मंगलवार, 24 सितंबर 2019

आशादीप

सपनो का टूट जाना
टूट कर बिखर जाना
जैसे गहरी खाई में गिरते जाना
अचानक ही धुंधलका छा जाना


नयन अश्रु भी कुछ पल के
फिर भी पा लेने की चाहत
गहन अंधकार में भी
जुगनुओं की जगमग


आशाओं के दीप
हवाओं के झोंकों से
जलते-बूझते,टिमटिमाते
कुछ पल का अंधकार


दूर गगन में
बादलों की ओट से
बाहर आने को आतुर
चाँद-तारे


नहीं छूपते आशादीप
बार-बार बादलों के छा जाने पर
या फिर
धरती पर छाई धुंध के पहरे पर


डॉ प्रदीप उपाध्याय,


उपाध्याय नगर,मेंढकी रोड़,देवास,म.प्र.