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गुरुवार, 10 अक्तूबर 2019

अभी तो कुतरे गए हैं पंख

तबाही दूर नहीं, सोने की चिड़िया की
अभी तो कुतरे गए हैं पंख,
आने वाले वक्त में,
खत्म हो जाएंगे जंगल,
दूषित हो जाएंगी नदियां,
फटने लगेंगे कान के पर्दे,
पर आधुनिक मानव,अभी सुविधाएं चाहता है।


भारत, अब भी विकासशील है
सम्भवतः पचास साल बाद भी रहेगा
विकास की 'रेस' में,दौड़ रहा निरन्तर
प्रकृति के दोहन में,जरा पीछे नहीं हटेगा।


खत्म कर दिए जाते हैं,जंगल के जंगल
यहां विकास के नाम पर,
फिर बिछा दी जातीं है सड़कें और पटरियां,
निर्मित होती जा रहीं गगनचुंबी इमारतें।


लोग नहीं करते परवाह जंगलों की,
पर वे जमीन से खत्म होकर
उग आते हैं उनके अपने भीतर,
जिन्हें काट पाने का सामर्थ्य
नहीं जुटा पाते वे अंत तक।


सड़कों पर सरपट दौड़ती गाड़ियां
रोज़ उगलती हैं विषैला जहर,
जो धीरे धीरे घुलता शरीर में
और विकास से पहले ही, आ जाती है मौत।


शायद अर्थ से ही 'अर्थ' का विनाश हो रहा
क्या यहीं रुकेगी ये विनाशलीला,
या ला पटकेगीे हमे उस खण्डहर में,
जहां भावनाएँ दीवारों से कुरेदनी पड़ेगी...!


बिटिया सयानी हो गई

बिटिया सयानी हो गई,

मां के बराबर हो गई है।

खोज कर अच्छा सा रिश्ता,

हाथ पीले कर दो इसके।


हो गया अब क्या होगा पढ़ के,

जाए अब वो घर बसाए।

देखे अपना घर बार अब वो,

समझे थोड़ी दुनिया दारी।


अब बात ऐसी हो रही है,

रिश्तेदारों की मीटिंग में।

बिटिया बेचारी शांत होकर,

पर्दे के पीछे से सुन रही है।


सुन के ये सब सोचती है,

देखती है एक बार खुद को।

क्या अब बदल गया है ऐसा,

क्या परिवर्तन नया हुआ है।


थी अभी तक आजाद जो वो,

कॉलेज के सपने थी सजाए।

सोचती थी जीत लेगी,

दुनिया की सारी मंजिलों को।


पर क्या पता था ,जल्द ही

पैरों में होंगी बेड़ियां।

करना होगा चौका - बर्तन,

घेर लेंगी मजबूरियां।


सुन कर सबकी बात सारी,

सपने तैर गए आंखों में।

देख कर के भविष्य अपना,

मूंद ली उसने भी आंखें।


देख कर के भविष्य अपना

मूंद ली उसने भी आंखें।


हैप्पी इंडिपेंडेन्स डे

कपड़े मैले कुचले
पाँव नंगे
चेहरा धूल से सना
और आग-सी चिलचिलाती धूप,
हाथ में प्लास्टिक के
तिरंगों का गुच्छा लिए
शहर की सबसे तंग
रेड लाइट पर,
सस्ती-महंगी सभी गाड़ियों की
शीशें पीटतीं
वो गूंगी लड़की।
नज़र तक न फेरते
कारों वाले,
कभी इन्तजार कर
तो कभी दुत्कारने पर
आगे बढ़ जाते उसके पैर।


रेड लाइट पर टाइम काटने को
कोई कभी पूछ डालता-
''कैसे दिए?''
दाहिने हाथ की पाँचों उँगलियाँ खोलकर
वह बताती-
''दस के दो ''
ये सोचकर कि वो झंडे लेगा
वो रुक जाती
पर लाइट होते ही वो निकल पड़ता।


