रविवार, 8 दिसंबर 2019

दबी आवाज़ें


मज़दूरों के हथौड़ी 




ठोंकने की आवाज़,

सब्जीवाले की 

दाम चीख़ती आवाज़,

विश्वविद्यालयों की

गूँजती बेक़रार आवाज़,

सुबह-सुबह अज़ान और 

मुकद्दस भजनों की आवाज़,

बस्तियों में ढील हेरती 

युवतियों की आवाज़,

सड़कों पर कोलतार बिछाते 

रोडरोलर की आवाज़,

पोखरों में नंगे नहाते 

बच्चों की आवाज़,

खेत को मथते 

ट्रैक्टरों की आवाज़,

झुंड में घूमते कुत्तों के 

भौंकने की आवाज़,

ट्रॉली में ईंट ढोते

लेबरों की आवाज़,

साक़ी और बदमस्त 

शराबियों की आवाज़,

स्कूलों की छुट्टी करतीं

घण्टियों की आवाज़,

ट्रेन में नल्ली बेचते

छोटे बच्चे की आवाज़,

चाँद को निहारते

दो उश्शाक़ों की आवाज़,

खेल दिखाते

मदारी की आवाज़,

क़ज़ा पर

राम-नाम-सत्य की आवाज़,

मसाईबों से 

शिकस्त खाने की आवाज़,

लाख और कांच से बनी

चूड़ियों की आवाज़,

आईसक्रीम-गोलगप्पे बेचते

अंकल की आवाज़,

मुख़ालिफ़त करती

आमादा अफ़राद की आवाज़,

हक़-हुक़ूक़ औ' 

जज़्बात की आवाज़,


दब जाती है

उस निज़ाम की आवाज़ के आगे

जो शबाब पर है

और मसल देना चाहती है

हर उस आवाज़ को 

जो उसका फ़ैज़ नहीं करतीं!


आयुष चतुर्वेदी

  छात्र (कक्षा 11)

   वाराणसी






मंगलवार, 3 दिसंबर 2019

बदल चुका हूं

आज मैं, वो नही


जो पहले था
मैं बदल चुका हूं
..........
पहले था सीधा साधा,
नेकदिल, विश्वासी, संजिदगी भरा
पर आज
कितना बदल चुका हूँ ।
माया के जंजीरों से जकड़ चुका हुँ ।
देखता मौका हूँ,
जब मिलता,मार लेता हूँ ।
आज
छिप गया है पाप मुझमे,
मानसिक विकार मुझमे,
पैसे का प्यार मुझें,
ठगने का अधिकार मुझमे,
दुश्मनी का वार मुझमे,
यारो का खुद्दार मुझमे,
नाते रिश्ते यार दोस्त में,
स्वार्थ का जहनूम मुझमें
देखो तो
कितना बदल चुका हूँ ।
था करता आदर बड़ों का
लोक लाज थी तन में
भावों का सम्मान करना,
रुचता था इस मन में
झुक जाना नारी के सम्मान में
अपनो के प्यार में,यारों के दीदार में,
कितना मुझको भाता था
पर आज
कितना बदल चुका हूँ ।
चूकता ना मौका मैं
नार से खिलवार का,
सरोबार का,व्यापार का,
ताश के पत्तो जैसे
लाश का, सर्वनाश का
देखो तो सही,
रहम मेरा मर गया है,
इस जाहिल संसार में,
शेष कुछ भी न बचा है
इस कोठे-से मकान में,
मैं कितना बदल गया हूँ ।
मैं मर -सा गया हूँ ।


कैलाश चंद्र 'माही'
उत्तरासर-झुंझुनूं

सोमवार, 2 दिसंबर 2019

दोहरा चरित्र

तुम कहते हो महिला की

कोई जाति नहीं होती। 

फिर शोषण की कैसे

अपनी जाति हो सकती है।


तुम कहते हो आज के

दौर में कहाँ है जातिवाद 

फिर क्यों हमें पायल तडवी

की तरह मौत दे देते हो 


तुम ना जानो दर्द हमारा,

आकर देखो फिर बोलो

तुम्हे बस आता है

हम पर व्यंग्य करना


तुम क्या जानो समस्या हमारी

पितृसत्ता जातिवाद, निरक्षरता, तंगहाली, पूर्वाग्रह 

इतनी छोटी कहां है मेरी आजादी कि

तुम्हें और तुम्हारे जैसों को पूरी जगह ना हो”

 

मेरा तो बस इतना है मानना

दलित स्त्रियों के चिंतन और संघर्ष कठिन हैं

पर वह लड़ रही है और लड़ती रहेगीं


टीना कर्मवीर सामाजिक कार्यकर्ता

,स्वतंत्र विश्लेषक, शोधार्थी