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मंगलवार, 17 सितंबर 2019

गजल

1. गजल

ताल्लुक़ात की सूरत संभालकर रखना

कोई न कोई महूरत संभालकर रखना

हर इक से मांग के शर्मिंदगी न हो तुमको

तुम अपनी सारी ज़रूरत संभालकर रखना

खुदा के बंदों ने कितने खुदा बना डाले

तुम अपने दिलकी ये मूरत संभालकर रखना

ये कह दिया कि मैं तेरे ही काम आऊँगा

हमें बवक़्ते ज़रूरत सम्भाल कर रखना

तुम्हारे दोस्त तुम्हे धोखा देने वाले हैं

मेरी पुरानी अदावत संभाल कर रखना


2. ग़ज़ल


इश्क़ में जान गंवा देने का दिल मे इरादा होता था

चार आंखों में और तो कुछ नहीं सिर्फ भरोसा होता था


ख़्वाब देखने की सब मे इक बीमारी सी होती थी

आंखें कम सुन्दर होती थीं सुन्दर सपना होता था


बचपन से ही रिश्तों का मतलब समझाया जाता था

सोने की गुड़िया होती थी हीरे का गुड्डा होता था


खून के रिश्ते, दर्द के रिश्ते, प्रेम के रिश्ते होते थे

रिश्तों में रिश्ते होते थे ऐसा रिश्ता होता था


कल तक अपने गाँव मे सम्बन्धों की फसलें उगती थीं

भय्या भाभी, चाची चाचा, मौसी ताया, होता था


मिन्नत को अफसोस यही है  कहाँ  गए वो सारे लोग

जिनकी प्यारी बातों में हर रंग निराला होता था ।


3. ग़ज़ल


किसी के ख़ुश्क लबों की मैं प्यास हो जाऊं

अगर वो चुप रहे मैं भी उदास हो जाऊं

तुम्हारे दर्द सुनूँ और मैं रहूं खामोश

ज़रूरी है मैं तेरे आस पास हो जाऊं

मेरे क़रीब से मुँह फेर कर नहीं जाना

कहीं न ऐसा हो मैं बदहवास हो जाऊं

ग़रीब बच्चों की ख़ातिर मुझे वो दौलत दे

मैं इनकी रोटी जटाओं, लिबास हो जाऊं

वो नंगे पांव चले लान में कभी 'मिन्नत'

तो मैँ भी उसके लिए सब्ज़ घास हो जाऊं ।