गाड़ी के साथ कुछ दूर
भागकर पैसे लेने पड़ते
तो कभी दौड़कर पैसा पकड़ाना पड़ता
कई बार तो पैसे भी ना मिल पाते,
हॉर्न बजातीं कारें-बाइकें
बड़ी-बड़ी गाड़ियाँ
बड़ी तेज़ी-से
उसके दाएँ-बाएँ से गुजरतीं,
तो कुछ उसे
गरियाते हुए निकल जाते-
''अरे मरेगी क्या?''
उस बीच से निकलने की
उसकी वो जद्दोजहद
और उसका जीवन से ये
निर्मोह संघर्ष देख
सिर झन्ना जाता
और हृदय सहम जाता,
कभी किनारे पहुँचने से पहले
तो कभी पहुँचते ही
रेड लाइट हो जाती,
और वह पुनः लौट पड़ती
शीशें पीटने।
एक बड़ी-सी कार आकर रुकी
शीशा सरका
"फ्लैग्स लेना है बेटा?''
चलो दीदी को हैप्पी इंडिपेंडेंस डे बोल दो-
''हैप्पी इंडिपेंडेंस डे दी ''


अपनी ही उम्र की वो लड़की
और उसकी वो बात,
उसका वो दूध-सा सफेद चेहरा
उसके रंग-बिरंगे नए-नए
सुंदर कपड़े,
उसको लगातार दुलारती
उसकी वो 'मॉम ',
और न जाने क्या-क्या,
एक दम से सब
उसकी नजरों के सामने घूम जातीं,
जिसकी माँ ने तीन झंडे लिए थे
और वो भी दस में,
उसकी धड़कनें बढ़ने लगतीं
और पसीने की एक धार
उसकी कनपट्टी से निकल पड़ती,
और अचानक हॉर्न की तेज़ आवाज़
उसे एक झटके में जगा देती
दिन के इस भयानक स्वप्न से।


आँखें मींचते
और पसीने से तर
सड़क के डिवाइडर से उठकर
और इधर-उधर नजरें दौड़ा,
वह पुनः निकल पड़ती
आज़ादी मनाने।


भूपेंद्र


( शोधार्थी,(पीएच-डी) दिल्ली विश्वविद्यालय)

बुधवार, 2 अक्तूबर 2019

स्वीकार है मुझे

मुझे स्वीकार है
हां हां मैं दलित हूं
स्वीकार है मुझे, कि मैं
निम्न जाति का पाप हूं
गर्भ में तो, मैं भी पला हूं
फिर क्यों किसी का अभिशाप हूं
मुझे स्वीकार है, मेरा नीच होना
गन्दगी में जीना दूसरो का मलवा ढोना
हां हां मैं दलित हूं
अपने कर्मो से अपने धर्मों से
तुम बड़े हो ,मुझसे नही मेरी नियति से बड़े
मैं पाप हूं अभिशाप हूं ,
अपनी माँ के गर्भ का अभिशाप
मेरी पीड़ा सहनीय है,
क्योंकि में सहना जानता हूं
तुम्हारी गालियों और अत्याचारों को पहचानता हूं
जीता हूं उन गंदी बस्तियों में आज भी
जूठन खाता हूं, तुम्हारी मैं आज भी,
बस करो ये अत्याचार हमपर ,
मुझे स्वीकार है
हां हां मुझे स्वीकार है
मेरा दलित होना
मुझे स्वीकार है ।


नाम – लक्ष्मी (पीएचडी हिंदी jnu)

रविवार, 29 सितंबर 2019

गंधर्व विवाह


ऑनर किलिंग की शिकार पत्रकार निरूपमा पाठक को याद करते हुए



मुझे नहीं मालुम
तुम्हारी हत्या हुई
या
तुमने की
आत्महत्या
हां,
कह सकती हूं इतना
दोनों ही परिस्थितियों में
सिद्ध नहीं हुए, किसी
के प्रयोजन
हो सकता है
सोचा हो तुमने
गर, प्रेम से मेरे
झुक रहा शर्म से
मां-बाप का सिर
वे नहीं चाहते
अपनाना ‘प्रिय’ को
और तुम स्वयं
हो न सकी इतनी आधुनिक
जो रोज- रोज बदलो प्रेमी
तुमने तो माना,
प्रेम का प्रस्फुटन
होता है एक बार
मिलती है जन्नत
एक बार
समर्पित होता तन-मन
एक बार
और सोचा
पहुंचाकर प्रेम को
शादी के द्वार
कर लूं तन-मन का उद्धार
पर,मना न सकी
मानी पिता को;
जो नहीं जानते, क्या है मान
न तोड़ ही सकी
उनके अहंकार
या मनोविकार को

