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बुधवार, 2 अक्तूबर 2019

गांधी जयंती विशेष

महात्मा गांधी सत्य और अहिंसा के पुजारी माने जाते है जिन्होंने सत्य और अहिंसा का पाठ पढ़ा कर हमें गुलामी जैसी बेड़ियों को तोड़कर बाहर निकलना सिखाया है। गांधी जी का जन्म 2 अक्टूबर 1869 ई में गुजरात के पोरबंदर में हुआ था और आज हम 2 अक्टूबर को गांधी जयंती के रूप में मनाते हैं। गांधी जयंती का मतलब सिर्फ गांधी जी की फोटो पर फूलों के हार चढ़ाना नहीं है ना ही उन पर बड़े-बड़े भाषण देना और न ही कविताएं बोलना है गांधी जयंती का महत्व तब ही सार्थक माना जा सकता है।जब हम गांधी जी की शिक्षाओं को विचारों को अपने जीवन में अपनाएं।
गांधी जी कहते थे,
"अगर आप दुनिया को सुधारना चाहते हो तो आज से ही खुद को सुधारना शुरू कर दे"


गांधी जी के इन विचारों का यही अर्थ है कि पहले हमें खुद को सुधारना होगा,खुद में एक बदलाव लेकर आना होगा तो ही हम समाज को सुधार सकते हैं,समाज को बदल सकते है  क्योंकि जो इंसान खुद को सुधार सकता है वही समाज को सुधार सकता है समाज में बदलाव ला सकता है। गांधी जी कहते थे,
"आदमी अक्सर वो बन जाता है जो वो होने में यकीन करता है. अगर मैं खुद से यह कहता रहूँ कि मैं फ़लां चीज नहीं कर सकता, तो यह संभव है कि मैं शायद सचमुच वो करने में असमर्थ हो जाऊं. इसके विपरीत, अगर मैं यह यकीन करूँ कि मैं ये कर सकता हूँ, तो मैं निश्चित रूप से उसे करने की क्षमता पा लूँगा, भले ही शुरू में मेरे पास वो क्षमता ना रही हो।"


  गांधीजी धर्म को व्यक्तित्व के विकास के लिए आवश्यक समझते थे परंतु धार्मिक आडंबर और कट्‌टरता से दूर रहते थे। परंतु आज हम उनकी शिक्षाओं पर ना चल कर धर्म के नाम पर आपस में लड़ मर रहे हैं धर्म के नाम पर नेता वोट मांग रहे हैं और हम वोट दे रहें हैं। गांधी जी कहते थे,
" मैं उसे धार्मिक कहता हूँ जो दूसरों का दर्द समझता है।"


गांधीजी को सत्य व अहिंसा का पुजारी कहा जाता है उन्होंने केवल भारत के लोगों को ही नहीं विश्व के समस्त लोगों को सत्य व अहिंसा का पालन करने का संदेश दिया हैं। उन्होंने भारत देश को जो सदियों से गुलाम था कभी मुगलों का कभी अंग्रेजों का उसको सत्य व अहिंसा के द्वारा ही स्वतंत्र करवाया। वह कहते थे,
"मेरा धर्म सत्य और अहिंसा पर आधारित है. सत्य मेरा भगवान है. अहिंसा उसे पाने का साधन।"
हमें भी गांधीजी के सत्य और अहिंसा को अपनाना होगा तभी हम जीवन में आगे बढ़ सकते हैं क्योंकि जो इंसान सत्य नहीं बोल सकता वह सत्य के लिए जी भी नहीं सकता। गांधी जी ने अहिंसा को मानव तक ही सीमित नहीं रखा उन्होंने जानवरों के प्रति होने वाली अहिंसा का भी विरोध किया। गांधी जी कहते थे,
"एक देश की महानता और नैतिक प्रगति को इस बात से आँका जा सकता है कि वहां जानवरों से कैसे व्यवहार किया जाता है।"इसके अलावा गांधी जी ने बहुत सारी शिक्षाएं दी है जैसे:-समय का महत्व,समानता में विश्वास,पाप से घृणा करो,पापी से प्रेम करो,अपनी कमजोरियों की स्वीकारोक्ति,औरों की सेवा, प्रेम की शक्ति,अदम्य इच्छा शक्ति,औरत के प्रति अन्याय का विरोध,जीवन में कर्म का महत्व, जीवो की प्रति दयालुता इत्यादि। गांधी जी कहते थे,


"आप मुझे जंजीरों में जकड़ सकते हैं, यातना दे सकते हैं, यहाँ तक की आप इस शरीर को नष्ट कर सकते हैं, लेकिन आप कभी मेरे विचारों को कैद नहीं कर सकते"


