदा के लिए


देख लूँ इक झलक मौत आ जाएगी
ज़िन्दगी है बची इल्तज़ा के लिए


दंड उसका सुदामा को मिलता नहीं
कुछ बचाता अगर वो सखा के लिए


बलजीत सिंह बेनाम
सम्प्रति:संगीत अध्यापक