मिथ्याकांक्षा, कट्टरता
और कठोरता को
न सह सकी वे
धमकियां
जो मिली कई रूपों में
बरंबार
जब निकले पिता- भाई घर से
तब कांप उठा जिस्म तो
क्या आत्मा भी
कहीं कर न डालें वे मनमानी
और पहुंचा दें
‘प्रिय’ को
मौत के घर
तब बचाने को
प्रियतम को
दिखा वही इक रास्ता
जो बनता रहा है सदियों से
प्रेमियों का अंतिम हथियार
मिटा दूं स्वयं को
पर आई फिर रूकावट
उदर में पलता
प्रेम का अंश
मांग रहा था -
संसार में आने का अधिकार
दुविधा में पड़ी फिर तुम
द्वंद हुआ मन में
पिता -पुत्र में चुने किसे
कशमकश के बीच भी
तुमने चुना ‘ प्रिय ‘ को
और झूल गई फांसी पर
कौन जाने
तुम्हारे सामंतवादी पिता
अपने मान
में हो गए अंधे
होनहार पुत्री की अपेक्षा
भा रहा हो दंभ
और
रचा फिर
स्नेहपगे
भाई और जनक ने
तुम्हारे
लिए ष्डयंत्र
नहीं जानती तुम
रहा सब
उसी का हिस्सा
बाहर होने के
छदम आवरण
के भीतर
घुसे वे घर में
उन्हीं कलाइयों वाले हाथों ने
जिनपर बांधा करती थी
तुम राखी
और उसी पिता ने
करती रही जिसपर
गर्व और भरोसा अब तक
और उस मां ने
जिस पर तुमने
भी लुटाया स्नेह
और बनाया राजदार
बलि लेली तुम्हारी
पर निरूपमा
बताओ न
क्या सिद्ध हुए
उनके प्रयोजन?
क्या
अब लेंगी जनम नहीं
दूसरी निरूपमा?
वे तो रहे तुमसे भी
नादान
अब तो जान गई हैं
सारी
निरूपमा
पिता के मान ,
उनके दाव और चाल को
अब नहीं करेगी कोई
उनसे मनुहार
मांगेगी नहीं
विवाह के लिए
आशीर्वद
सब करेगी गंधर्व विवाह


...शेली खत्री

मंगलवार, 24 सितंबर 2019

मैं भी तो शहीद था

बारिशों के बाद जो

बीमारियों की घात हो

जंग का ऐलान तब

मेरी ख़ातिर हो चुका


मानकर आदेश को

मन में सोच देश को

ना ख़याल आज का

ना फ़िकर बाद का


सिर्फ़ एक लक्ष्य है

जो मुझे है भेदना

सीवर हो जहाँ रुका

वो मुझे है खोलना


बाल्टी, खपच्ची,रस्सी

ली उठा हाथ में

दो मेरे संगी भी

चल-चले थे साथ में


सुबह - सुबह की बात है

थोड़ी पर ये रात है

खोला ढक्कन जैसे ही

बदबू आई वैसे ही ।


कुछ नहीं था सूझता

कुछ नहीं था बूझता

बदन से कपड़े दूर कर

कमर में रस्सी बांधकर


सुरक्षा की ना बात है

ईश्वर का ही साथ है

आसपास मेरे सब

नाक-भौंह सिकोड़कर


साथ मे खड़े हैं सब

पास में ना कोई अब

मैं अकेला ही भला हूँ

जो भी हो देखेगा रब


काली-काली गंदगी

कितनों का ये मल है

और

कितनो की ये लेट्रिन


दुश्मन से लड़ना है अब

सोच छोड़ उतरना है अब

एक को पकड़ा के रस्सी

देह नरक की ओर बढ़ दी


गर्दन तक मल में  हूँ

आज हूँ बस कल ना हूँ

गैस अब चढ़ रहा है

सिर दर्द बढ़ रहा है ।


है अंधेरा ही अंधेरा

रोशनी की बात ना कर

जैसा अब ये हो रहा है

वैसा फिर ना साथ कर


बढ़ रहा हूँ,

चल रहा हूँ

कुछ नहीं सुनाई देता

कुछ नहीं दिखाई देता


मुहँ में मल घुस रहा है

नाक में भी ठुस रहा है ।

आँख तक भी आ रहा

साँस नहीं आ रहा है ।


चीखना मैं चाहता हूँ

रो नहीं भी पा रहा हूँ

डर रहा हूँ, डर रहा हूँ

मर रहा हूँ, मर गया हूँ।


देह मेरी को खोजते हैं

पर नहीं अभी पा रहा हूँ

मिल रहा हूँ, मिल गया हूँ

मल के साथ , बन मल गया हूँ।


नहीं कोई चर्चा हुई है

नहीं कोई बातें है करता

कैसे मरा, किसके लिए था

नहीं कोई ये पूछता ।



सोचता हूँ ?


