पुस्तक समीक्षा लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं
पुस्तक समीक्षा लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं

शुक्रवार, 6 सितंबर 2019

हंसराज कॉलेज (दिल्ली विश्वविद्यालय ,दिल्ली)के सेमिनार हॉल में 'बाली उमर'उपन्यास पर मुख्य वक्ता के रूप में बोलते हुए।

हंसराज कॉलेज (दिल्ली विश्वविद्यालय ,दिल्ली)के सेमिनार हॉल में 'बाली उमर'उपन्यास पर मुख्य वक्ता के रूप में बोलते हुए दिनांक 27.08.2019 के दिन-

बाली उमर-भगवंत अनमोल

1.लेखक परिचय-
आचार्य रामचंद्र शुक्ल ने लिखा है -

"बिना परिचय के प्रेम नहीं हो सकता ।यह परिचय पूर्णतया तो साक्षात्कार से होता है।"

यह कथन काफी हद तक सटीक है।किसी भी व्यक्ति या लेखक या उनकी रचना को जानने, समझने और बुझने के लिए उस व्यक्ति से,लेखक से या उनकी रचना से साक्षात्कार करना पड़ता है।ठीक उसी प्रकार भगवंत अनमोल के 'बाली उमर' उपन्यास को समझने के लिए इनके अक्षरशः शब्दों,वाक्यों और विचारों को आत्मसात और असहमति प्रकट करने की जरूरत है।यह तभी संभव है,जब आप इन्हें शुरू से अंत तक पढ़ेंगे।

भगवंत अनमोल युवा लेखक हैं।इनकी रचना को हर उम्र के लोगों ने हाथों हाथ लिया है।इन्हें उत्तर प्रदेश हिंदी संस्थान के 'बालकृष्ण शर्मा नवीन पुरस्कार 2017' भी प्राप्त हो चुके हैं।उनकी पुस्तक 'जिन्दगी 50-50' पर कई विद्यार्थी शोध कर रहे हैं।

2.पात्र परिचय:-
पोस्टमैन(बंटी),खबरीलाल(पेटर),गदहा(रिंकू),आशिक(झण्डी लाल),'पागल है' आदि हैं।खबरीलाल ग्रामीण समाज में घटित सभी घटनाओं के लेखा जोखा रखा करते थे,पोस्टमैन समाज में एक दूसरे का संदेश पहुंचाने का कार्य किया करते थे,गदहा समाज के उन बच्चों में शामिल थे,जो कम पढ़ते थे और ज्यादा सोचते थे ,आशिक बचपन से ही आशिकी लेकर पैदा होनेवाले बच्चे थे और 'पागल है' उस समाज में परिस्थितियों का शिकार है।इनके अलावा और अन्य पात्र मयूरी,मिश्रराइन,मुखिया जी,बम्बईया आदि हैं।

3.उपन्यास के संदर्भ में

'बाली उमर' एक सामाजिक उपन्यास है,जिसे बालकों के द्वारा प्रस्तुत किया गया है।यह नवाबगंज के दौलतपुर मोहल्ले के बच्चें की कहानी है,जिस प्रकार प्रेमचंद के उपन्यास 'गोदान' बेलारी और रेणु के उपन्यास'मैला आँचल' मेरीगंज की कहानी है,ठीक उसी प्रकार यह कहानी है।यह भले मासूम बच्चे और शरारती बच्चों कहानी हो,मगर उनके सवाल देश और समाज के सवाल हैं।यह अपने समय की राजनीति और जातीय क्षेत्रीय पहचानों के संघर्ष का उपन्यास है।यह उपन्यास भाषा के नाम पर, धर्म के नाम पर, जाति के नाम पर , क्षेत्र के नाम पर बढ़ रहे द्वेष के दस्तावेज हैं।इन द्वेषों में भारतीय सभ्यता संस्कृति की पहचान धुंधली होती जा रही है।शुरू से अंत तक मनोरंजन के माध्यम से अपने समय के समस्याओं को समझाने और समझने में लेखक सफल हुए हैं।यह उपन्यास एक लड़का का आजादी की मांग करता है।इस उपन्यास में प्रेम है,संघर्ष है,समाज के दोहरे चरित्र हैं,इंसानियत हैं,भूख है,तड़प हैं और उम्मीद है।इस उपन्यास को निम्नलिखित बिंदु के माध्यम से समझने का प्रयास करेंगे-
1.अपनी अनुभूति को समाज तक पहुंचाने की तड़प-

