रविवार, 27 अक्तूबर 2019

चुनावाँ की टेम में

चुनावाँ की टेम मै भोत मजा आवीं हीं ।
ओ मजो बै दूर बैठ्या ई उठावीं हैं ।
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जद बेरो पड़ै कै
बसुन्दरा आरी है ।
तो,
भक्तां कै पाँख लाग्यावीं हीं ।
पूरो जोर सोर, खुमारी बै,
रेली मै उतारी हीं ।
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अयाँ'ई
जद बेरो पड़ै कै
गैलोत की रेली है ।
तो
लोग उफणना चालू हो ज्यावैं हीं ।
चाल ढाल सारी बदल ज्यावीं हीं ।
कइयां कै मन मै कुलबुलाट जागै,
तो
कई सारा फुफ्कारै लाग ज्यावीं हीं ।
कई सोच बिचार करै,
तो
कई उठावापटक ।
ई जोस जोस् माईं करै बै,
देखण हाला नाटक ।
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समजण हालां दूर बैठ्या,
बैठ्या ईं नीगा मारीं हीं ।
कदै आतां न देखीं
कदै जातां न देखीं
ई टेम को पूरो मजो,
बैठ्या बैठ्या ईं उठावीं हीं ।
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कांगरेस की रेली मै जाणै सै,
लोग खींहि
ओ कांगरेसी है ।
अर
भाजपा की रेली मै जाणै सै
खै कै
ओ भाजपा को है ।
पण
मैनै तो
न्यू लागै है कै,
घणकरां कै
दोन्यू कान्या'ईं हात मारीं हीं ।
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ई फड़फड़ाहट मै बाकै,
पाव आदपा हात आ ज्यावै है ।
जकी को तेल चोपड़ बणाय बै,
पूरी पाँच साल निकाली हीं ।
चुनावाँ को पुरो मजो बै दूर बैठ्या ई उठावै हीं
बै दूर बैठ्या ई उठावीं हीं ।
दूर बैठ्या ईं उठावीं हीं ।
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-कैलाश चन्द्र 'माही'
प्राध्यापक-उदयपुर

दिवाली

चंपक वन की शान निराली
देखो आई है दीवाली
भालू  ने की है खूब सफाई
खरगोश भी लाए आज मिठाईबंदर  ने जलाए दीप
कोयल सुनाए मीठे गीत
हाथी बोला सब आ जाओ
नाचो-गाओ मौज मनाओ
वनराज ने भी सबको गले लगाया
जंगल में मंगल छाया ,
सबका मन हरषाया

  कवियत्री निभा कुमारी 


      राजनगर , मधुबनी , बिहार 

मंगलवार, 15 अक्तूबर 2019

दोहे

  

  जीवन भर नर्तन किया, फिर ली आंखें मूँद ।

   गर्म तवे पर नाचती, ज्यों छन-छन-छन बूँद ।।

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'अंकुर'! मन के कुम्भ में, डाल प्रेम का इत्र ।

 पीकर  महके मित्र बन, सारे शत्रु विचित्र ।।

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रंच नहीं कटुता कहीं ,ऐसा हो संसार  ।

 तब भव - सागर पार हो, तेरा-मेरा प्यार  ।।

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आप सभी से पूछिए, मिलकर उनका क्षेम ।

जन गण मन में 'आपके', प्रति बस जाए प्रेम  ।

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काम-क्रोध-मद-लोभ ही, है जिसका आधार।

कभी नहीं मिलता उसे, रघुनन्दन का  प्यार।।

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पछताएं मत आप अब, करें हाथ से सैर ।

 वक़्त भागता जा रहा , सर पर रखकर पैर।।

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चुहिया भी निकली नहीं, खोदे खूब पहाड़।

ताड़ प्रश्न; हल तिल नहीं, तिल बन बैठा  ताड़।

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तन पर तम छा जाय पर, बुझे न मन का दीप।

मन है मोती प्रेम का, तन है उसका सीप।।

गुरुवार, 10 अक्तूबर 2019

अभी तो कुतरे गए हैं पंख

तबाही दूर नहीं, सोने की चिड़िया की
अभी तो कुतरे गए हैं पंख,
आने वाले वक्त में,
खत्म हो जाएंगे जंगल,
दूषित हो जाएंगी नदियां,
फटने लगेंगे कान के पर्दे,
पर आधुनिक मानव,अभी सुविधाएं चाहता है।