अंत में अपनी कलम को विराम देते हुए यही कहूंगा कि वास्तव में हमें गांधी जयंती मनानी है तो इसका सही ढंग यही है कि हम गांधी जी की शिक्षाओं और विचारों को अपने जीवन में अपनाएं जिससे हम अपने साथ-साथ समाज में भी एक नया बदलाव लेकर सकें।


     राजीव डोगरा,कांगड़ा हिमाचल प्रदेश (युवा कवि लेखक)


(भाषा अध्यापक)
गवर्नमेंट हाई स्कूल,ठाकुरद्वारा।

सत्य और अहिंसा के पुजारी राष्ट्रपिता महात्मा गांधी

      देश के स्वतंत्रता संग्राम और आजादी के लिए अपने प्राणों की आहुति देने वाले राष्ट्रपिता  महात्मा गांधी की पुण्यतिथि को पूरे देश में शहीद दिवस के रूप में मनाया जाता है । वर्ष 1948  में महात्मा गांधी की नाथूराम गोडसे ने गोली मारकर हत्या कर दी थी,और उनकी हत्या ने पूरे देश को हिला कर रख दिया था । इस दिन महात्मा गांधी की समाधि स्थल राजघाट पर राष्ट्रपति, उपराष्ट्रपति, प्रधानमंत्री ,रक्षा मंत्री राष्ट्रपिता महात्मा गांधी को अपने कर कमलों से श्रद्धा सुमन अर्पित करते हैं। महात्मा गांधी की याद में पूरे देश में सभाएं आयोजित की जाती है।



एक कार्यक्रम के दौरान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने सभी जनसाधारण से अपील की है ,कि महात्मा गांधी की पुण्यतिथि के अवसर पर 2 मिनट का मौन अवश्य धारण करें । गांधी जी ने देश को आजाद कराने के लिए सत्याग्रह का रास्ता अपनाया, वे सदैव अहिंसा में विश्वास रखते थे, अपने जीवन काल के दौरान उन्होंने जनसाधारण को इसी का पाठ पढ़ाया । अफ्रीका से वापस आकर गांधीजी ने स्वयं को स्वतंत्रता संग्राम के आंदोलन में झोंक दिया। 1915 के बाद महात्मा गांधी ने अंग्रेजो के खिलाफ एक के बाद एक आंदोलन आरंभ किए, 1920 में असहयोग आंदोलन चलाया, फिर 1930 में नमक के अत्याचारी कानून को तोड़ने के लिए आंदोलन किया ,दलितों के पक्ष में बढ़-चढ़कर भाग लिया,  उसके बाद 1942 में भारत छोड़ो आंदोलन चलाया, आखिर उनके अनथक प्रयत्नों के आगे अंग्रेजों को अपनी हार माननी ही पड़ी और 15 अगस्त 1947 को भारत अंग्रेजों की बेड़ियों से आजाद हो गया। महात्मा गांधी जी ने जिस रास्ते पर चलकर भारत को  आजाद कराया ,वह रास्ता सत्य और अहिंसा पर आधारित था। उनका प्रयोग हमारे जीवन के कई पडावों में अत्यधिक मददगार साबित होता है। उन्होंने सदैव अच्छा व्यवहार करने, सच बोलने की सीख और जरूरतमंद लोगों की सहायता करने की शिक्षा दी।


महात्मा गांधी जी सत्य को ही भगवान मानते थे । वह जाति, धर्म, लिंग के आधार पर किए जाने वाली भेदभाव के सदैव खिलाफ थे ।महात्मा गांधी सत्य और अहिंसा को ही मानवता का सबसे कीमती उपहार मानते है अगर हम महात्मा गांधी के अनथक प्रयासों को सार्थक करना चाहते हैं और भारत को  उन्नति और समृद्धि की  राहों  की ओर ले जाना चाहते हैं ,तो हमें उनकी सीख पर चलना होगा ,तभी हम एक उज्जवल भारत के सपने को पूर्णता पूरा कर सकते हैं और समाज में व्याप्त बुराइयों का मुकाबला डट कर कर सकते हैं।


अमित डोगरा

(पी एच.डी, गुरु नानक देव विश्वविद्यालय अमृतसर)

गुरुवार, 26 सितंबर 2019

राष्ट्र के मार्गदर्शक हैं शिक्षक

समाज में गुरू अर्थात शिक्षक का स्थान सबसे ऊपर है ।प्रारंभिक से लेकर अंतिम समय तक उनके द्वारा दी गयी शिक्षा से जीवन प्रकाशित होती रहती है।जो मनुष्य शिक्षक का सम्मान करता है सही मायने में शिक्षित है।शिक्षा से ही सम्मान है।आदर- भाव, आचार -विचार, व्यवहार और संस्कार जीतने भी गुण हैं सभी को सम्माहित कर कोई सही मायने में शिक्षक बनता है और लोगो को शिक्षा देता है।जिस प्रकार माली छोटे छोटे पौधों को बड़ा और फलदार वृक्ष बनाने में मेहनत करता है ठीक उसी तरह हमारे शिक्षक भी बच्चों के पीछे छुपे प्रतिभा को निखार कर उन्हें सही रास्ते पर ले जाते है और भविष्य के इंजीनियर, डाॅक्टर साइंटिस्ट और अधिकारी बनाते हैं।