भगवंत अनमोल अपने जीवन के सूक्ष्म से सूक्ष्म अनुभव को समाज तक पहुंचाने के लिए उत्सुक हैं।इन्होंने अपने जीवन के कटु अनुभव और सुखद अहसास को इस उपन्यास में शब्दबद्ध करने का प्रयास किया।यह अहसास उनके जीवन के किस्से हैं।वह अंदर ही अंदर धुंधला न पड़ जाएं,इसकी चिंता लेखक को है।उसे वे प्रकट कर देना चाहते हैं।जैसे-
"मेरे अंतर्मन में दबा यह किस्सा वक्त के साथ धुंधला पड़ता जा रहा है इससे पहले की यह कहानी अंदर ही अंदर दम तोड़ दे,मैं आपलोगों तक पहुंचा देना चाहता हूँ।"
यह तड़प सामाजिक तड़प है।एक इंसान की तीव्र उत्कण्ठता है।अपने जीवन के अनुभव को समाज को समर्पित कर देने की समृद्ध लालसा है,ताकि समाज का तनिक उद्धार हो सकें और भावी पीढ़ी उससे प्रेरणा प्राप्त कर सके।

2.सामाजिक कुरुतियाँ का पर्दाफाश-

ग्रामीण समाज और नगरीय समाज में अनेक कुरुतियाँ विद्यमान हैं।इन दोनों जगह पर रिश्ते की आड़ में वासना छुपे होते हैं और अनैतिक संबंध जुड़े होते हैं।ये संबंध हमारे मर्यादा को तार तार करते हैं।इसका भी बखूबी ख्याल लेखक ने रखा है जैसे-
"जानते हो वे?कल हम छप्पर के नीचे से भोगिल घर में झाँक देखे थे।वह टेलर की दुलहिन सिर्फ उसका घर का काम नहीं करत आये।भोगिल के साथ काण्ड भी करती है।"
यह उक्तियाँ सिद्ध करती है कि लेखक समाज के रग रग से वाकिफ हैं और खासकर इन कुरुतियों से।

3.राजनीति पर प्रहार

'बाली उमर' उपन्यास राजनेता का पर्दाफाश करते हैं।उनकी सत्ता प्रवृति को उजागर करते हैं।यह उपन्यास शोषण के पक्षधर पर कटाक्ष करती है।समाज और देश के जनप्रतिनिधि जनप्रिय नहीं हैं,बल्कि लठप्रिय हैं।जैसे-
"यह कहावत प्रचलित है कि जो सबसे बड़ा लठमार होता है,वही नेता बनता है।"
इस पंक्ति की जाँच पड़ताल करने पर और आज के जनप्रतिनिधि को देखने पर पता चलता है कि यह कहीं न कहीं सटीक है।

4.विवाह व्यवस्था-

भारतीय सभ्यता और संस्कृति की पहचान दांपत्य सूत्र हैं।यह सूत्र दो अनजाने लोगों को सात जन्म तक साथ साथ रहने की वकालत करती है।सात जन्म कोई रहे न रहे ,मगर एक जन्म के अधिकांश वक्त हँसते खेलते और मुस्कुराते हुए दोनों जी लेते हैं।यह इस व्यवस्था का सुंदर रूप है।यह दो लोगों के मिलन के साथ अनेक के ख्वाबों का मिलन होता है।जैसे-
"शादी सिर्फ दो लोगों की होती है,पर उस शादी से ख्वाब कई लोगों के जुड़े होते हैं।शादी की रात दो लोगों का मिलन नहीं कराती है,बल्कि नए लोगों के प्रेम प्रसंगों की शुरुआत की भी रात होती है।"

