बुधवार, 4 सितंबर 2019

उसे मेरी याद तो आती होगी

उसे मेरी याद तो आती होगी
जब चाँद की आग़ोश में सूरज छुप जाता होगा
नदी की घाट से हर शख्स़ घर को लौट जाता होगा
रेत पर लिखा हर नाम, मिट जाता होगा
उसकी परछाई भी लम्बी हो जाती होगी
हर रोज छत पर शाम जो आती होगी
उसे मेरी याद तो आती होगी॥


झट–पट गुस्से में उसकी भौवें, तन जाती थी
पल एक पल में ही वो रूठ जाती
अगले पल ही जोरो की ठहाके लगाती थी
सुबह उठ फोन पर हाथ जो लगाती होगी
कुछ सोच, उसकी आँखे भर तो जाती होंगी
उसे मेरी याद तो आती होगी ॥


झुक जाती थी नज़रें उसकी, जो मैं प्यार से देखा करता था
ख़ुश हो लिपट जाती, जब कुछ लिखकर उसको पढ़ता था
तुम बहुत बेहतरीन लिखते हो, हमेशा लिखते रहा करो ,
वो ऐसा हर बार कह जाती थी
मुझे पढ़ने की चाहत में, मुझे सुनने की आहट में
आज भी नींद भरी रातों में जग तो जाती होगी
उसे मेरी याद तो आती होगी ॥


चौराहों पर अक्सर मैं रास्ता भटक जाया करता था
या फिर जान-बूझकर पूछा करता –
ये हम कहा आ-गये, किधर जाएगा ये रास्ता ?
क्योंकि उस शहर से मेरा कम ही था वास्ता
वो प्यार से मुझे हर रास्ता बताती
कभी हाँथ पकड़, संकरी गलियों में घुमाती थी
हर छोटी–बड़ी चीज़ को कुछ ऐसे बताती,
मानो पूरा शहर उसमें ही बसा हो


मैं मन्नत-ए-आरज़ू उसके दर पर जाता था
वो एक रहनुमा जैसी सब कुछ बता जाती थी
आज भी जब वो उन चौराहों से गुज़रती होगी
सर-सरी हवाएं, उसे छूकर तो जाती होंगी
उसे मेरी याद तो आती होगी ॥


सुचित कुमार यादव,


दिल्ली विश्वविद्यालय में पीएचडी स्कॉलर है


और हिन्दू कॉलेज में राजनीतिक विज्ञान पढ़ाते हैं ॥