गुरुवार, 10 अक्तूबर 2019

बिटिया सयानी हो गई

बिटिया सयानी हो गई,

मां के बराबर हो गई है।

खोज कर अच्छा सा रिश्ता,

हाथ पीले कर दो इसके।


हो गया अब क्या होगा पढ़ के,

जाए अब वो घर बसाए।

देखे अपना घर बार अब वो,

समझे थोड़ी दुनिया दारी।


अब बात ऐसी हो रही है,

रिश्तेदारों की मीटिंग में।

बिटिया बेचारी शांत होकर,

पर्दे के पीछे से सुन रही है।


सुन के ये सब सोचती है,

देखती है एक बार खुद को।

क्या अब बदल गया है ऐसा,

क्या परिवर्तन नया हुआ है।


थी अभी तक आजाद जो वो,

कॉलेज के सपने थी सजाए।

सोचती थी जीत लेगी,

दुनिया की सारी मंजिलों को।


पर क्या पता था ,जल्द ही

पैरों में होंगी बेड़ियां।

करना होगा चौका - बर्तन,

घेर लेंगी मजबूरियां।


सुन कर सबकी बात सारी,

सपने तैर गए आंखों में।

देख कर के भविष्य अपना,

मूंद ली उसने भी आंखें।


देख कर के भविष्य अपना

मूंद ली उसने भी आंखें।



                 नीलेश मणि त्रिपाठी

              बी. ए. विशेष ( हिन्दी)

           शहीद भगत सिंह महाविद्यालय

               दिल्ली विश्वविद्यालय