5.भोजन के बदले लातों की अशर्फियाँ-

'पागल है' इस उपन्यास का प्राण पात्र हैं।ये कन्नड़ समाज के हैं।इन्हें हिंदी नहीं आती है।इनके चाचा ने यहाँ इन्हें छोड़ दिया है।इनके चाचा को अपने भाई से कुछ असंतोष हैं,मगर यह असंतोष मर्यादा और सादगी की चादर ओढ़े हुए हैं।इनके अंदर द्वेष की ज्वाला है,जिसका शिकार 'पागल है' हुआ है।
'पागल है'(गोविंद) एक रात जंगल में काटी है।उन्होंने तालाब का जल पिया है।जलती धरती पर पाँव रखकर कई कोस चला है।भयानक रात में अनेक डरावने पशु पक्षी की आवाजें सुनी हैं।उनकी कमीजें फट चुकी हैं।उनके शरीर धूल धूसरित हैं और चेहरे भयानक हैं।वे आशिक के बहन के भोज को देखकर अपनी क्षुब्धा मिटाने की अदम्य साहस किये हैं,मगर उनके इस साहस के बदले उन्हें लातों की अशर्फियाँ प्राप्त हुई है।जैसे-
"इन सालों को लगता है कि मुफ्त का खाना है खा लो।"
ये वही सभ्य समाज के सभ्य लोग हैं,जो भूख,गरीबी,रोजगार और न जाने कितने धार्मिक और दान की परंपरा पर बड़े बड़े बड़े व्याख्यान देते हैं और प्रतिष्ठा की पोटली सर पर बाँधकर घूमते फिरते हैं,मगर ये औघरदानी यहाँ पर एक भूखे को भोजन देने में असफल हो गए हैं।यह समाज का कटु सत्य है।समाज के द्वारा किया गया अमानवीय व्यवहार है।यह दृश्य सभ्य समाज पर प्रश्नवाचक चिन्ह खड़ा करता है।

6.भगवान पर सवाल-

उपन्यासकार भारतीय समाज के सबसे बड़े सत्ता पर भी सवाल उठाते हैं।ईश्वर को सर्वशक्तिमान मानने वालों को नंगा करते हैं।उनके सवाल के आगे ईश्वर के पक्षधर पंगु बने हुए खड़े लगते हैं।जैसे-
"कहाँ गए ये ईश्वर को पूजनेवाले?कहाँ गए थे हर इंसान को ईश्वर की औलाद कहननेवाले?एक ईश्वर की औलाद भूखी दर दर भटक रही थी।उसका क्या होगा?आखिर वह भी किसी का बेटा है,किसी के जिगर का टुकड़ा है।हम क्यों अपने से भिन्न लोगों के साथ बुरा बर्ताव करते हैं?"
समाज के पास इस सवाल का जवाब है।शायद अगर हो भी तो निर्लज्जता पूर्ण आचरण का ही एक उदाहरण होगा।कोई समाज इतना निर्दयी कैसे हो सकता है?जरा सोचिए हम मनुष्य के लायक हैं या नहीं।अभी मनुष्य बनने के लिए सदियों का सफर त तय करना पड़ेगा।