भारत, अब भी विकासशील है
सम्भवतः पचास साल बाद भी रहेगा
विकास की 'रेस' में,दौड़ रहा निरन्तर
प्रकृति के दोहन में,जरा पीछे नहीं हटेगा।


खत्म कर दिए जाते हैं,जंगल के जंगल
यहां विकास के नाम पर,
फिर बिछा दी जातीं है सड़कें और पटरियां,
निर्मित होती जा रहीं गगनचुंबी इमारतें।


लोग नहीं करते परवाह जंगलों की,
पर वे जमीन से खत्म होकर
उग आते हैं उनके अपने भीतर,
जिन्हें काट पाने का सामर्थ्य
नहीं जुटा पाते वे अंत तक।


सड़कों पर सरपट दौड़ती गाड़ियां
रोज़ उगलती हैं विषैला जहर,
जो धीरे धीरे घुलता शरीर में
और विकास से पहले ही, आ जाती है मौत।


शायद अर्थ से ही 'अर्थ' का विनाश हो रहा
क्या यहीं रुकेगी ये विनाशलीला,
या ला पटकेगीे हमे उस खण्डहर में,
जहां भावनाएँ दीवारों से कुरेदनी पड़ेगी...!


बिटिया सयानी हो गई

बिटिया सयानी हो गई,

मां के बराबर हो गई है।

खोज कर अच्छा सा रिश्ता,

हाथ पीले कर दो इसके।


हो गया अब क्या होगा पढ़ के,

जाए अब वो घर बसाए।

देखे अपना घर बार अब वो,

समझे थोड़ी दुनिया दारी।


अब बात ऐसी हो रही है,

रिश्तेदारों की मीटिंग में।

बिटिया बेचारी शांत होकर,

पर्दे के पीछे से सुन रही है।


सुन के ये सब सोचती है,

देखती है एक बार खुद को।

क्या अब बदल गया है ऐसा,

क्या परिवर्तन नया हुआ है।


थी अभी तक आजाद जो वो,

कॉलेज के सपने थी सजाए।

सोचती थी जीत लेगी,

दुनिया की सारी मंजिलों को।


पर क्या पता था ,जल्द ही

पैरों में होंगी बेड़ियां।

करना होगा चौका - बर्तन,

घेर लेंगी मजबूरियां।


सुन कर सबकी बात सारी,

सपने तैर गए आंखों में।

देख कर के भविष्य अपना,

मूंद ली उसने भी आंखें।


देख कर के भविष्य अपना

मूंद ली उसने भी आंखें।


हैप्पी इंडिपेंडेन्स डे

कपड़े मैले कुचले
पाँव नंगे
चेहरा धूल से सना
और आग-सी चिलचिलाती धूप,
हाथ में प्लास्टिक के
तिरंगों का गुच्छा लिए
शहर की सबसे तंग
रेड लाइट पर,
सस्ती-महंगी सभी गाड़ियों की
शीशें पीटतीं
वो गूंगी लड़की।
नज़र तक न फेरते
कारों वाले,
कभी इन्तजार कर
तो कभी दुत्कारने पर
आगे बढ़ जाते उसके पैर।


रेड लाइट पर टाइम काटने को
कोई कभी पूछ डालता-
''कैसे दिए?''
दाहिने हाथ की पाँचों उँगलियाँ खोलकर
वह बताती-
''दस के दो ''
ये सोचकर कि वो झंडे लेगा
वो रुक जाती
पर लाइट होते ही वो निकल पड़ता।


गाड़ी के साथ कुछ दूर
भागकर पैसे लेने पड़ते
तो कभी दौड़कर पैसा पकड़ाना पड़ता
कई बार तो पैसे भी ना मिल पाते,
हॉर्न बजातीं कारें-बाइकें
बड़ी-बड़ी गाड़ियाँ
बड़ी तेज़ी-से
उसके दाएँ-बाएँ से गुजरतीं,
तो कुछ उसे
गरियाते हुए निकल जाते-
''अरे मरेगी क्या?''
उस बीच से निकलने की
उसकी वो जद्दोजहद
और उसका जीवन से ये
निर्मोह संघर्ष देख
सिर झन्ना जाता
और हृदय सहम जाता,
कभी किनारे पहुँचने से पहले
तो कभी पहुँचते ही
रेड लाइट हो जाती,
और वह पुनः लौट पड़ती
शीशें पीटने।
एक बड़ी-सी कार आकर रुकी
शीशा सरका
"फ्लैग्स लेना है बेटा?''
चलो दीदी को हैप्पी इंडिपेंडेंस डे बोल दो-
''हैप्पी इंडिपेंडेंस डे दी ''


