मंगलवार, 3 दिसंबर 2019

बदल चुका हूं

आज मैं, वो नही


जो पहले था
मैं बदल चुका हूं
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पहले था सीधा साधा,
नेकदिल, विश्वासी, संजिदगी भरा
पर आज
कितना बदल चुका हूँ ।
माया के जंजीरों से जकड़ चुका हुँ ।
देखता मौका हूँ,
जब मिलता,मार लेता हूँ ।
आज
छिप गया है पाप मुझमे,
मानसिक विकार मुझमे,
पैसे का प्यार मुझें,
ठगने का अधिकार मुझमे,
दुश्मनी का वार मुझमे,
यारो का खुद्दार मुझमे,
नाते रिश्ते यार दोस्त में,
स्वार्थ का जहनूम मुझमें
देखो तो
कितना बदल चुका हूँ ।
था करता आदर बड़ों का
लोक लाज थी तन में
भावों का सम्मान करना,
रुचता था इस मन में
झुक जाना नारी के सम्मान में
अपनो के प्यार में,यारों के दीदार में,
कितना मुझको भाता था
पर आज
कितना बदल चुका हूँ ।
चूकता ना मौका मैं
नार से खिलवार का,
सरोबार का,व्यापार का,
ताश के पत्तो जैसे
लाश का, सर्वनाश का
देखो तो सही,
रहम मेरा मर गया है,
इस जाहिल संसार में,
शेष कुछ भी न बचा है
इस कोठे-से मकान में,
मैं कितना बदल गया हूँ ।
मैं मर -सा गया हूँ ।


कैलाश चंद्र 'माही'
उत्तरासर-झुंझुनूं