स्वस्थ जीवन देने को ही

सीवर में मैं था उतरा

देश का सोचा था मैंने

देश का सम्मान था करता ।


न कहीं भी नाम आया

न कोई मुझे जानता

न कहीं गिनती है मेरी

न कोई सम्मान आया


न कोई मैडल मिलेगा

न अखबारों में छपूँगा

न मिलेगा मान मुझको

न स्वर्णाक्षरों में लिखूँगा ।


लड़ा मैं भी था

लड़ाई की थी मैंने भी

लड़ते-लड़ते ही मरा था

मैं भी जीत के करीब था

देश पर जो मर मिटा

मैं भी तो शहीद था ।।


दीपक मेवाती 'वाल्मीकि'

पी.एच.डी. शोध छात्र (IGNOU)

आशादीप

सपनो का टूट जाना
टूट कर बिखर जाना
जैसे गहरी खाई में गिरते जाना
अचानक ही धुंधलका छा जाना


नयन अश्रु भी कुछ पल के
फिर भी पा लेने की चाहत
गहन अंधकार में भी
जुगनुओं की जगमग


आशाओं के दीप
हवाओं के झोंकों से
जलते-बूझते,टिमटिमाते
कुछ पल का अंधकार


दूर गगन में
बादलों की ओट से
बाहर आने को आतुर
चाँद-तारे


नहीं छूपते आशादीप
बार-बार बादलों के छा जाने पर
या फिर
धरती पर छाई धुंध के पहरे पर


डॉ प्रदीप उपाध्याय,


उपाध्याय नगर,मेंढकी रोड़,देवास,म.प्र.

बारिश के दिनों में

बारिश के दिनों में
बारिश के दिन याद नहीं करता
बारिश की रातें याद करता हूँ मैं


उन्हीं रातों के भींगते अंधेरे में उगतीं थीं
मां की आंखें
अंधेरा चीरने की कोशिश में
कभी गुम हो जाती थीं
घर के अंदर उसी अंधेरे में
कभी बरसती नहीं थीं,
बस पसीजती थीं कभी-कभी
घर की कच्ची दीवार की तरह


घर दुबका रहता था
अंधेरे की भींगी -भारी चादर में
हम भाई - बहनें दुबके रहते थे
एक रस्सी खाट पर मां की सूती साड़ी में
और पिता उसपर डाल देते थे
अपनी एक पुरानी खद्दर धोती
कि हम बच्चों की देह में बची - बनी रहे गरमी
लेकिन हम बच्चे तब यह कहाँ समझते थे
कि धोती - साड़ी का सम्मिलित संघर्ष जरूरी है
दुनिया में गरमी बचाने के लिए


भींगते अंधेरे में
माँ जब बुझी हुई ढिबरी दुबारा बालती थी
हम बच्चे नहीं जानते थे कि
यह ढिबरी दरअसल वह
अपनी ही आंखों से निकालती थी
और पिता उसकी थरथराती रोशनी में
शिनाख्त करते थे - छप्पर कहाँ - कहाँ चूता था
और माँ को बताते थे कि
चूते हुए छप्पर के नीचे घर में
कौन-सा कोना सुरक्षित है ढिबरी के लिए
ताकि रोशनी में कम होती रहे रात की लंबाई


पिता ही बताते थे माँ को
कि कहाँ -कहाँ करने थे तैनात
घर के सारे खाली बरतन
घर की जमीन गीली होने से बचाने के लिए
घर के ठीक बीचोंबीच खड़ा
वह बूढ़ा खंभा क्यों चिढ़ता था
बरतन - बूँद की टन् - टन् जुगलबंदी पर
और वह क्यों सहमा रहता था
दीवार पर अपनी ही मोटी छाया हिलती देख
हम बच्चे यह कहां समझते थे तब ?