अपनी ही उम्र की वो लड़की
और उसकी वो बात,
उसका वो दूध-सा सफेद चेहरा
उसके रंग-बिरंगे नए-नए
सुंदर कपड़े,
उसको लगातार दुलारती
उसकी वो 'मॉम ',
और न जाने क्या-क्या,
एक दम से सब
उसकी नजरों के सामने घूम जातीं,
जिसकी माँ ने तीन झंडे लिए थे
और वो भी दस में,
उसकी धड़कनें बढ़ने लगतीं
और पसीने की एक धार
उसकी कनपट्टी से निकल पड़ती,
और अचानक हॉर्न की तेज़ आवाज़
उसे एक झटके में जगा देती
दिन के इस भयानक स्वप्न से।


आँखें मींचते
और पसीने से तर
सड़क के डिवाइडर से उठकर
और इधर-उधर नजरें दौड़ा,
वह पुनः निकल पड़ती
आज़ादी मनाने।


भूपेंद्र


( शोधार्थी,(पीएच-डी) दिल्ली विश्वविद्यालय)

शुक्रवार, 4 अक्तूबर 2019

पुलवामा

क्या होगा भयानक दृश्य वहां
वीरों ने गवाये प्राण जहां
कतरा कतरा था खून गिरा
थम गया समय ही पल में वहां


चल रहे लोग चलतीं गाड़ी
हुआ रक्त तेज रुक गयीं नाड़ी
झकझोर दिया इस हमले ने
देखें रस्ता घर माँ ठाढ़ी


थी उम्र अभी बचपने की
कुरबानी दे दी सपनों की
वो गया देश रक्षा हित में
आ बाहों में लेटा अपनों की


एक पिता की लाठी टूट गयी
एक माँ ठाढ़ी जो रुठ गयी
बहना की डोली उठने से पहले
उसकी जिंदगी थी छूट गयी


पत्नी अब तक है सदमे में
बच्चे बिलखें सब अपने में
भयभीत कलम मेरी लिखने को
जैसे हुआ है ये सब सपने में


पवन कुमार,
(दिल्ली विश्वविद्यालय के छात्र हैं)

बुधवार, 2 अक्तूबर 2019

गांधी जयंती विशेष

महात्मा गांधी सत्य और अहिंसा के पुजारी माने जाते है जिन्होंने सत्य और अहिंसा का पाठ पढ़ा कर हमें गुलामी जैसी बेड़ियों को तोड़कर बाहर निकलना सिखाया है। गांधी जी का जन्म 2 अक्टूबर 1869 ई में गुजरात के पोरबंदर में हुआ था और आज हम 2 अक्टूबर को गांधी जयंती के रूप में मनाते हैं। गांधी जयंती का मतलब सिर्फ गांधी जी की फोटो पर फूलों के हार चढ़ाना नहीं है ना ही उन पर बड़े-बड़े भाषण देना और न ही कविताएं बोलना है गांधी जयंती का महत्व तब ही सार्थक माना जा सकता है।जब हम गांधी जी की शिक्षाओं को विचारों को अपने जीवन में अपनाएं।
गांधी जी कहते थे,
"अगर आप दुनिया को सुधारना चाहते हो तो आज से ही खुद को सुधारना शुरू कर दे"


