मंगलवार, 24 सितंबर 2019

पानी और पत्थर

मुझे नफरत को
पानी नहीं पत्थर बनाना है
और प्रेम को बनाना है पानी


रोकना है हर हाल में प्रेम को
पत्थर बनने से


घृणा के पत्थर चुनने हैं
आबाद इलाके से और उन्हें बनाकर पहाड़
मनुष्यता के नितांत परित्यक्त क्षेत्र में कहीं
कैद कर देना है
पहाड़ी जड़ता के अभेद्य घेरे में
अगर रखना है दूर उन्हें
हवा में पत्थर उछालनेवाले घृणास्पद हाथों से
असंख्य माथे को फूटने से बचाना है अगर
बचाना है मनुष्यता को पत्थर से


इसलिए पानी बनाना है प्रेम को
बहाना है उसे दसों दिशाओं में मुझे


पानी में बहाना है
मुर्दा शांति से बुना सफेद बर्फ का मोटी कफन
पानी से तोड़ना है वह पहाड़
अन्यथा वह
धरती की छाती पर खड़ा रहेगा
गड़ा रहेगा
शूल बनकर सदियों- सहस्राब्दियों तक
मनुष्यता के परित्यक्त क्षेत्र में


इसलिए प्रेम को पानी बनाना
समय की जरुरत है
फिलहाल पानी का मतलब तबीयत है


दिलीप दर्श
मूल निवास : बलिया, प्रखंड – रूपौली, जिला – पूर्णिया, बिहार.