सिरहाने में बैठी मां,पैताने में बैठे पिता
उनके चेहरे से चूती हुई चिंता फिलहाल
ढिबरी में खत्म होते मिट्टी तेल को लेकर थी या
उस डूबते धान को लेकर जिसके सीस पर
टिके होते थे कल के सुख और सपने
हमें तब यह सब समझ में कहां आता था !


और जैसे - जैसे असुरक्षित होते जाते थे
घर में बाकी कोने एक - एक कर
ढिबरी और हम बच्चे सहित खाट की जगह
रात - भर बदलते ही रहते थे मां - पिता
ताकि ढिबरी बलती रहे
और वे हमें भींगते अंधेरे से बचा सकें
बचा सकें वे अपनी जिंदगी की कुल कमाई
आगे बारिश के दिनों में खरचने के लिए


अभी यहाँ
उन रातों को याद किए बिना मुश्किल है अभी की बारिश को कोई अर्थ देना
और बारिश को समझे बिना मुश्किल है
जिंदगी की जड़ें ढूँढना


इसलिए
बारिश की रातें याद करता हूँ मैं
बारिश के दिन याद नहीं करता
बारिश के दिनों में


दिलीप दर्श
मूल निवास : बलिया, प्रखंड – रूपौली, जिला – पूर्णिया, बिहार.

पानी और पत्थर

मुझे नफरत को
पानी नहीं पत्थर बनाना है
और प्रेम को बनाना है पानी


रोकना है हर हाल में प्रेम को
पत्थर बनने से


घृणा के पत्थर चुनने हैं
आबाद इलाके से और उन्हें बनाकर पहाड़
मनुष्यता के नितांत परित्यक्त क्षेत्र में कहीं
कैद कर देना है
पहाड़ी जड़ता के अभेद्य घेरे में
अगर रखना है दूर उन्हें
हवा में पत्थर उछालनेवाले घृणास्पद हाथों से
असंख्य माथे को फूटने से बचाना है अगर
बचाना है मनुष्यता को पत्थर से


इसलिए पानी बनाना है प्रेम को
बहाना है उसे दसों दिशाओं में मुझे


पानी में बहाना है
मुर्दा शांति से बुना सफेद बर्फ का मोटी कफन
पानी से तोड़ना है वह पहाड़
अन्यथा वह
धरती की छाती पर खड़ा रहेगा
गड़ा रहेगा
शूल बनकर सदियों- सहस्राब्दियों तक
मनुष्यता के परित्यक्त क्षेत्र में


इसलिए प्रेम को पानी बनाना
समय की जरुरत है
फिलहाल पानी का मतलब तबीयत है


दिलीप दर्श
मूल निवास : बलिया, प्रखंड – रूपौली, जिला – पूर्णिया, बिहार.

भीड़ से खारिज आदमी

भीड़ से खारिज आदमी भले ही हारा हुआ लगता है
कभी हारा हुआ नहीं होता
वह अकेला या बेसहारा हुआ लगता है
पर कभी अकेला या बेसहारा नहीं होता


भीड़ से खारिज आदमी का
सिर्फ और सिर्फ भूगोल ही होता है
कोई इतिहास नहीं होता
उसके पास नहीं होती कोई दूसरी संज्ञा
या एक भी विशेषण
अपने नाम के शुरु - आखिर में लगाने के लिए
कोई शीर्ष- पूंछ नहीं होते


क्योंकि शीर्ष - पूंछ मिलते हैं
सिर्फ इतिहास के संरक्षित अभयारण्य में
और वहाँ नाबाद हिलते हैं
किसी विजेता के फरमानी इशारों पर
भीड़ से खारिज आदमी पहले ही
खारिज कर चुका होता है ऐसे इशारों को
समय रहते इन्कार कर चुका होता है
शीर्ष और पूंछ के बीच हकलाती जिंदगी को