गांधी जी के इन विचारों का यही अर्थ है कि पहले हमें खुद को सुधारना होगा,खुद में एक बदलाव लेकर आना होगा तो ही हम समाज को सुधार सकते हैं,समाज को बदल सकते है  क्योंकि जो इंसान खुद को सुधार सकता है वही समाज को सुधार सकता है समाज में बदलाव ला सकता है। गांधी जी कहते थे,
"आदमी अक्सर वो बन जाता है जो वो होने में यकीन करता है. अगर मैं खुद से यह कहता रहूँ कि मैं फ़लां चीज नहीं कर सकता, तो यह संभव है कि मैं शायद सचमुच वो करने में असमर्थ हो जाऊं. इसके विपरीत, अगर मैं यह यकीन करूँ कि मैं ये कर सकता हूँ, तो मैं निश्चित रूप से उसे करने की क्षमता पा लूँगा, भले ही शुरू में मेरे पास वो क्षमता ना रही हो।"


  गांधीजी धर्म को व्यक्तित्व के विकास के लिए आवश्यक समझते थे परंतु धार्मिक आडंबर और कट्‌टरता से दूर रहते थे। परंतु आज हम उनकी शिक्षाओं पर ना चल कर धर्म के नाम पर आपस में लड़ मर रहे हैं धर्म के नाम पर नेता वोट मांग रहे हैं और हम वोट दे रहें हैं। गांधी जी कहते थे,
" मैं उसे धार्मिक कहता हूँ जो दूसरों का दर्द समझता है।"


गांधीजी को सत्य व अहिंसा का पुजारी कहा जाता है उन्होंने केवल भारत के लोगों को ही नहीं विश्व के समस्त लोगों को सत्य व अहिंसा का पालन करने का संदेश दिया हैं। उन्होंने भारत देश को जो सदियों से गुलाम था कभी मुगलों का कभी अंग्रेजों का उसको सत्य व अहिंसा के द्वारा ही स्वतंत्र करवाया। वह कहते थे,
"मेरा धर्म सत्य और अहिंसा पर आधारित है. सत्य मेरा भगवान है. अहिंसा उसे पाने का साधन।"
हमें भी गांधीजी के सत्य और अहिंसा को अपनाना होगा तभी हम जीवन में आगे बढ़ सकते हैं क्योंकि जो इंसान सत्य नहीं बोल सकता वह सत्य के लिए जी भी नहीं सकता। गांधी जी ने अहिंसा को मानव तक ही सीमित नहीं रखा उन्होंने जानवरों के प्रति होने वाली अहिंसा का भी विरोध किया। गांधी जी कहते थे,
"एक देश की महानता और नैतिक प्रगति को इस बात से आँका जा सकता है कि वहां जानवरों से कैसे व्यवहार किया जाता है।"इसके अलावा गांधी जी ने बहुत सारी शिक्षाएं दी है जैसे:-समय का महत्व,समानता में विश्वास,पाप से घृणा करो,पापी से प्रेम करो,अपनी कमजोरियों की स्वीकारोक्ति,औरों की सेवा, प्रेम की शक्ति,अदम्य इच्छा शक्ति,औरत के प्रति अन्याय का विरोध,जीवन में कर्म का महत्व, जीवो की प्रति दयालुता इत्यादि। गांधी जी कहते थे,


"आप मुझे जंजीरों में जकड़ सकते हैं, यातना दे सकते हैं, यहाँ तक की आप इस शरीर को नष्ट कर सकते हैं, लेकिन आप कभी मेरे विचारों को कैद नहीं कर सकते"


अंत में अपनी कलम को विराम देते हुए यही कहूंगा कि वास्तव में हमें गांधी जयंती मनानी है तो इसका सही ढंग यही है कि हम गांधी जी की शिक्षाओं और विचारों को अपने जीवन में अपनाएं जिससे हम अपने साथ-साथ समाज में भी एक नया बदलाव लेकर सकें।


     राजीव डोगरा,कांगड़ा हिमाचल प्रदेश (युवा कवि लेखक)


(भाषा अध्यापक)
गवर्नमेंट हाई स्कूल,ठाकुरद्वारा।

सत्य और अहिंसा के पुजारी राष्ट्रपिता महात्मा गांधी

      देश के स्वतंत्रता संग्राम और आजादी के लिए अपने प्राणों की आहुति देने वाले राष्ट्रपिता  महात्मा गांधी की पुण्यतिथि को पूरे देश में शहीद दिवस के रूप में मनाया जाता है । वर्ष 1948  में महात्मा गांधी की नाथूराम गोडसे ने गोली मारकर हत्या कर दी थी,और उनकी हत्या ने पूरे देश को हिला कर रख दिया था । इस दिन महात्मा गांधी की समाधि स्थल राजघाट पर राष्ट्रपति, उपराष्ट्रपति, प्रधानमंत्री ,रक्षा मंत्री राष्ट्रपिता महात्मा गांधी को अपने कर कमलों से श्रद्धा सुमन अर्पित करते हैं। महात्मा गांधी की याद में पूरे देश में सभाएं आयोजित की जाती है।



