शुक्रवार, 6 सितंबर 2019

जब पत्ता गिरता है

कोई पत्ता 


अगर धीरे से भी गिरे
तो
पूरे घर को
जड़ तक हिला देता है


पेड़ तो खड़ा है
पहले जैसा
पर
आंधियों का रुख
बता देता है


उसकी चुप्पी की गूंज
भोर की
फुर्तीली किरण से चलकर
दरवाजे पर पड़े
अखबार में
साफ सुनाई देती है


उसका गिरना
गेंहू बनने की प्रक्रिया पर
विराम जैसा है


उसका धूल से मिलना
घरों की खिड़कियों और
दरवाजों का बंद होना है
इतना हीं नहीं
बच्चों के बचपना का
मंद होना है


लेकिन
गिरना तो है,
चाहे जितना यत्न करो
वो गिरेगा जरूर
शायद
मेरे आँगन में
तुलसी का पौधा बनकर
या मेरे खेत में
बबूल का पेड़ बनकर।।


श्वेतांक कुमार सिंह
बलिया/कोलकाता