बुधवार, 4 सितंबर 2019

दो जन

अक्सर ऐसा होता है
जब दो "जन" बात करते हैं
एक रिश्ता बन जाता है
फिर प्रेम भरी तकरार का
समाँ बन्ध सा जाता है


उम्मीद जुड़ जाती है
कही निराशा हो जाती है
"उसकी" फ़िक्र भीतर साँस लेती है
अक्सर ऐसा होता है...


ख्याल सो जाते हैं
नींद जागती रहती है...
आँखे नम हो जाती है
कुछ थम सा जाता है
सांसे जोर पकड़ती है
अक्सर ऐसा होता है...


प्रेम कहीं खुद को "तलाशता" है
सुर्ख़ आँखे हाल बयां करती है
आंसू यूँ बहते है...वो भी
साथ छोड़ रहे हो जैसे


ख़ामोशी गुनगुनाती है
आवाज़ "दब सी" जाती है
"प्रेम "भीगता रहता है
जैसे कभी न सूखने के लिए
अक्सर ऐसा ही होता है


मीनाक्षी गिरी


(शोधार्थी अन्तराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय वर्धा)