भीड़ से ख़ारिज आदमी
स्वीकार कर चुका होता है
शीर्ष- पूंछ विहीन अस्तित्व के अपने भूगोल को
वह पहचान चुका होता है
भीड़ में खड़े व्यवस्था के मदारी को
जान चुका होता है कि आज के दौर में
मदारी दरअसल एक संपेरा है
बजाता है नित नये सुरों में बीन दिन भर
बीन सांप के लिए है या भीड़ के लिए
यह एक बड़ा रहस्य है
और इस रहस्य को जिज्ञासा की खुजलाती धूप से बचाने के लिए
बीच बीच में वह नए-नए अंदाज़ में दिखाता है
सांपों का खतरनाक खेल
पैदा करता है डर का ऐसा मायावी बाजार
जहाँ सांप आभासी रूप में और बड़े दिखते हैं
और डर वास्तविक रूप में उनसे भी इतना बड़ा कि
शाम तक जिज्ञासा से ज्यादा जरूरी हो जाते हैं वे जंतर
जिन्हें बेचना हो जाता है तब बहुत आसान
और खरीदना भी बहुत ज़रूरी


भीड़ से खारिज आदमी जानता है
जंतर की असलियत
यह भी कि सांप दंतहीन है दरअसल
और डर एक झूठ है
सच यही है कि
भीड़ से जो बिल्कुल खारिज या अपदस्थ है
अपनी सोच में वही साफ है, वही स्वस्थ है

दाता बनकर तो देखो!

मैं जानता हूँ
उनके सामने
तुम याचक बनकर ही तो
रहते आये हो अब तक
तभी तो हर बार की तरह
इस बार भी
भूख/भय
गरीबी/लाचारी
बेरोजगारी
बेहाल शिक्षा/स्वास्थ्य/आवास
के विरुद्ध संघर्ष
और
भ्रष्टाचार मिटाने
हताशा दूर करने
और
विकास के नाम पर
न्याय दिलाने
वे आते हैं तुम्हारे पास
कभी पूरे न होने वाले
आश्वासन/
वायदें/
घोषणाएँ लेकर
जानते हैं कि
तुम याचक हो
और
तुम्हें भूलने की आदत है
और वे दाता
तुमने ही तो बनाया है उन्हें
कभी तुम भी
अपनी
बेचारगी को छोड़कर
अपनी
क्षमता को पहचानकर
भूमिका बदलकर तो देखो
वे याचक बनकर आते हैं
और
याचक ही बने रहें
एक बार
तुम स्वयं
दाता बनकर देखो।

गुरुवार, 19 सितंबर 2019

कुपोषण

कुपोषण है शत्रु बड़ा बलवान
इसे मिलकर भगाना है
चलिए अब हम सबको
जागरूकता का अलख जगाना है


जागरूकता ऐसी की बच्चे हो
स्वस्थ सेहतमंद
न कम हो ऊँचाई और
न कम हो वजन


खाने में शामिल हो
पौष्टिक, संतुलित आहार
विटामिन ,प्रोटीन,वसा,कार्वोहाइड्रेटयुक्त
भोजन करना है तैयार


माँ के अलावा अभिभावकों की
जिम्मेदारी की जरूरत है
बच्चे को खाना खिलाइए
बच्चे तो भगवान की मूरत है।


कवियत्री निभा कुमारी
(राजनगर ,मधुबनी , बिहार)

मेरे प्यारे अटल

मेरे प्यारे अटल!


तुम कहाँ गुम हुए?

 कहाँ गुम हुए ?

मेरे प्यारे अटल!

तुम में था एक कवि,

और एक नेता सरल।

तुम कहाँ गुम हुए ?

मेरे प्यारे अटल!

हैं तुम्हें खोजते 

मेरे दोनों नयन,

हो कहाँ तुम,

कहाँ कर रहे हो शयन?

आओ वापिस 

तुम्हें देखना चाहता हूँ।

कुछ पुष्प मैं तुमपर 

फेंकना चाहता हूँ।

मानता हूँ कि 

आना है मुश्किल बड़ा।

राह में है 

हिमालय भी आड़े खड़ा।

पर दिखाओ

तुम अपना वही हौसला।

फोड़ दो 

पर्वतों का घमंडी घड़ा।

कर रहा हूँ प्रतीक्षा

हर क्षण, पल -पल।

आ जाओ लौट कर मेरे प्यारे अटल।

आ जाओ लौट कर मेरे प्यारे अटल।।


सोमवार, 16 सितंबर 2019

शब्द

इस देश में
लोग यूँ हीं मरते हैं


लेकिन 'यूँ हीं'
मरने के लिए
इनका देशी होना जरूरी है।


याद रखना
अगर शब्द 'विदेशी' जुड़ा हो
तो आसान नहीं है
इनका मरना।


सरकारी अस्पतालों में
मरे लोग और
पांच सितारा अस्पतालों में
दिवंगत आत्माओं के बीच
कुछ तो फर्क होता है।