7.सुखद स्मृति याद आना-

मानव का मन हमेशा दुख के पल में सुखद स्मृति से टकराते हैं।जो पल संयोग का अमृत होता है ,वही वियोग का विष।यह विष ही जिंदगी की सार्थकता है।शुक्ल जी ने सच ही लिखा है-"जिनका दिल सही सलामत है,जिनका हृदय मारा नहीं गया है,उनकी दृष्टि अतीत की ओर जाती है।" इस तराजू पर तौलने के बाद हम पाते हैं कि पागल का दिल सलामत है।उन्हें अपने अतीत के सुखद पल याद हैं।जैसे-
"तभी उसे याद आया कि उसके नाराज होने के बाद उसके बाबू उसके लिए मिठाई लेकर आये और उसने नाराजगी में वह मिठाई फेंक दी थी।उस वक्त कहाँ पता था कि ऐसा समय आएगा जब उसे पीने के लिए पानी और खाने के लिये भोजन तक नसीब नहीं होगा।

8.खुद की पहचान खो देना-

'पागल है' लातों और घूसों के अशर्फियाँ खाकर मूर्छित होकर जमीन पर गिर पड़े थे।उनकी मूर्च्छा टूटी।तब तक में लोग भोजन कर चुके थे।उन्होंने उनके फेंके पतल से बिन बीनकर खाया ।यह दृश्य प्रेमचंद के कहानी 'बूढ़ी काकी' की याद दिलाती है।इस दृश्य को देखकर मुखिया का हृदय द्रवित हो गया और वे उन्हें अपने घर ले आया,जहाँ पर उनके भाषा और बोली कोई समझते नहीं हैं।उन्हें पशु चराने का कार्य सौंपा गया और सुखी रूखी रोटी देकर तथा फटी चादरे और फटी बिस्तर देकर अपने कर्तव्य का इतिश्री समझ लिया गया ।अब वे एक मजदूर थे।पेट पर काम करनेवाले मजदूर।उनकी पहचान मिट चुकी थी।जैसे-
"एक तरफ उसके एक ही प्रान्त की ऐश्वर्या राय ने कुछ महीने पहले ही विश्व सुंदरी का खिताब हासिल कर विश्व भर में पूरी भारत का नाम रौशन किया था और अपनी पहचान बनायी थी,वही दूसरी ओर उसी प्रान्त का एक लड़का अपने ही देश में पहचान खो चुका था।"

9.मौत को गले लगाना-

इंसान परिस्थितियों से लड़कर कभी कभी काफी कमजोर हो जाते हैं।वे किंकर्तव्यविमूढ़ता की स्थिति में आ जाते हैं।उन्हें जीवन का कोई राह नहीं दिखाई पड़ता है,ऐसे विषम परिस्थिति में लोग मौत को गले लगाने के लिए आतुर हो जाते हैं।मगर इससे बड़ी कायरता इस संसार में कुछ भी नहीं हो सकता है।जिंदगी को जिंदादिली के साथ जीना चाहिए।'पागल है' एकबार वहाँ से भागने का प्रयास किया था,मगर वे सफल नहीं हो पाए।उसके बाद उन्होंने मौत को गले लगाने का प्रयास किया,परन्तु उन्हें एक स्त्री की झलक ने बचा लिया।जैसे-
"किसी भी व्यक्ति के लिए प्रेम या स्त्री आकर्षण से अधिक आकर्षण क्या हो सकता है।वह ऐसा ही कर रहा था कि तभी उसके सामने से एक लड़की गुजरी।"
यह गुजरना उनकी नई जिंदगी की शुरुआत है।इसलिए छायावादी कवियों ने खासकर नारी को विशेष सम्मान दिया था।जयशंकर प्रसाद ने तो नारी को श्रद्धा और विश्वास की साक्षात मूर्ति कही थी।उसने लिखा है-
"तुमुल कोलाहल कलह में
मैं हृदय की बात रे मन।"
सच नारी का जीवन पुरुष के जीवन का परिचायक है।यू कहें तो पुरुष का और इस संसार का अस्तित्व उसके बिना संभव ही नहीं है।