एक कार्यक्रम के दौरान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने सभी जनसाधारण से अपील की है ,कि महात्मा गांधी की पुण्यतिथि के अवसर पर 2 मिनट का मौन अवश्य धारण करें । गांधी जी ने देश को आजाद कराने के लिए सत्याग्रह का रास्ता अपनाया, वे सदैव अहिंसा में विश्वास रखते थे, अपने जीवन काल के दौरान उन्होंने जनसाधारण को इसी का पाठ पढ़ाया । अफ्रीका से वापस आकर गांधीजी ने स्वयं को स्वतंत्रता संग्राम के आंदोलन में झोंक दिया। 1915 के बाद महात्मा गांधी ने अंग्रेजो के खिलाफ एक के बाद एक आंदोलन आरंभ किए, 1920 में असहयोग आंदोलन चलाया, फिर 1930 में नमक के अत्याचारी कानून को तोड़ने के लिए आंदोलन किया ,दलितों के पक्ष में बढ़-चढ़कर भाग लिया,  उसके बाद 1942 में भारत छोड़ो आंदोलन चलाया, आखिर उनके अनथक प्रयत्नों के आगे अंग्रेजों को अपनी हार माननी ही पड़ी और 15 अगस्त 1947 को भारत अंग्रेजों की बेड़ियों से आजाद हो गया। महात्मा गांधी जी ने जिस रास्ते पर चलकर भारत को  आजाद कराया ,वह रास्ता सत्य और अहिंसा पर आधारित था। उनका प्रयोग हमारे जीवन के कई पडावों में अत्यधिक मददगार साबित होता है। उन्होंने सदैव अच्छा व्यवहार करने, सच बोलने की सीख और जरूरतमंद लोगों की सहायता करने की शिक्षा दी।


महात्मा गांधी जी सत्य को ही भगवान मानते थे । वह जाति, धर्म, लिंग के आधार पर किए जाने वाली भेदभाव के सदैव खिलाफ थे ।महात्मा गांधी सत्य और अहिंसा को ही मानवता का सबसे कीमती उपहार मानते है अगर हम महात्मा गांधी के अनथक प्रयासों को सार्थक करना चाहते हैं और भारत को  उन्नति और समृद्धि की  राहों  की ओर ले जाना चाहते हैं ,तो हमें उनकी सीख पर चलना होगा ,तभी हम एक उज्जवल भारत के सपने को पूर्णता पूरा कर सकते हैं और समाज में व्याप्त बुराइयों का मुकाबला डट कर कर सकते हैं।


अमित डोगरा

(पी एच.डी, गुरु नानक देव विश्वविद्यालय अमृतसर)

स्वीकार है मुझे

मुझे स्वीकार है
हां हां मैं दलित हूं
स्वीकार है मुझे, कि मैं
निम्न जाति का पाप हूं
गर्भ में तो, मैं भी पला हूं
फिर क्यों किसी का अभिशाप हूं
मुझे स्वीकार है, मेरा नीच होना
गन्दगी में जीना दूसरो का मलवा ढोना
हां हां मैं दलित हूं
अपने कर्मो से अपने धर्मों से
तुम बड़े हो ,मुझसे नही मेरी नियति से बड़े
मैं पाप हूं अभिशाप हूं ,
अपनी माँ के गर्भ का अभिशाप
मेरी पीड़ा सहनीय है,
क्योंकि में सहना जानता हूं
तुम्हारी गालियों और अत्याचारों को पहचानता हूं
जीता हूं उन गंदी बस्तियों में आज भी
जूठन खाता हूं, तुम्हारी मैं आज भी,
बस करो ये अत्याचार हमपर ,
मुझे स्वीकार है
हां हां मुझे स्वीकार है
मेरा दलित होना
मुझे स्वीकार है ।


नाम – लक्ष्मी (पीएचडी हिंदी jnu)