तुम इतरा सकते हो
ऐसी जगह होने पर
जहाँ किसी प्रजाति के
आगे या पीछे लगे शब्द
बदल सकते हैं उसका मोल।


अफ़सोस है
वो शब्द जिस दुनिया से
आए हैं,
वहाँ शब्दों की नहीं
सिर्फ प्रजाति की कीमत होती है।


 श्वेतांक कुमार सिंह
चकिया, बलिया/
कोलकाता

गुरुवार, 12 सितंबर 2019

ग़ज़ल

 लोग मरते नहीं थे दुआ के लिए


सिर्फ़ जीते रहे वो अना के लिए


बेहया को ये कोई बताए ज़रा
हुस्न पैदा है होता हया के लिए


दिल मेरा आपने है दुःखाया बहुत
हाल पर छोड़िए अब ख़ुदा के लिए


देख लूँ इक झलक मौत आ जाएगी
ज़िन्दगी है बची इल्तज़ा के लिए


दंड उसका सुदामा को मिलता नहीं
कुछ बचाता अगर वो सखा के लिए


बलजीत सिंह बेनाम
सम्प्रति:संगीत अध्यापक

मंगलवार, 10 सितंबर 2019

समय हूँ

समय हूँ,समय हूँ मैं
मंजिल का मूल्यवान् हूँ।


जरा इस बात पर ध्यान दो मेरा-
तेरे जीवन की अनोखी क़ीमत हूँ ,
मोती से ऊपर मूल्य है मेरा
बड़ा बलवान हूँ ,
बड़ा  धनवान हूँ।


न मेरा कोई सजीव तन है
न मेरा अपना मन है
न मुझें आराम है
न किसी का प्रतिक्षा है
सिर्फ टिक-टिक कर-
मैं चलता हूँ।
जो इंसान मुझें
बेवफ़ा समझता है
इक-उम्र के बाद व
बहुत पछ्ताता है।


हाँ मैं समय हूँ
इसलिए इंसान की
निरंतर साथ हूँ।
मुझें सब महत्व देते हैं
चाहे धनी हों या निर्धन ,
चाहे चोर हों या धर्मनिष्ट ,
चाहे मजदूर हों या सैनिक।


जरा-सी मेरी-
क़ीमत में इंसान
मंजिल लेती है
प्राण खो देता है ,
मेरी कहानी अजब-सी है
समय हूँ, समय हूँ मैं
मंजिल का मूल्यवान् हूँ।


अनुरंजन कुमार "अँचल"
जिला -:अररिया ,बिहार

शनिवार, 7 सितंबर 2019

नया कानून

497 लो जी स्वागत कर लो
आ गया है नया कानून
जहाँ नर, नारी स्वच्छद भाव से
पूरा कर सकेंगे मन का जूनून
नारी परपुरूष को गले लगा सकती है
तो पुरूष भी लेकर परनारी का सहारा
कर सकता है पत्नी, परिवार से किनारा
दोनों मनायेंगे रंगरलियां, परिवार को छोडकर मंझधारा
नैतिकता को छोडकर
खुला होगा व्यभिचार
दैहिक सम्बन्धों के सामने
खडा रोयेगा परिवार
कुछ सोचकर थोडी कल्पना कीजिये
सोच, समझ कर ही फैसला दिजिये
बडे, बुजुर्गों, परिवार के रिश्तों
बच्चों, को भी एक नजर सोचिये
हमारी परिवार की शर्मोहया,
संस्कार, हँसी और ख़ुशी
सब बदल जायेंगे मातम में,
सबको मिलेंगे गम, और दुखी
हमारी भारतीय सोच तो हमेशा से
घर को मन्दिर बनाने की रही है
माँ, बहन, बेटी, पत्नि सारे रिश्तों में
अपनेपन की महक रही है
ऐसी खुली छूट के हमारे
जीवन पर दूरगामी परिणाम होंगें
परिवार टूटेंगे,भावनात्मक, रूप से भी
पति, पत्नि भी अलगाव भोगेंगे
थका हारा नर जब शाम को
परिवार की ठंडी छाँव तले आता है
पत्नि, बच्चे, परिवार में सभी को
हँसते, मुस्कुराते देख जन्नत का सुख पाता है
हमारे सनातन धर्म की विशेषता
यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते
रमन्ते तत्र देवता रही है
ये पाश्चात्य संस्कृति हमारी जडों को
खोखला करने का काम कर रही है
एक विदेशी जोसेफ की याचिका पर
कानून भारत के रिश्तों को बदल देता है
और भारतीय मर्यादा, संस्कृति
को ताक पर रख देता है
हर एक रिश्ता इक मर्यादा
में ही पनप सकता है औ, ये रिश्ता
स्नेह, प्रेम, आदर, सम्मान की
मजबूत नींव पर ही चलता है
नारी को विचारों को अभिव्यक्त
करने की आजादी दीजिए
स्नेह, प्रेम, सम्मान ,गुण दीजिए
पर, यूँ उसे कुलटा बनाकर
कलंकित न कीजिये
नारी और नगरवधु में
क्या फर्क कर पाओगे
जब रिश्ते,अहसास और
जमीर ही ना जिन्दा रख पाओगे
हमारा सनातन धर्म रिश्तों की
पवित्रता को सम्मान देता है
जब बनेंगे खुले सम्बन्ध तो
फिर कौन किसको मान देता है
भारतीय समाज को भी इस
कानून के दुष्परिणाम भोगने होंगे
विदेशों की देखा ~देखी अगर
ऐसे कानून भारत में लाये जायेंगे
मेरा भारत धर्म, संस्कृति, औ,
रिश्ते जी जान से निभाता है
विदेशियों की नकल मत करो
भारतवासी अपनी आन, बान पर मरता है


