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गुरुवार, 26 सितंबर 2019

राष्ट्र के मार्गदर्शक हैं शिक्षक

समाज में गुरू अर्थात शिक्षक का स्थान सबसे ऊपर है ।प्रारंभिक से लेकर अंतिम समय तक उनके द्वारा दी गयी शिक्षा से जीवन प्रकाशित होती रहती है।जो मनुष्य शिक्षक का सम्मान करता है सही मायने में शिक्षित है।शिक्षा से ही सम्मान है।आदर- भाव, आचार -विचार, व्यवहार और संस्कार जीतने भी गुण हैं सभी को सम्माहित कर कोई सही मायने में शिक्षक बनता है और लोगो को शिक्षा देता है।जिस प्रकार माली छोटे छोटे पौधों को बड़ा और फलदार वृक्ष बनाने में मेहनत करता है ठीक उसी तरह हमारे शिक्षक भी बच्चों के पीछे छुपे प्रतिभा को निखार कर उन्हें सही रास्ते पर ले जाते है और भविष्य के इंजीनियर, डाॅक्टर साइंटिस्ट और अधिकारी बनाते हैं।

शिक्षक के योगदानो को समाज कभी नही भूला पाता और भूलना भी नही चाहिये। शिक्षा देना भी एक कठिन तपस्या है।देने वाला भी सोचता है कि मैं आज जो कुछ इसे बता रहा हूँ वह यह कितना ग्रहण कर पाएगा उसके दिमाग में क्या चल रहा है?,इसका क्या असर होगा? ठीक डाॅक्टर की तरह जब वह मरीज को कोई दवा देता है तो उसके गुण दोष के बारे में अवश्य सोचता है। शिक्षा के साथ भी शिक्षक ऐसा जरूर सोचते हैं।

आज कल की पद्धति जरूर बदल गयी है लेकिन शिक्षा की धूरी आज भी शिक्षक ही हैं इस बात को सभी को समझना होगा और शिक्षक के प्रति आदिकाल वाला व्यवहार रखना ही होगा।लोग तनिक सी बातो पर शिक्षक के साथ दुर्वयहार कर देते है कोई शिक्षक आज कडाई नही बरतता क्योंकि हंगामा खडा हो जाता है मानवाधिकार संगठन,बाल अधिकार कानून सब पीछे पड़ जाते जिससे शिक्षको के मनोवल को आघात लगता है और वे उस रूचि से काम नही कर पाते।

समस्याएँ कई है आधुनिकतम चीजो का अभाव,पुस्तके,लाइब्रेरी प्रयोगशालायें, भवन तथा जर्जर पडे सिस्टम से नित जूझना पडता है। फिर भी वे शिक्षा जगत को आगे ले जाने के लिए कठिन परिश्रम तो करते ही है ।इसमें यदि लोगो का साथ मिल जाये तो और भी अच्छा होगा।


शिक्षक का समाज और राष्ट्र निर्माण में बडा महत्वपूर्ण स्थान रहा है।देशप्रेम संस्कार और सभ्यता एक स्कूल के द्वारा प्रदान की गयी शिक्षा से ही जागृत होकर हमारे लहू में दौडता है जो आगे चलकर देश समाज और परिवार के काम आता है हमारे आर्दश भी शिक्षक है हमारे निष्कर्ष भी शिक्षक ही हैं इसलिए शिक्षक का सम्मान हमेशा से हमारे समाज में सर्वोपरि माना गया है।

शिक्षा का व्यवसायीकरण शिक्षा जगत के लिए जहर है जिससे समाज और राष्ट्र को सोचना होगा। नित बढ़ते फीस ऊँची होती खर्च और पीठ पर लदते किताबो के बोझ ने जैसे शिक्षा की कमर तोड के रख दी।सरकारी स्कूलो में उदासीनता और प्राईवेट के पीछे भागते लोग यही सच्चाई बनकर रह गयी है ।सरकारी स्कूलों में शिक्षक की कमी सुविधाओ की कमी वही प्राईवेट स्कूलो में सुविधा के साथ हाईटेक व्यवस्था मौजूद रहता है जिसके कारण ऊँची फीस वसूली जाती है।एडमिशन से लेकर रोज बदलते स्लेबस की किताबो पर भी मोटी रकम ली जाती है ऐसे सिस्टमों के सहारे कैसे कम आमदनी वाले या मध्यमवर्गीय परिवार वाले अपने बच्चों को शिक्षा दे पाएँगे गंभीर चिंता का विषय बना हुआ है। हलांकि सरकारें भरसक इस खाई को कम करने के लिए प्रयासरत है लेकिन बिना कठोर निर्णय के समस्या का समाधान होना मुश्किल सा प्रतीत होता है।पांव फैलाये इस जहर में कोई हाथ डालना नही चाहता क्योंकि सभी शहर में नामी गिरामी व्यक्तियों के बच्चे पढ़ते हैं।

शिक्षा को समान बनाना एक विकल्प है जब एक संविधान एक राष्ट्र हो सकता है तो एक शिक्षा क्यों नही? एक स्लेबस क्यो नही ?एक शिक्षा होने से समान शिक्षा होगी समान किताबे होगी और समान विचारधारा का जन्म होगा जिससे पनप रही खाई कम हो सकेगी साथ ही साथ कम खर्च भी होगे।मेरा मानना है कि शिक्षा से जुडे लोग इस विषय पर अवश्य सोचते होंगे ।

                                  आशुतोष

                                  पटना बिहार