10.भाषा की विभिन्नता और एक उम्मीद-

जैसा कि शुरू से ही विदित है कि "पागल है" कन्नड़ समाज के हैं।वे हिंदी वासी प्रदेश में अभी विद्यमान हैं,मगर उन्हें हिंदी नहीं आती है।यहाँ पर लेखक दो संस्कृतियों को जोड़ते हैं।बम्बईया ग्रामीण क्षेत्र का ही लड़का था,मगर वे बंबई तक की यात्रा कर चुके हैं।ये पात्र "गोदान" के 'गोबर' की याद दिलाते हैं।वे थोड़ा कन्नड़ भी जानते हैं-सिर्फ परिचय भर।वे चारों के साथ खेल खेल रहे हैं।वहीं पर 'पागल है' पशु चरा रहे हैं।बम्बईया समाज के अवधारणाएं और उनकी झूठी बंदिशे को उघाड़ते हैं।वे 'पागल है' से बात करते हैं।जैसे-
बंबईया-नमस्कारा,हेगीदिरा(नमस्कार कैसे हो?)
'पागल है' का जवाब-सरियागी नी ईदी(ठीक ही है।)
बंबईया-एन नी उठा मड़ीदिया(क्या तुमने खाना खा लिया?)
जवाब-हां,उठा माड़ीदे(हां, खा लिया)
बंबईया-निन्ना हेसुरु ऐनु(तुम्हारा नाम क्या है?)
जवाब-गोविंद
ये संक्षिप्त वार्तालाप ही उनकी जिंदगी की आजादी की गाथा लिख देती है।

11.हिंदी सिखाने की जिद और नाटक की तैयारी-

अब चारों मित्र जान चुके हैं कि 'पागल है' पागल नहीं हैं।वे उन्हें सिखाने की बीड़ा उठाते हैं और उनकी आजादी की लड़ाई लड़ने का बीड़ा उठाते हैं और उसके लिए नाटक का सहारा लेते हैं।सिखाने के क्रम में वे एक बच्चे की तरह उन्हें अक्षर ज्ञान देते हैं।जैसे-
"जिस तरह एक बच्चे को सिखाते हैं हर चीज दिखाकर बताते है कि यह एक केला है,तो केला दिखाते हैं।शरीर के अंगों पर हाथ रखकर बताते हैं कि यह नाक है और यह कान है।"

12.मुखिया का अत्याचार-

जब मुखिया को पता चलता है कि 'पागल है' नहीं हैं,तो वे हर संभव उन्हें 'पागल है' सिद्ध करने का प्रयास करते हैं।वे उन्हें मित्रों से मिलने पर पाबंदी लगा देते हैं।उन्हें काफी मारते हैं।उन्हें मार कर भूसा वाले घर में डाल देते हैं।जैसे-
"जब मुखिया जी को पता चला कि मेरी आजादी के लिए मेरे दोस्त नाटक कर रहे हैं तो उन्होंने मुझे बहुत मारा।मार मार कर भूसा वाले कमरा में डाल दिया बाहर से बंद कर दिया। मैं दो दिन से भूखा।मुझे बहुत मारा।
यह वर्णन ही सभ्य लोग के सादगी पर बड़ा सवाल पैदा करते हैं।ये दोहरा चरित्र का एक उदाहरण हैं।ऐसे अनेक उदाहरण हमारे समाज में उपलब्ध हैं।

13.आदर्श पात्र-

'पागल है' यहाँ पर एक आदर्श पात्र के रूप में हमारे सामने आते हैं।जीवन के तमाम संघर्ष के बावजूद भी किसी से द्वेष और घृणा नहीं।जैसे-
"अगर आप मेरा बदला लेना चाहते हैं तो मुझे मेरे घर छोड़ दीजिए।"यह दृश्य 'रंगभूमि' के सूरदास और 'गोदान' के होरी तथा जैनन्द के 'त्यागपत्र' के मृणाल की याद दिलाते हैं।