सीमा गर्ग " मंजरी "

गुरुवार, 5 सितंबर 2019

लाचार बच्चा

मै उन जैसा नहीं था
उनका नादानियां, भोलापन
सबको अच्छा लगता
पर मैं उन जैसा कहा था
मै तो डहरा अपंग सिर्फ अंग,दिमाग से
नहीं होता अपंग जनाब
न आत्मविश्वास हो न साहस न ही हों
तेज,चमक,न खिलखिलाकर हस्ता था
मै तो बस जी भर के अपनी मां के गले
लग रोना चाहता था
मै हर समय खुद को कमजोर समझता था
जीने का बस एक यही सहारा
की अपना भी दिन आएगा
ना दिन आया ना रातों को चैन
बस यूंही कश्मकश में ज़िन्दगी कटती गई
क्यों हूं मै ऐसा, क्यूं नहीं मै उन जैसा
सम्मान पाने के लिए तो लड़ रहे हैं सब
मैं भी बस इज्जत ही चाहता था ज़िन्दगी
तुझसे बस इतना ही
मै लाचार सहमा बच्चा


टीना कर्मवीर


(सामाजिक कार्यकर्ता और  शोधार्थी हरियाणा)

बुधवार, 4 सितंबर 2019

मेरे पिता

मेरे पिता ने मुझे जिंदगी में
सबसे बड़ा तोहफा दिया,
उन्होंने मुझ में यकीन किया,


मेरे पिता ने पंख दिए उड़ने के लिए,
मां ने मुझे उडने का मौका दिया
एक हौसले से भरी जिंदगी,
और जीने का अवसर दिया


तेरा यूं कहना हौसला बुलंद रख
मंजिल मिल ही जाएगी भरोसा रख
खुद पर राहें आसान हो ही जाएंगी


यह व्यथा नहीं है मेरी यह तो सच्चाई है
संघर्ष के गर्भ से निकली इच्छाओं की कहानी।।


टीना कर्मवीर


(सामाजिक कार्यकर्ता और  शोधार्थी हरियाणा)

धर्म बता दो

अगर भूख कौम के रास्ते आती है
तो रोटी का भी कोई धर्म बता दो


आप धनाढ्य हैं,आप बच जाएँगे
खेतिहरों का भी कोई साल नर्म बता तो


दिल्ली की बाँहों में हैं सब रंगीन रातें
किसी मल्हारिन का भी चूल्हा गर्म बता दो


बेटियों से ही सब उम्मीद की जाएँगी क्या
देश के संसद में भी बची हुई शर्म बता दो


मन्दिर जाने से ही पाप-पुण्य होता है क्या
फिर आधुनिक बाबाओं का भी कर्म बता दो


कविताएँ जो कह पाती सब की बातें
तो तहखानों में कैद ज्ञान का मर्म बता दो


सलिल सरोज