शिक्षक के योगदानो को समाज कभी नही भूला पाता और भूलना भी नही चाहिये। शिक्षा देना भी एक कठिन तपस्या है।देने वाला भी सोचता है कि मैं आज जो कुछ इसे बता रहा हूँ वह यह कितना ग्रहण कर पाएगा उसके दिमाग में क्या चल रहा है?,इसका क्या असर होगा? ठीक डाॅक्टर की तरह जब वह मरीज को कोई दवा देता है तो उसके गुण दोष के बारे में अवश्य सोचता है। शिक्षा के साथ भी शिक्षक ऐसा जरूर सोचते हैं।

आज कल की पद्धति जरूर बदल गयी है लेकिन शिक्षा की धूरी आज भी शिक्षक ही हैं इस बात को सभी को समझना होगा और शिक्षक के प्रति आदिकाल वाला व्यवहार रखना ही होगा।लोग तनिक सी बातो पर शिक्षक के साथ दुर्वयहार कर देते है कोई शिक्षक आज कडाई नही बरतता क्योंकि हंगामा खडा हो जाता है मानवाधिकार संगठन,बाल अधिकार कानून सब पीछे पड़ जाते जिससे शिक्षको के मनोवल को आघात लगता है और वे उस रूचि से काम नही कर पाते।

समस्याएँ कई है आधुनिकतम चीजो का अभाव,पुस्तके,लाइब्रेरी प्रयोगशालायें, भवन तथा जर्जर पडे सिस्टम से नित जूझना पडता है। फिर भी वे शिक्षा जगत को आगे ले जाने के लिए कठिन परिश्रम तो करते ही है ।इसमें यदि लोगो का साथ मिल जाये तो और भी अच्छा होगा।


शिक्षक का समाज और राष्ट्र निर्माण में बडा महत्वपूर्ण स्थान रहा है।देशप्रेम संस्कार और सभ्यता एक स्कूल के द्वारा प्रदान की गयी शिक्षा से ही जागृत होकर हमारे लहू में दौडता है जो आगे चलकर देश समाज और परिवार के काम आता है हमारे आर्दश भी शिक्षक है हमारे निष्कर्ष भी शिक्षक ही हैं इसलिए शिक्षक का सम्मान हमेशा से हमारे समाज में सर्वोपरि माना गया है।

शिक्षा का व्यवसायीकरण शिक्षा जगत के लिए जहर है जिससे समाज और राष्ट्र को सोचना होगा। नित बढ़ते फीस ऊँची होती खर्च और पीठ पर लदते किताबो के बोझ ने जैसे शिक्षा की कमर तोड के रख दी।सरकारी स्कूलो में उदासीनता और प्राईवेट के पीछे भागते लोग यही सच्चाई बनकर रह गयी है ।सरकारी स्कूलों में शिक्षक की कमी सुविधाओ की कमी वही प्राईवेट स्कूलो में सुविधा के साथ हाईटेक व्यवस्था मौजूद रहता है जिसके कारण ऊँची फीस वसूली जाती है।एडमिशन से लेकर रोज बदलते स्लेबस की किताबो पर भी मोटी रकम ली जाती है ऐसे सिस्टमों के सहारे कैसे कम आमदनी वाले या मध्यमवर्गीय परिवार वाले अपने बच्चों को शिक्षा दे पाएँगे गंभीर चिंता का विषय बना हुआ है। हलांकि सरकारें भरसक इस खाई को कम करने के लिए प्रयासरत है लेकिन बिना कठोर निर्णय के समस्या का समाधान होना मुश्किल सा प्रतीत होता है।पांव फैलाये इस जहर में कोई हाथ डालना नही चाहता क्योंकि सभी शहर में नामी गिरामी व्यक्तियों के बच्चे पढ़ते हैं।

शिक्षा को समान बनाना एक विकल्प है जब एक संविधान एक राष्ट्र हो सकता है तो एक शिक्षा क्यों नही? एक स्लेबस क्यो नही ?एक शिक्षा होने से समान शिक्षा होगी समान किताबे होगी और समान विचारधारा का जन्म होगा जिससे पनप रही खाई कम हो सकेगी साथ ही साथ कम खर्च भी होगे।मेरा मानना है कि शिक्षा से जुडे लोग इस विषय पर अवश्य सोचते होंगे ।

                                  आशुतोष

                                  पटना बिहार