14.एक शिक्षक के रूप में-

'पागल है' पात्र अपनी सीमा से बाहर हो गए हैं।वे अब एक शिक्षक के रूप में हैं।उनकी प्रेमिका खुद कहते हैं-
"तुमने यहाँ पर सात साल 'पागल है' बनकर गुजारे हैं।पर आनेवाली पूरी जिन्दगी एक शिक्षक के रूप में गुजारोगे।हम सभी को यह सीख देकर जा रहे हो कि चाहे विपरीत परिस्थिति मिल जाये,हमें हार नहीं मानना चाहिए।अपनी जिजीविषा के सहारे भरसक जीना चाहिए।एक दिन जरूर कोई न कोई रास्ता निकलेगा।" -यही तो जिंदगी जिंदादिली है।

15.भाषा-

इस उपन्यास में ग्रामीण बोलियाँ हैं।जैसे- दे गन्ना दे गन्ना।ग्रामीण शब्द हैं-दुलहिन,कपड़न, टेलर,कुकुर भोज आदि।इनके पात्र के नाम भी ग्रामीण हैं-खबरीलाल ,आशिक,पोस्टमैन गदहा, पागल है आदि।भाषा सरल और स्पष्ट है।भाषा में प्रवाहमयता का ख्याल रखा गया है।

16.एक उम्मीद-

यह उपन्यास एक उम्मीद पर लाकर छोड़ती है।यह उम्मीद जिंदा शब्द है। इसके सहारे लोग जिंदगी जीते हैं।यह उम्मीद एक विश्वास का है और प्रेम का है।जैसे-
" 'पागल है' ने अपने आँसुओं को रोकते हुए हामी भर दी।हां, मैं तुम्हें लेने जरूर आऊँगा।"

17.निष्कर्ष-

यह उपन्यास जीवन में आस्था पैदा करता है।इस उपन्यास के लेखक को समाज का बोध है,प्रेम का बोध है,भाषा की विभिन्नता का बोध है,गुलामी का बोध है और अपनी आजादी का बोध है।यह उपन्यास पाठक को अपने में बाँधकर रखने का सामर्थ्य रखता है।'पागल है' की लड़ाई और आजादी एक खाँचे से बाहर जाने की है।यह उपन्यास मनुष्य के निजी जीवन की व्याख्या करता है।यह भारतीय जनजीवन की जिजीविषा और जिंदगी की संभावनाएं की वकालत करता है।इस उपन्यास में विद्या को मुक्ति देने का एक सशक्त हथियार के रूप में प्रस्तुत किया गया है।भले इस उपन्यास का शीर्षक -'बाली उमर' है,मगर यह हर उम्र की दस्तावेज है।इनके केंद्र में प्रेम है,आकर्षण है,संघर्ष है,आजादी की लड़ाई है,नगरी सभ्यता का मिलन है,जीवन का सौंदर्य है और उमीद की एक किरण हैं।

18.अपील-

एक आलोचक को पक्ष और विपक्ष दोनों पर विचार करना चाहिए।ये आलोचक की प्रतिभा का भी एक प्रमाण है,परंतु जबरदस्ती निंदा करना और रचना पर सवाल उठाना एक अपराध भी है।सवाल करना बुरी बात नहीं है,मगर सवाल के पीछे अपना तर्क प्रस्तुत नहीं करना बुरी बात है।हमें यह कहने में संकोच नहीं है कि एक आलोचक को लगे कि इस लेखक की सर्वांग वर्णन ही सत्य है,तो उन्हें आत्मसात कर लेने में कहीं संकोच नहीं होनी चाहिए।रचना को रचना के तरह पढ़ना चाहिए न कि पक्ष विपक्ष की दृष्टि से ।रचना को पूर्णतः पढ़ लेने के बाद पक्ष विपक्ष की दृष्टि अपनानी चाहिए,ताकि उनके हर संदर्भ स्पष्ट नजर आए।बस इतना ही-

-तेजप्रताप कुमार तेजस्वी
दिल्ली विश्वविद्यालय,दिल्ली