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रविवार, 8 दिसंबर 2019

दबी आवाज़ें


मज़दूरों के हथौड़ी 




ठोंकने की आवाज़,

सब्जीवाले की 

दाम चीख़ती आवाज़,

विश्वविद्यालयों की

गूँजती बेक़रार आवाज़,

सुबह-सुबह अज़ान और 

मुकद्दस भजनों की आवाज़,

बस्तियों में ढील हेरती 

युवतियों की आवाज़,

सड़कों पर कोलतार बिछाते 

रोडरोलर की आवाज़,

पोखरों में नंगे नहाते 

बच्चों की आवाज़,

खेत को मथते 

ट्रैक्टरों की आवाज़,

झुंड में घूमते कुत्तों के 

भौंकने की आवाज़,

ट्रॉली में ईंट ढोते

लेबरों की आवाज़,

साक़ी और बदमस्त 

शराबियों की आवाज़,

स्कूलों की छुट्टी करतीं

घण्टियों की आवाज़,

ट्रेन में नल्ली बेचते

छोटे बच्चे की आवाज़,

चाँद को निहारते

दो उश्शाक़ों की आवाज़,

खेल दिखाते

मदारी की आवाज़,

क़ज़ा पर

राम-नाम-सत्य की आवाज़,

मसाईबों से 

शिकस्त खाने की आवाज़,

लाख और कांच से बनी

चूड़ियों की आवाज़,

आईसक्रीम-गोलगप्पे बेचते

अंकल की आवाज़,

मुख़ालिफ़त करती

आमादा अफ़राद की आवाज़,

हक़-हुक़ूक़ औ' 

जज़्बात की आवाज़,


दब जाती है

उस निज़ाम की आवाज़ के आगे

जो शबाब पर है

और मसल देना चाहती है

हर उस आवाज़ को 

जो उसका फ़ैज़ नहीं करतीं!


आयुष चतुर्वेदी

  छात्र (कक्षा 11)

   वाराणसी






गुरुवार, 10 अक्तूबर 2019

हैप्पी इंडिपेंडेन्स डे

कपड़े मैले कुचले
पाँव नंगे
चेहरा धूल से सना
और आग-सी चिलचिलाती धूप,
हाथ में प्लास्टिक के
तिरंगों का गुच्छा लिए
शहर की सबसे तंग
रेड लाइट पर,
सस्ती-महंगी सभी गाड़ियों की
शीशें पीटतीं
वो गूंगी लड़की।
नज़र तक न फेरते
कारों वाले,
कभी इन्तजार कर
तो कभी दुत्कारने पर
आगे बढ़ जाते उसके पैर।


रेड लाइट पर टाइम काटने को
कोई कभी पूछ डालता-
''कैसे दिए?''
दाहिने हाथ की पाँचों उँगलियाँ खोलकर
वह बताती-
''दस के दो ''
ये सोचकर कि वो झंडे लेगा
वो रुक जाती
पर लाइट होते ही वो निकल पड़ता।


गाड़ी के साथ कुछ दूर
भागकर पैसे लेने पड़ते
तो कभी दौड़कर पैसा पकड़ाना पड़ता
कई बार तो पैसे भी ना मिल पाते,
हॉर्न बजातीं कारें-बाइकें
बड़ी-बड़ी गाड़ियाँ
बड़ी तेज़ी-से
उसके दाएँ-बाएँ से गुजरतीं,
तो कुछ उसे
गरियाते हुए निकल जाते-
''अरे मरेगी क्या?''
उस बीच से निकलने की
उसकी वो जद्दोजहद
और उसका जीवन से ये
निर्मोह संघर्ष देख
सिर झन्ना जाता
और हृदय सहम जाता,
कभी किनारे पहुँचने से पहले
तो कभी पहुँचते ही
रेड लाइट हो जाती,
और वह पुनः लौट पड़ती
शीशें पीटने।
एक बड़ी-सी कार आकर रुकी
शीशा सरका
"फ्लैग्स लेना है बेटा?''
चलो दीदी को हैप्पी इंडिपेंडेंस डे बोल दो-
''हैप्पी इंडिपेंडेंस डे दी ''


अपनी ही उम्र की वो लड़की
और उसकी वो बात,
उसका वो दूध-सा सफेद चेहरा
उसके रंग-बिरंगे नए-नए
सुंदर कपड़े,
उसको लगातार दुलारती
उसकी वो 'मॉम ',
और न जाने क्या-क्या,
एक दम से सब
उसकी नजरों के सामने घूम जातीं,
जिसकी माँ ने तीन झंडे लिए थे
और वो भी दस में,
उसकी धड़कनें बढ़ने लगतीं
और पसीने की एक धार
उसकी कनपट्टी से निकल पड़ती,
और अचानक हॉर्न की तेज़ आवाज़
उसे एक झटके में जगा देती
दिन के इस भयानक स्वप्न से।


आँखें मींचते
और पसीने से तर
सड़क के डिवाइडर से उठकर
और इधर-उधर नजरें दौड़ा,
वह पुनः निकल पड़ती
आज़ादी मनाने।


भूपेंद्र


( शोधार्थी,(पीएच-डी) दिल्ली विश्वविद्यालय)